शाबाश सिंधु

भारत के युवा खिलाड़ी जिस तरह देश का नाम रोशन कर रहे हैं, उससे लगता है कि अगले ऑलम्पिक और विश्व खेलों में हमारी मैडल टेली में सुधार होगा।

By: dilip chaturvedi

Published: 18 Dec 2018, 02:14 PM IST

भारतीय शटलर क्वीन पीवी सिंधु ने ग्वांग्झू में नया स्वर्णिम इतिहास रच दिया। सिंधु बैडमिंटन वल्र्ड टूर का खिताब जीतने वाली पहली भारतीय महिला खिलाड़ी बन गईं। इसके साथ ही भारतीय खिलाड़ी ने फाइनल में हार जाने का मिथक भी तोड़ दिया। सिंधु ऑलम्पिक, राष्ट्रमंडल, एशियाई खेलों के अलावा विश्व चैम्पियनशिप के फाइनल में पहुंच चुकी हैं। लेकिन इन सभी जगह उन्हें स्वर्ण के स्थान पर रजत पदक पर ही संतोष करना पड़ा था। 2018 में भी सिंधु कोई खिताब नहीं जीत पाई थीं, लेकिन वर्ष का अंतिम माह उनकी झोली में स्वर्णिम खुशियां भर गया। फाइनल में भारतीय शटलर ने जापान की दूसरी वरीयता प्राप्त नोजोमी ओकुहारा को कड़े मुकाबले में 21-19, 21-17 से हराया। विश्व में छठी वरीयता प्राप्त सिंधु पूरी प्रतियोगिता में गजब फॉर्म में दिखीं। क्वार्टर फाइनल में उन्होंने शीर्ष वरीयता प्राप्त खिलाड़ी को परास्त कर खिताब जीतने के इरादे जता दिए थे। लेकिन अभी तक सिंधु के साथ अजीब संयोग जुड़ा था कि वह विश्व के जितने भी बड़े टूर्नामेंट होते हैं सभी के फाइनल में तो पहुंच जाती थीं, लेकिन आखिरी मुकाम में डगमगा जाती थीं। सिंधु इस टूर्नामेंट के फाइनल में लगातार तीसरी बार पहुंची। पिछली बार वे जापानी खिलाड़ी अकाने यामागूची से हार गई थीं।

सिंधु से पूर्व सायना नेहवाल भी 2011 में वल्र्ड सुपर सीरीज के फाइनल में पहुंची थीं जबकि ज्वाला गुट्टा और वी. डीजू की जोड़ी २००९ में उपविजेता रही थी। मानसिक संतुलन और शारीरिक दमखम के इस खेल में सिंधु ने फाइनल के आखिरी क्षणों में अपनी गति और लय बरकरार रखी और जापानी खिलाड़ी को आगे नहीं निकलने दिया। 5 जुलाई 1995 में जन्मीं पीवी सिंधु ने बैडमिंटन जगत में ऐसे समय में प्रवेश किया जबकि सायना नेहवाल, ज्वाला गुट्टा जैसी खिलाडिय़ों की तूती बोलती थी। अपनी कड़ी मेहनत और दमखम के बल पर सिंधु मात्र 17 वर्ष की आयु में विश्व महिला बैडमिंटन फेडरेशन की टॉप-20 खिलाडिय़ों में शामिल हो गई थीं। 2016 में वे ऑलम्पिक खेलों में रजत पदक जीतने वाली पहली भारतीय शटलर बनीं। इससे पूर्व सायना नेहवाल ही कांस्य पदक जीत पाई थीं। उनकी उपलब्धियां यहीं कम नहीं हुईं। 2017 और 2018 की विश्व चैम्पियनशिप में उन्होंने लगातार रजत पदक जीता। उन्हें भारत सरकार की ओर से पद्मश्री सम्मान से भी नवाजा जा चुका है।

भारत के युवा खिलाड़ी जिस तरह से अंतरराष्ट्रीय स्तर पर देश का नाम रोशन कर रहे हैं, उससे लगता है कि अगले ऑलम्पिक और विश्व खेलों में हमारी मैडल टेली में सुधार होगा। खेल मंत्री राज्यवद्र्धन सिंह राठौड़ घोषणा भी कर चुके हैं कि 2030 तक हम खेलों में चीन, अमरीका, रूस और जापान जैसे देशों के मुकाबले में आ जाएंगे। हमारे यहां प्रतिभाओं की कमी नहीं है, लेकिन उन्हें प्रशिक्षण और साजो-सामान की वह सुविधाएं अभी नहीं मिल पाईं जो कि उन्हें विश्व स्तर पर मुकाबले में खड़ा कर सकें। क्रिकेट में तो हम शीर्ष पर हैं, लेकिन उतनी ही शोहरत और सुविधाएं अन्य खेलों और खिलाडिय़ों को मिलें तो हमारे खिलाड़ी किसी से पीछे न रहें। देश में कबड्डी, बैडमिंटन, फुटबॉल के क्षेत्र में भी क्रिकेट की तरह औद्योगिक घराने उतरने लगे हैं। हाल ही उड़ीसा में छह टॉप उद्योगों ने अलग-अलग खेलों को गोद लेकर नया अध्याय शुरू किया है। अन्य राज्यों और केन्द्र के स्तर पर भी इस तरह की व्यावसायिक भागीदारिता खेलों में लाई जाए, तो देश में खेलों का भविष्य स्वर्णिम होगा, इसमें कोई शक नहीं।

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