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बैंक दे सकते हैं दो से तीन प्रतिशत ब्याज पर ऋण!

विलफुल डिफॉल्टर्स से वसूली के लिए ऋण वसूली प्राधिकरण (डीआरटी) में वर्तमान में कछुआ चाल से होने वाली कार्रवाई को तेज किया जाना चाहिए। दावा दायर होते ही डिफॉल्टर की परिसंपत्तियां तथा पासपोर्ट जब्त हो जाना चाहिए।

Published: April 27, 2022 07:56:45 pm

वेद माथुर
लेखक पंजाब नेशनल बैंक के महाप्रबंधक रह चुके हैं

हमारे देश में दुनिया के अन्य देशों की तुलना में बैंक ऋण की ब्याज दरें अधिक हैं। इसका मुख्य कारण 'विलफुल डिफॉल्टर्स' हैं। बैंकों के अनेक 'विलफुल डिफॉल्टर्स' लाखों-करोड़ों रुपए के ऋण लेकर न केवल विदेश भाग गए, वरन भारत में रहकर भी मौज कर रहे हैं। बैंक इन 'विलफुल डिफॉल्टर्स' के ऋण का मूलधन और ब्याज नियमित भुगतान करने वाले अच्छे ऋणियों से वसूल कर रहे हैं। यदि बैंक अपने 'विलफुल डिफॉल्टर्स' की पहचान त्वरित व पारदर्शी प्रक्रिया से करें, सख्त कानूनों से इनसे वसूली हो एवं इन आर्थिक अपराधियों को जेल होने लगे, तो बैंकों की वसूली और आय कई गुना बढ़ जाएगी। साथ ही बैंक अच्छे ऋणियों को 7 से 14 प्रतिशत वार्षिक ब्याज की बजाय 2 से 3 प्रतिशत वार्षिक ब्याज पर भी ऋण दे सकेंगे।
यदि ब्याज दरें कम होती हैं, तो इससे बड़े उद्योगपतियों को ही नहीं, किसानों, स्वनियोजित व्यक्तियों, शिक्षा ऋण लेने वाले छात्रों, आवास ऋण लेने वाले आम आदमी सहित हर व्यक्ति को राहत मिलेगी। बैंकों के पास ऋण देने के लिए उपलब्ध संसाधन कई गुना बढ़ जाएंगे और कम ब्याज दर से मांग और उत्पादन दोनों में कई गुना वृद्धि होगी। इस प्रकार बैंकिंग प्रणाली अर्थव्यवस्था में मुद्रास्फीति की स्थिति को प्रभावित किए बिना विकास की गति को तेज कर सकेगी। 'विलफुल डिफॉल्टर्स' से वसूली हमारे देश को खुशहाल बनाने की दिशा में 'गेम चेंजर' सिद्ध होगी। भारतीय रिजर्व बैंक की परिभाषा के अनुसार यदि कोई कंपनी या व्यक्ति बैंक के ऋण चुकाने की क्षमता होने के बावजूद यह कर्ज नहीं चुकाता, ऋण का उपयोग उस उद्देश्य से नहीं करता, जिसके लिए लिया गया था, ऋण के रूप में ली गई राशि की हेराफेरी की गई हो अथवा बैंक ऋण से खरीदी गई अचल संपत्तियों को मनमाने तरीके से बेच दिया गया हो, तो वह व्यक्ति या कंपनी 'विलफुल डिफॉल्टर' है।
बैंक किसी भी डिफॉल्टर को 'विलफुल डिफॉल्टर' घोषित करने के लिए फॉरेंसिक ऑडिट करवाते हैं। कई बार ऑडिटर बैंक ऋण के दुरुपयोग में हेराफेरी का स्पष्ट उल्लेख करके कोर्ट-कचहरी के चक्कर में पडऩे की बजाय ऐसी गोलमाल भाषा का उपयोग करते हैं कि बैंकों के लिए वास्तविक 'विलफुल डिफॉल्टर' पर भी यह लेबल चस्पा करना मुश्किल हो जाता है। ऐसे में बैंकों को एक ओर तो ऑडिटर का कार्य कर रहे खुद के अधिकारियों को फॉरेंसिक ऑडिट का प्रशिक्षण देकर उनसे यह कार्य करवाना चाहिए तथा दूसरी ओर एक दूसरे बैंक को हेराफेरी या बैंक धन खुर्द-बुर्द करने के आरोपी का अपराध सिद्ध करने में सहयोग करना चाहिए।
विलफुल डिफॉल्टर्स से वसूली के लिए ऋण वसूली प्राधिकरण (डीआरटी) में वर्तमान में कछुआ चाल से होने वाली कार्रवाई को तेज किया जाना चाहिए। दावा दायर होते ही डिफॉल्टर की परिसंपत्तियां तथा पासपोर्ट जब्त हो जाना चाहिए। सीबीआइ की आर्थिक अपराध शाखा को पर्याप्त मानव संसाधन दिए जाने चाहिए तथा उन्हें यह भी निर्देश दिया जाना चाहिए कि वे बैंकर्स को अनावश्यक परेशान न करें। 'विलफुल डिफॉल्टर्स' के संपूर्ण परिवार की संपत्ति के स्रोतों की भी जांच की जानी चाहिए। हमारे देश में बड़े आर्थिक अपराधियों का आज भी सामाजिक बहिष्कार नहीं होता है, जो कि होना चाहिए। साथ ही बैंकों को अखबार में विज्ञापन देकर 'विलफुल डिफॉल्टर' के फोटो छपवाने की छूट मिलनी चाहिए। पता नहीं क्यों हमारा सिस्टम प्रत्यक्ष- अप्रत्यक्ष रूप से इनके नाम छुपाता है। नेशनल कंपनी लॉ ट्रिब्यूनल (एनसीएलटी) द्वारा निर्मित मामलों में बैंकों को हजारों करोड़ रुपए की हानि (बैंकिंग की भाषा में हेयरकट) होती है। इसके लिए ऋणियों एवं पात्र मामलों में बैंक के उच्च प्रबंधन को जवाबदेह बनाया जाना चाहिए।
सरकार 'विलफुल डिफॉल्टर्स' की परिभाषा को व्यापक करे। साथ ही इनकी त्वरित पहचान और इसे कानूनी अपराध मान कर कड़े दंड का प्रावधान किया जाए, तो हजारों करोड़ रुपए की वसूली होगी और उद्योगपतियों और आमजन को अत्यंत कम ब्याज दर पर ऋण मिलेगा। इससे विकास की धीमी रफ्तार तेज होगी। बेरोजगारी से जूझ रहे हमारे जैसे विकासशील देश की अर्थव्यवस्था में नई जान आएगी।
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