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स्वभाषा और स्वबोध से ही बनेगा श्रेष्ठ भारत

भाषा-ज्ञान के, मिटत न हिय को सूल।' निज भाषा में व्यवहार करना, मातृभाषा में पढऩा, बोलना, समझना, जानना, बताना और समझाना, यह व्यवहार जिस समाज में होता है, वह समाज उन्नति को प्राप्त करता है और सभी प्रकार की उन्नति, सभी प्रकार के विकास, सभी प्रकार की समृद्धि का मूल यही है।

Published: September 14, 2022 06:19:07 pm

प्रो. रजनीश कुमार शुक्ल
कुलपति, महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा

आ जादी के अमृत महोत्सव के मौके पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने लाल किले की प्राचीर से देश को संबोधित करते हुए देश के हर नागरिक से ५ प्रण लेने का संकल्प प्रस्तावित किया था, जिसमें एक संकल्प दासता के सभी निशान मिटाने का है। आजाद भारत में यह आह्वान अत्यन्त महत्त्वपूर्ण और गहरे अर्थ वाला है। मानसिक गुलामी से मुक्ति सशक्त भारत के लिए आवश्यक है। अपनी प्राचीन विरासत पर आधारित और भविष्योन्मुखी सभ्यता की निर्मिति स्वभाषा और स्वबोध से ही हो सकती है। परायी सांस्कृतिक भूमि पर स्वबोध का समाज खड़ा नहीं हो सकता।
आज निश्चित रूप से भारत में स्वराज, स्वबोध और सुराज को लेकर एक सकारात्मक विमर्श खड़ा हुआ है। भारत में हिंदी के प्रति सर्वत्र सकारात्मक दृष्टि दिखाई दे रही है। हिंदी को एक सक्षम व समर्थ भाषा बनाने में अलग-अलग क्षेत्रों के लोगों ने उल्लेखनीय भूमिका निभाई है। इसका ही परिणाम है कि वैश्विक मंच पर हिंदी लगातार अपनी मजबूत पहचान बना रही है। देश की समस्त मातृभाषाओं व राजभाषा हिंदी के समन्वय में ही भारत की प्रगति समाहित है। पराई भाषा में शिक्षा होगी, तो दास मनोवृत्ति जीवन के सभी हिस्सों में बनी रहेगी। इसलिए इस दासता से मुक्ति का तात्पर्य है अपनी भाषा, अपनी सभ्यता संस्कृति पर न केवल गर्व करना, अपितु उसे जीवन व्यवहार में उतारना। यही वास्तविक स्वबोध है और यही वास्तविक स्वराज है। भारतीय ज्ञान परंपरा की जीवन के सभी क्षेत्रों में स्वीकृति बने, भारतीय मूल्य व्यवस्था को समाज जीवन में स्थान प्राप्त हो और सर्वत्र स्वदेशी, स्वभाषा और स्वबोध की भावना निर्मित हो। इसे प्रत्येक व्यक्ति को अपने जीवन में एक पवित्र प्रण की तरह स्वीकार करना ही चाहिए। वस्तुत: यह प्रण स्वभाषा, स्वदेशी और स्वबोध के साथ सर्वत्र दासता के चिह्नों से मुक्ति का उपक्रम है।
यह सच है कि 1947 में अंग्रेज चले गए, लेकिन अंग्रेजियत अब भी जीवन के हर हिस्से में प्रभावी है। भारतीय ज्ञान, विज्ञान और उसकी श्रेष्ठता के प्रति संशय और अविश्वास, औपनिवेशिक मानसिकता का फल है। दासता, सभ्यता की हो या संस्कृति या फिर भाषा या जीवन दर्शन की, यह व्यक्ति समाज और राष्ट्र दोनों के सच्चे स्वराज बोध में बाधक है।
अंग्रेजों की नीतियों के कारण भारतीय भाषाओं के बीच की समरसता और बहुभाषिकता की स्वीकृति के प्रति संदेह पैदा हुआ, जबकि भारत में भाषा संस्कृति के निर्माण, मनुष्य के बलिदान और स्वाभिमान तथा जीवन का साधन रही है। भारत में भाषा का लोकोत्तर चरित्र है। उसका परंपरागत इतिहास है। उसे ज्ञान के विस्तार और ज्ञान की निर्मिति और विस्तार के लिए उपलब्ध साधन के रूप में देख सकते हैं। सभी भारतीय भाषाओं में ऐसी पूरकता है, जिससे भारत नाम के सांस्कृतिक राष्ट्र की निर्मिति होती है। हिमालय से लेकर कन्याकुमारी तक संपूर्ण राष्ट्र एकता के सूत्र में बंधता है। इसकी विविधताओं को स्वीकार करके राष्ट्रीय एकता सिद्ध होती है। स्वतंत्रता का गौरव भाव सर्वत्र तभी आएगा, जब शासकीय व्यवस्थाओं से लेकर के परिवार जीवन तक हम पश्चिम से आरोपित जीवन मूल्यों से मुक्ति प्राप्त करेंगे। इस दृष्टि से भाषिक स्वराज्य सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण है।
इस बात का ध्यान रखना होगा कि औपनिवेशीकरण की पूरी प्रक्रिया में भाषा ने महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। शिक्षा के भारतीयकरण का अभियान भी भाषा के माध्यम से ही होगा। नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति इस प्रकार के दृढ़ विश्वास का प्रतिपादन है। भारत भारतीय भाषाओं में बोले, व्यवहार करे, पढ़े और अनुसंधान करे, तो दासता से सहज मुक्ति प्राप्त होगी। इस अवसर पर 'स्वराज इन आइडिया' में के.सी. भट्टाचार्य लिखित पंक्तियों को याद करना चाहूंगा। वे कहते हैं कि 'मेरे संपूर्ण चिंतन में मौलिकता का अभाव हो गया है। पश्चिमी भाषा का यह प्रभाव मेरे ऊपर पड़ा है कि मैं अपनी मातृभाषा में न कुछ लिख सकता हूं, न कुछ सोच सकता हूं।Ó भाषा और संस्कृति की गुलामी राजनीतिक गुलामी से भी अधिक खतरनाक है।
अंग्रेजों के आगमन के बाद लगातार भारत को गुलाम बनाने के जो यत्न हुए, उनमें उनका सबसे बड़ा उपकरण भारतीय शिक्षा को नष्ट करना था। गुलामी के हर चिह्न से मुक्ति का सबसे बड़ा अभियान राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 है, जो भारत की युवा पीढ़ी को, भारत के भविष्य को, भारत की सांस्कृतिक परंपराओं के आलोक में खड़ा होने का आह्वान करती है। हिंदी को लेकर भारत में जन स्वीकृति का जो स्वरूप बन रहा है, उसे शिक्षा में उतारना होगा। इसके लिए नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति में कुछ प्रयास हुए हैं। भारत की बहुभाषिकता को संवर्धित करते हुए हिंदी आने वाले १० से १५ वर्षों में भारत ही नहीं, पूरी दुनिया में ज्ञान-विज्ञान और तकनीकी की भाषा के रूप में विकसित हो सकती है।
बरबस भारतेन्दु हरिश्चंद्र की कुछ पंक्तियां याद आती हैं- 'निज भाषा उन्नति अहै, सब उन्नति को मूल। बिन निज भाषा-ज्ञान के, मिटत न हिय को सूल।' निज भाषा में व्यवहार करना, मातृभाषा में पढऩा, बोलना, समझना, जानना, बताना और समझाना, यह व्यवहार जिस समाज में होता है, वह समाज उन्नति को प्राप्त करता है और सभी प्रकार की उन्नति, सभी प्रकार के विकास, सभी प्रकार की समृद्धि का मूल यही है। हिंदी सहित अन्य भारतीय भाषाओं को स्वीकार करना, उन्हें शिक्षा, विज्ञान, व्यापार और सरकार की भाषा बनाना ही वास्तव में भारत को औपनिवेशिक दासता से मुक्ति दिलाना है और सही अर्थों में हिन्द स्वराज को साकार करना है।
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