भारत के लिए नया 'सूर्योदय'

आज उन स्थानीय उद्योगों को पुनर्जीवित करने का समय है जो वैश्वीकरण के युग में नष्ट हो गए। यह उन आर्थिक नीतियों की शुरूआत करने का भी समय है जो जन कल्याण, स्थायी आय, रोजगार सृजन और सभी के लिए मददगार हो और जो लोगों में विश्वास पैदा करें।

By: Prashant Jha

Updated: 25 May 2020, 02:25 PM IST

डाॅ. अश्विनी महाजन, आर्थिक मामलों के जानकार

’आत्मनिर्भर भारत मिशन’ का विचार भारतीय लोकाचार और जन सामान्य से सीधे जुड़ा हुआ है। ब्रिटिशों को हराने के लिए महात्मा गांधी ने स्वदेशी के विचार का इस्तेमाल किया था, और उनके लिए स्वदेशी, आत्मनिर्भरता की ही अभिव्यक्ति थी। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के राष्ट्र के नाम संबोधन को गांधी के विचार को अपनाते हुए एक सुधार के रूप में देखा जाना चाहिए, जिसमें स्थानीय को बढ़ावा देने के मार्ग पर चलने का संकल्प है। यह जो जाहिर तौर पर आज के वैश्वीकरण से विपरीत विचार है भारत को आर्थिक रूप से स्वतंत्र और आत्मनिर्भर देखने का मार्ग प्रशस्त करता है।

वर्तमान में दुनिया के विकसित देश दूसरे देशों के विकास मॉडल की नकल करके विकसित नहीं हुए। उन्होंने खुद को विकसित करने के लिए अपनी रणनीतियों को स्वयं तैयार किया। लेकिन हमारे नीति निर्माता तो विदेशी मॉडलों से अभिभूत रहे और उन्होंने कभी भी लोगों की क्षमता पर भरोसा ही नहीं किया, न ही लोकाचार, विचार प्रक्रिया और न ही इस देश के लोगों की उद्यमशीलता की क्षमता पर भरोसा किया। उन्हें कभी यह विश्वास नहीं था कि लोगों को केंद्र में रख विकास किया जा सकता है। ऐसा नहीं है कि हमारे लोगों के पास क्षमता नहीं थी, वास्तव में समस्या हमारे नीति निर्माताओं की मानसिकता में थी।

पिछले 70 वर्षों में, नीति निर्माताओं ने हमारे स्वदेशी उद्योगों, संसाधनों और उद्यमियों पर यानी देश के स्व पर भरोसा नहीं किया। 1950 के बाद से, नीति निर्माताओं ने विकास के रूसी मॉडल पर विश्वास किया। इस मॉडल को नेहरू-स्टालिन मॉडल भी कहा जाता है। सार्वजनिक क्षेत्र आधारित दर्शन इस मॉडल के मूल में था। यह सोचा गया कि सार्वजनिक क्षेत्र इस देश के विकास को गति देगा, और अंतोत्गत्वा उपभोक्ता वस्तुओं के उद्योगों के विकास में भी वही योगदान देगा। लेकिन उस मॉडल में कृषि और सेवा क्षेत्र को कोई स्थान नहीं दिया गया।

अचानक, 1991 में यह महसूस किया गया कि जिस मॉडल पर हमारी अर्थव्यवस्था आधारित थी वह विफल रहा है। बढ़ते विदेशी ऋण के कारण देश मुसीबत में आ गया, विदेशी मुद्रा भंडार समाप्त हो गये थे और संप्रभु कोताही (डिफॉल्ट) का खतरा उत्पन्न हो गया था। यह कहा गया कि अर्थव्यवस्था को बचाने का एकमात्र तरीका वैश्वीकरण (वाशिंगटन की सहमति के आधार पर) को अपनाना ही है। हमने देश को विदेशी प्रत्यक्ष निवेश (एफडीआई), बहुराष्ट्रीय निगमों, यानी विदेशियों के हाथ सौंप दिया। यह नई व्यवस्था पूंजी पर आधारित थी और वह भी विदेशी पूंजी पर आधारित। एकाधिकार और बाजार पर कब्जा करना बड़ी विदेशी कम्पनियों की प्राथमिकता थी। इस मॉडल के बचाव में यह तर्क दिया गया कि इसके कारण ग्रोथ में तेजी आई। लेकिन देखा जाए तो जीडीपी में 1991 के बाद ग्रोथ, विलासिता के सामानों के अधिक उत्पादन और सेवा क्षेत्र में तेजी से ग्रोथ के कारण हुई। लेकिन सकल घरेलू उत्पाद में इस ग्रोथ का लाभ कुछ लाभार्थियों तक ही सीमित रहा। लेकिन अगर हम करीब से देखें, तो यह ग्रोथ रोजगार विहीन, जड़विहीन और सब से ऊपर बेरहम थी।

एक तरफ अंधाधुंध रियायतें देकर हमारी पहले से ही अच्छी तरह से चलने वाली कंपनियों का अधिग्रहण विदेशी पूंजी को करने की छूट दे दी और दूसरी तरफ वैश्वीकरण के नाम पर चीनी माल के आयात की अनुमति देकर, हमने अपने देश में रोजगार को नुकसान पहुँचाने का काम किया और आर्थिक असमानताओं को बढ़ाने का काम किया। विदेशी व्यापार और और चालू खाते पर भुगतान शेष में घाटा असहनीय होता गया। इसी का परिणाम था। इस तरह के बेलगाम भूमंडलीकरण ने कई स्थानीय उद्योगों को तहस नहस कर दिया। इसका सीधा परिणाम स्थानीय विनिर्माण, रोजगार का नुकसान और शहरी श्रमिक वर्ग और ग्रामीण आबादी की गरीबी था, क्योंकि कृषि और ग्रामीण अर्थव्यवस्था एलपीजी (उदारीकरण, निजीकरण और वैश्वीकरण) नीतियों में पूरी तरह से ध्यान से बाहर थी। बेरोजगारी और गरीबी ने लोगों को सरकारी मदद पर निर्भर बना दिया । उन्हें समाज के लिए मूल्यवान योगदान करने वाला बनाने के बजाय, सरकारी सहायता पर निर्भर बना दिया गया।

रोजगार (मनरेगा) और भोजन के अधिकार नए मानदंड बनने लगे। लेकिन वे सभी लोगों को लोकतंत्र में चुप और रचित रखने के लिए उपकरण मात्र ही हैं। हालाँकि, यह नीति लोगों द्वारासामाजिक और आर्थिक विकास में योगदान देने में बाधा बनती है। विकास को अधिक भागीदार, समावेशी और रोजगारोन्मुखी बनाने के लिए किसी भी सोच की अनुपस्थिति में, ‘यूनिवर्सल बेसिक इन्कम’ प्रदान करने लिए बातें होने लगी, जो लोगों के लिए सहायता का दूसरा रूप ही था। हालांकि, वैश्वीकरण और निजी कॉर्पोरेट और बहुराष्ट्रीय कंपनियों पर आधारित आर्थिक गतिविधियों को संचालित करने की मौजूदा व्यवस्था में, यह एकमात्र समाधान बताया जाता है, लेकिन यह लंबे समय तक नहीं चल सकता।

हालाँकि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी मेक इन इंडिया, स्टार्ट अप, खादी आदि पर जोर देते रहे हैं, लेकिन कम टैरिफ और बिना सोचे समझे एफडीआई ध् एफपीआई और आयात पर निर्भरता की नीति जारी रही। हम कह सकते हैं कि अब प्रधानमंत्री मोदी का लोकल के लिए जोर, जिसे ‘वोकल फॉर लोकल’ कहा जा रहा है, आत्मनिर्भरता की दिशा में एक कदम है, जिसकी लंबे समय से जरूरत थी। आज उन स्थानीय उद्योगों को पुनर्जीवित करने का समय है जो वैश्वीकरण के युग में नष्ट हो गए। यह उन आर्थिक नीतियों की शुरूआत करने का भी समय है जो जन कल्याण, स्थायी आय, रोजगार सृजन और सभी के लिए मददगार हो और जो लोगों में विश्वास पैदा करें। हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि हमारे सामाजिक क्षेत्रों की दुखद स्थिति स्वास्थ्य और शिक्षा पर सार्वजनिक व्यय की कमी के कारण भी है। दुर्भाग्यपूर्ण तो यह रहा कि इन कल्याणकारी क्षेत्रों को निजी मुनाफे के लिये सौंपा जाने लगा।

नए दिन के लिए सूर्योदय

प्रधानमंत्री ने भारत के लिए न केवल ‘क्वांटम जंप’ यानि लंबी छलांग लेने की नींव रखी, बल्कि स्वदेशी उद्यमियों के लिए अधिक अवसर और सम्मान भी पैदा करने की ओर क़दम बढ़ाया है। स्थानीय उद्योगों के लिए मुखर होने का प्रधानमंत्री का आह्वान स्वागत योग्य हैं। प्रधानमंत्री की अपील स्वदेशी और स्थानीय ब्रांडों को वैश्विक ब्रांड बनने में सहयोगी होगी। निरंतर समर्थन से इन उद्यमियों को वैश्विक स्तर पर अधिक सम्मान और स्वीकृति प्राप्त करने में मदद मिलेगी।

चीनी वायरस से होने वाली समस्याओं से निपटने के लिए, विभिन्न देशों की सरकारें प्रयास कर रही हैं और इस समर्थन की मात्रा को जीडीपी के प्रतिशत के संदर्भ से मापा जाता है। इस संदर्भ में, प्रधानमंत्री द्वारा 20 लाख करोड़ रुपये के पैकेज की घोषणा, जो जीडीपी का लगभग 10 प्रतिशत है, मजदूरों, छोटे व्यापारियों, लघु उद्यमियों, किसानों के साथ अति सूक्ष्म उद्यमों, ईमानदार कर दाताओं और अन्य व्यवसायों के लिए राहत और अवसर दे सकती है। चीन के आर्थिक हमले, सरकारों की उदासीनता और विदेशी पूंजी के प्रभुत्व के कारण, एक लंबे समय से पीड़ित छोटे व्यवसायों के पुर्नउत्थान के लिए इसे एक उपाय के रूप में देखा जा सकता है। स्थानीय के लिए प्रोत्साहन इस लक्ष्य को प्राप्त करने में मदद करेगा। इसलिए इस अवसर का उपयोग स्थानीय विनिर्माण और अन्य व्यवसायों के आधार पर अर्थव्यवस्था के पुनर्निर्माण के लिए किया जाना चाहिए। यह देश को और अधिक सकारात्मक दिशा में ले जाएगा।

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