समाज : भील समुदाय के संरक्षण की जरूरत

मूल्यों, चारित्रिक विशेषताओं से समाज को संबल देने का काम करने वाले रेगिस्तानी आदिवासी भीलों की मुश्किलें कम नहीं हैं।

By: विकास गुप्ता

Published: 15 May 2021, 10:10 AM IST

भुवनेश जैन (क्षेत्रीय निदेशक, नेहरू युवा केंद्र संगठन)

लोक देवता पाबूजी के शौर्य, त्याग, वचनबद्धता, इंसानियत की गाथाओं को परवाड़े एवं चमत्कारी घटनाओं को सायल कहते हैं। इनके वाचन की अनोखी शैली एवं गीत-संगीत के साथ प्रस्तुत करने की कला को थार रेगिस्तान के आदिवासी भील कलाकारों ने शताब्दियों से जिंदा रखा है। पाबूजी की फड़, जिसे थार क्षेत्र में पड़ भी बोला जाता है, को बांचने और मांडने का मतलब केवल धार्मिक आयोजन नहीं है। यह तो रेगिस्तान में मानवता, त्याग, बलिदान जैसे मूल्यों की घुमंतू शाला है, जहां रात-रात भर भील लोक कलाकार परवाड़े और सायल गाकर, बांचकर, उसके भाव समझाते रावण हत्था पर नृत्य करते चेतना जगाने का जतन करते रहे हैं।

रेगिस्तान के 40-50 गांवों में फड़ के कलाकारों ने इस विरासत को बचाकर रखा। इस समय पाबूजी के फड़ कलाकारों सहित अन्य आदिवासी लोक कलाकारों की एक पूरी पीढ़ी संघर्ष के दौर से गुजर रही है। कोरोना काल में इनकी पीड़ा और गहरी हो गई है। जैसलमेर के करणा भील को नड़ वादन एवं लंबी मूंछों के लिए विश्वभर में पहचान मिली। भीलों में उन जैसा कोई नड़ वादक अब नहीं है। मोर चंग, पावा, मुरली बजाने वाले इक्का-दुक्का कलाकार रह गए हैं। रेगिस्तान के सुप्रसिद्ध कनाना, लाखेटा गैर मेलों की रौनक भीलों की गैर से बनती रही है। इसी तरह से गरबी, मटकू नृत्य, बेडली नृत्य रेगिस्तानी आदिवासी भीलों की पहचान है।

रेगिस्तानी आदिवासियों के भित्ति चित्र कला, केश सज्जा, पहनावा, परंपरागत खेल अद्भुत रहे हैं। कुंवारी, शादीशुदा, बुजुर्ग, विधवा महिला का पहनावा, आभूषण, केश सज्जा अलग-अलग होते हैं। पोमचा, ढेल, हरी मगजी, हुलबान, मीनाकारी, बांधणू, हलारी, गुलबंद, मोरिया की चुन्दड़ी, कुर्ता, झब्बा आदिवासी समुदाय को विशिष्टता देती रही है। अब इतनी विभिन्नता मुश्किल से ही नजर आती है। गाभड़ी, मल्ल, सतोलिया, पिपालिया, वजिया, आंधल घेटो, समसम सोटो, खीर-खीर पाटी, लिक लिकोटी, राति रिंगड़ो जैसे खेल अब देखने को नहीं मिलते हैं। भीलों की अपनी बोली विलुप्त सी हो गई है। रेगिस्तानी आदिवासियों ने लोक संगीत, लोक नृत्य के साथ- साथ बुनकरी के कार्य को लंबे समय तक जिंदा रखा। बकरी, ऊंट की जट कि पिंजाई कर तंत बनाना, ढेरियों पर कात कर भाखले, बोरे, जिरोही, दरी पट्टी की बेजोड़ शिल्पकारी के साथ ओडे बनाने में माहिर रहे हैं। प्रोत्साहन और संरक्षण के अभाव के साथ बाजार की ताकतों ने उनके कला-कौशल को चलन से बाहर कर दिया है।

रेगिस्तान के भीलों के साथ-साथ अन्य प्रदेशों के भीलों की संस्कृति को समझ कर भील संग्रहालय बनाने की जरूरत है। नई पीढ़ी को भी उनकी संस्कृति से जोड़ा जाए। भारतीय संविधान की भावना के अनुरूप जन जातीय संस्कृति संरक्षण और विकास दोनों के लिए कुछ प्रावधान हुए भी हैं। मूल्यों, चारित्रिक विशेषताओं से समाज को संबल देने का काम करने वाले रेगिस्तानी आदिवासी भीलों के संरक्षण एवं विकास पर ध्यान देने की जरूरत है।

विकास गुप्ता
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