बड़ा सवाल, आखिर बार-बार क्यों बदलती है स्कूल यूनीफॉर्म

पत्रिकायन में सवाल पूछा गया था कि आखिर स्कूल में बार-बार यूनीफॉर्म बदलने से क्या फायदा है। पाठकों की मिलीजुली प्रतिक्रिया आईं, पेश हैं चुनिंदा प्रतिक्रियाएं।

By: shailendra tiwari

Updated: 11 Sep 2020, 06:18 PM IST

स्कूलों को न बनाएं प्रयोगशाला
सरकार बदलते ही स्कूलों को प्रयोगशाला बनाया जाना किसी भी तरह से उचित नहीं ठहराया जा सकता। इसी कड़ी में वर्तमान राजस्थान सरकार ने भी यूनिफॉर्म बदलने का निर्णय किया है। इस बात पर भी ध्यान नहीं दिया गया कि सरकारी स्कूलों में किस वर्ग के बच्चे आते है। इस बात पर भी ध्यान नहीं दिया कि क्या वे नई पोशाक खरीदने में समर्थ हैं? विशेषकर प्राथमिक विद्यालयों में तो एक पोशाक से पूरी प्राथमिक शिक्षा पूर्ण कर जाते है। अभिभावकों पर बेवजह बोझ डालना किसी भी तरह से सही नहीं है।
-जगदीप जांगिड़, झुंझुनूं
.................

विद्यार्थियों पर जुल्म
स्कूल यूनिफॉर्म का उद्देश्य ये था कि गरीब अमीर सब बच्चे एक जैसे वस्त्र पहन कर स्कूल आएंगे, तो किसी मेें हीन भावना पैदा नहीं होगी। आजकल सरकारी स्कूल में ज्यादातर गरीब बच्चे ही पढऩे आते हंै। बार-बार यूनिफॉर्म में परिवर्तन उन पर ज़ुल्म है। जिन व्यापारियों के पास पुरानी यूनिफॉर्म का स्टॉक पड़ा होता है, वे उनके गले की हड्डी बन जाता है। बार-बार यूनिफॉर्म बदलने का कोई ओचित्य नहीं है।
-भगवती लाल जैन, राजसमंद
..................

अनावश्यक बदलाव
राजस्थान में सरकार बदलते ही सरकारी स्कूल प्रयोगशाला बन जाते हंै। स्कूल पाठ्यक्रम, पोशाक और साइकल का रंग बदल जाता है। बार-बार इन अनावश्यक बदलाव से राजकोष व अभिभावकों को नुकसान होता है। अभिभावकों पर आर्थिक भार बढ़ता है। कोरोनाकाल में लोगों के आर्थिक हाल दयनीय हंै। ऐसे में स्कूलों की पोशाक बदलने से उनकी आर्थिक हालत और बिगाड़ जागएी। महंगाई चरम पर है । ऐसे में बच्चों के लिए नई पोशाक खरीदना 'कोढ़ में खाजÓ का काम होगा। शिक्षामंत्री को चाहिए कि वे स्कूलों को प्रयोगशाला बनाने की जगह अन्य सुविधाओं पर ध्यान देकर शैक्षिक समस्याओं का निस्तारण कराएं।
-अशोक कुमार शर्मा, झोटवाड़ा, जयपुर
.............................

राजनीति से प्रेरित
सरकारी स्कूलों मैं बार-बार यूनिफॉर्म बदलना राजनीति से प्रेरित है। यह उचित नहीं है। गरीब माता-पिता पर आर्थिक बोझ डालना सही नहीं है। यूनिफॉर्म बदलने की जगह सरकार को शिक्षा प्रणाली को बेहतर बनाने पर जोर देना चाहिए। राजनीतिक पार्टियां अपना एजेंडा चलाने के लिए ऐसे कदम उठाती हंै।
-विरेन्द्र सिंह, मुआना, नागौर
..........................

दोहरी मार
बार-बार स्कूल की यूनिफॉर्म बदलने से भ्रष्ट नेताओं और अधिकारियों को फायदा होता है, जो कपड़ा कारोबारियों से मोटी रकम लेकर अपना उल्लू सीधा करते हैं। अभिभावकों को तो नुकसान ही है। एक तो कोरोना काल में उनके पास रोजगार नहींं है। ऊपर से यह दोहरी मार। इसलिए राजस्थान सरकार का यह निर्णय अप्रासंगिक है। जल्दी ही इसे वापिस लेना चाहिए।
-डॉ. पवन बुनकर, अचरोल, आमेर
...................

शिक्षा को राजनीति से दूर रखें
सरकारें जगह का नाम बदलने और यूनिफॉर्म या नि:शुल्क दी जाने वाली साइकिल का रंग बदलने जैसे निर्णय लेती रहती हैं। बेहतर होगा कि सरकारें इस तरह के काम करने की बजाय शिक्षा की गुणवत्ता बढ़ाने पर ध्यान दे। शिक्षा जैसे क्षेत्र को राजनीति के हथकंडों से दूर रखा जाना चाहिए।
-करण राज सोलंकी, तखतगढ़, पाली
..........

बढ़ता है खर्च
स्कूलों में बार-बार यूनिफॉर्म नहीं बदलनी चाहिए, क्योंकि इससे खर्च बढ़ता है तथा अभिभावक प्रभावित होते हैं। सरकार को शिक्षा के स्तर में सुधार करना चाहिए तथा आने वाले कल के लिए बच्चों को पूरी तरह से तैयार करना चाहिए। फिजूल खर्च से बचना चाहिए
-सुषमा गुप्ता, नागौर
.............

मिलीभगत का खेल
बार-बार स्कूल की यूनिफॉर्म बदलना स्कूलों की एक साजिश है। ऐसा करके अभिभावकों पर आर्थिक बोझ डाला जा रहा है। उन्हें हर साल नई यूनिफॉर्म खरीदने के लिए मजबूर किया जाता है। असल में यह मैनेजमेंट एवं यूनिफॉर्म विक्रेता की मिलीभगत है, जिसमें कमीशन का लेनदेन चलता है। ऊंचे दामों पर कपड़ा और यूनिफॉर्म बेची जाती है। विद्यार्थी मजबूर हंै। यूनिफॉर्म ऐसी तय करते हैं जो केवल एक ही दुकान पर मिलती है, जहां मैनेजमेंट को बड़ा कमीशन मिलता है। यह खेल प्राय: हर निजी स्कूल में चलता है, लेकिन सरकारें खामोश हैं।
-मंगल चंद डुंगरवाल, नोर्थ टाउन, चेन्नई ।
.............

बच्चों को कोई फायदा नहीं
सरकारी विद्यालयों को लेकर सरकार कोई ना कोई प्रयोग करती रहती है। बार-बार यूनिफॉर्म बदलने से अभिभावकों पर आर्थिक भार पड़ता है। यूनिफॉर्म बदलने से बच्चों और अभिभावकों को कोई फायदा नहीं होने वाला।
-पूनम शर्मा, डीग भरतपुर
.........................

निजी स्कूलों को फायदा
बड़े प्राइवेट स्कूलों की यूनिर्फार्म किसी खास दुकानदार के माध्यम से बेची जाती है। अक्सर स्कूलों के साथ इनकीं पार्टनरशिप होती है। ये स्कूल सरकारी दिशा-निर्देशों के खिलाफ जाते हंै और महंगे दामों पर यूनिफॉर्म बेंचते हंै। सिर्फ मुनाफे के लिए स्कूल बार-बार यूनिफॉर्म बदलते हैं। वैसे भी निजी स्कूलों का लक्ष्य नए-नए तरीके से रुपए कमाना ही रह गया है। बार-बार यूनिफॉर्म बदलना इसका एक उदाहरण है। इसका फायदा सिर्फ निजी स्कूल संचालकों को ही होता है।
-अतुल सर्राफ, रीवा, मप्र
.............

यूनिफॉर्म बदलना अनुचित
विद्यालय की गणवेश विद्यालय की पहचान होती है। गरिमा है। एक ही पोषाक में विद्यार्थियों के आने से अमीरी गरीबी की रेखा नहीं दिखती है। समान पोशाक से समानता, समाजवाद के भाव परिलक्षित होते हैं। बार-बार यूनिफार्म बदलने पर अभिभावको पर आर्थिक भार बढ जाता है। विद्यार्थियों में पलायन के भाव पैदा होते हैं। इससे मध्यमवर्गीय अभिभावक अधिक परेशान होते हंै। वैसे ही प्रतिस्पर्धा के युग में शिक्षा महंगी हो गयी है। ऐसी स्थिति में विद्यालय चाहे निजी हो या सरकारी, शाला पोशाक बार-बार बदलना सम्यक नहीं है।
-विद्याशंकरपाठक, सरोदा, डूंगरपुर
...............

कोई फर्क नहीं पड़ेगा
बार-बार स्कूल की ड्रेस बदलने से पढ़ाई में कोई फर्क नहीं पडऩे वाला। आज ड्रेस को बदलने की बातें हो रही हैं, कल साइकिल का रंग बदलने की होगी। कुल मिलाकर सरकारें हर काम को अपना प्रचार का जरिया बनाने लगी हैं।
-रजनीश कुमार जैन, देवातू, जोधपुर
..............

बार-बार न बदले यूनिफॉर्म और किताबें
बार-बार स्कूल यूनिफॉर्म बदलने से नुकसान ही है। स्कूल की यूनिफॉर्म और किताबें बार-बार ना बदली जाएं। करोनाकाल में तो ऐसी चर्चा भी देश हित में नहीं है। बच्चों के माता-पिता बड़ी मुश्किल से अपने परिवार का पालन पोषण कर रहे हैं। इसलिए स्कूल यूनिफॉर्म बदलने का तो कोई औचित्य ही नहीं है।
-हेमंत खत्री, हिंडौन सिटी, करौली
........................

मूलभूत सुविधाओं पर ध्यान दें
बदलती सरकारों के प्रयोगों के चलते पाठशालाएं अब प्रयोगशालाएं बनती जा रही हैं। यूनिफॉर्म, साइकिल के रंग, पाठ्यक्रम, आदि में बदलाव का अभियान जारी है। विद्यालयों की मूलभूत सुविधाओं व शैक्षिक स्तर की ओर कोई ध्यान नहीं दिया जा रहा।
-कैलाश सामोता, कुंभलगढ़ दुर्ग, राजसमंद
............

सभी स्कूलों की यूनिफॉर्म एक ही हो
बार-बार स्कूल यूनिफॉर्म बदलने की बजाय शिक्षा की गुणवत्ता में सुधार का लक्ष्य बनाया जाए। स्कूलों के बुनियादी ढ़ांचे में सुधार, भामाशाहों के सहयोग से बिल्डिंग निर्माण, स्कूलों में पानी, बिजली, फर्नीचर, पुस्तकालय, लड़कियों के लिए अलग टॉयलेट, खेल-कूद की सुविधाएं मुहैया कराने का सरकारी संकल्प जरूरी है। जहां तक स्कूल यूनिफॉर्म का सवाल है, मेरी दृष्टि में सरकारी व निजी स्कूलों में सारे देश में एक ही तरह की यूनिफॉर्म रखी जाए। इससे विद्यार्थियों में राष्ट्रीय एकता व अखंडता की भावना जाग्रत होगी।
-शिवजी लाल मीना, मानसरोवर, जयपुर
...........

कोढ़ में खाज
बार-बार स्कूल यूनिफार्म में बदलाव से अभिभावकों पर कोराना काल में आर्थिक भार के सिवाय कुछ नहीं होने वाला है। सरकारें भले ही अपनी राजनीतिक महत्वाकांक्षा पूरी कर लें, अन्तत: आर्थिक भार तो आम जनता पर ही पड़ता है। माना कि समय के साथ बदलाव जरूरी है, लेकिन इसके लिए भी कोई समय सीमा तो तय होनी चाहिए। सरकार का यह फैसला आमजन के लिए 'कोढ़ में खाजÓ का काम करेगा।
-डॉ. राकेश कुमार गुर्जर, सीकर
.......................

अतिरिक्त आर्थिक भार
बार-बार स्कूल यूनिफॉर्म बदलने से इस कोरोना महामारी में अतिरिक्त आर्थिक भार बढ़ जाएगा। यूनिफॉर्म बदलने की जगह स्कूलों के अंदर विभिन्न संसाधनों की आपूर्ति की जाए, जिसमें कंप्यूटर शिक्षा को प्राथमिकता पर रखा जाए
-अजय सिंह सोलंकी,कोटा
...........

कैसे खरीदेंगे नई यूनिफॉर्म
सरकारी विद्यालयों में पढ़ रहे बच्चों की ड्रेस को बार-बार बदलना अनुचित और असंगत है , क्योंकि इन स्कूलों में अधिकतर बच्चे गरीब परिवारों के ही होते हैं। वे अपनी एक ड्रेस एक साल से अधिक समय के लिए काम में लेते हैं। वे हर साल नई ड्रेस के लिए पैसे की व्यवस्था नहीं कर सकते। इस महामारी के समय में तो हर वर्ग आर्थिक मंदी से गुजर रहा है। ऐसे समय में नई ड्रेस लागू करना अनुचित है।
-प्रभु दयाल रायसिंहनगर श्री गंगानगर
................

अभिभावकों के लिए परेशानी
विद्यालय पोशाक में सामयिक बदलाव होना गलत नहीं है, लेकिन यह कार्य प्रयोग मात्र के लिए किया जा रहा है तो अभिभावकों के लिए परेशानी पैदा करेगा।
-डॉ. कमल पाल केतु, जोधपुर

shailendra tiwari
और पढ़े
हमारी वेबसाइट पर कंटेंट का प्रयोग जारी रखकर आप हमारी गोपनीयता नीति और कूकीज नीति से सहमत होते हैं।
OK
Ad Block is Banned