बदले रिश्तों की मुट्ठी में कैद दिल्ली की चाबी

बदले रिश्तों की मुट्ठी में कैद दिल्ली की चाबी

Amit Kumar Bajpai | Publish: Mar, 14 2019 01:15:04 PM (IST) विचार

  • नीतीश-भाजपा के नए नाते की उम्र तय करेगा आम चुनाव
  • लालू बिना लाल का तेज भी कसौटी पर
  • बिहार में लोकसभा चुनाव को लेकर अलग है माहौल

आलोक कुमार मिश्रा, पटना से

पांच बसंत बीतते-बीतते बिहार में सियासी रिश्तेदारियां बिल्कुल बदल चुकी हैं। मोदी को रोकने के लिए पड़ोस के उत्तर प्रदेश में बीती बिसार कर बुआ और बबुआ भले एक हो गए हैं, लेकिन बिहार में कभी इसी मकसद से एक हुए चाचा-भतीजा अब आपस में रार ठाने बैठे हैं। चाचा नीतीश की सरकार में नायब रहे तेजस्वी अब यहां विपक्षी महागठबंधन की धुरी हैं। पिछले आम चुनाव में नरेन्द्र मोदी को प्रधानमंत्री पद का दावेदार बनाए जाने से नाराज नीतीश ने तब राजग से 17 साल पुराना नाता एक झटके में तोड़ लिया था, लेकिन अब वे गठबंधन में 17-17 सीटों के साथ भाजपा के बराबर के हिस्सेदार हैं।

सब इतनी तेजी से बदला जैसे पहले से तय था

2014 की गर्मियों से 2019 के बसंत तक बिहार ने सियासत का शीर्षासन देखा है। पिछले आम चुनाव में मोदी लहर ने जमीन पर ला दिया तो दो दशकों से दूर-दूर रहे नीतीश और लालू 2015 के विधानसभा चुनाव में जातीय समीकरण साधने के लिए सेक्युलर गठजोड़ बनाकर जुड़े और सरकार बनाई। नीतीश मुख्यमंत्री बने और लालू के दोनों लाल सरकार में अहम ओहदों पर बैठे।

साल बीतते-बीतते गठजोड़ की दरारें उभरनी शुरू हो गईं और अंतत: 26 जुलाई 2017 को नीतीश ने अंतरआत्मा की आवाज का हवाला देते हुए इस्तीफा दे दिया। 1974 में जयप्रकाश आंदोलन में बतौर छात्र नेता साथ सियासी सफर शुरू करने वाले लालू-नीतीश की राहें फिर जुदा हो गईं। सब कुछ इतनी तेजी से हुआ जैसे पहले से ही तय हो। भाजपा ने समर्थन की पेशकश की और चंद घंटे बाद ही नीतीश नए साथी के साथ फिर सत्ता में आ गए।

'अंतरआत्मा की आवाज' बनाम 'मौकापरस्ती'

राजद ने नीतीश की अंतरआत्मा की आवाज को छल और मौकापरस्ती बताते हुए सड़कों पर संघर्ष का ऐलान कर दिया। अवसान की ओर बढ़ते लालू ने संभवत: इसमें भी मौका देखा। मौका, दोनों बेटों के लिए खुद लड़कर सियासत सीखने का। तेजस्वी राजद का नया चेहरा बने। पुराने नेता कसमसाते हैं, लेकिन अब तमाम फैसले तेजस्वी के ही हाथ हैं। यह चुनाव तेजस्वी का बड़ा इम्तिहान साबित होगा।

गठजोड़ धराशायी होने के बाद महागठबंधन की साझीदार रही कांग्रेस भी बड़ी मुश्किल में घिरी। मंत्री रहे कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष अशोक चौधरी डगमगाए। खबरें आईं कि चौधरी कई विधायक लेकर नीतीश से जा मिलेंगे। आखिरकार उन्हें निलंबित किया गया और अब वे जदयू में हैं।

 

...लालू यादव अब जेल, बेल, बीमारी और कुनबे की कलह के भंवर में उलझे हुए हैं

इस दौरान एक और तस्वीर बदली। 2014 में नीतीश ने जिस जीतन राम मांझी को अपनी जगह मुख्यमंत्री बनाया था, वे भी अब खेमा बदल चुके हैं। मांझी समाज के नेता जीतन अब महागठबंधन में शामिल हो गए हैं। अब राजग और राजद दोनों के लिए स्थितियां काफी बदली हुई हैं। आडवाणी का रथ रोककर करीब दो दशकों से भाजपा विरोध का बड़ा चेहरा रहे लालू यादव अब जेल, बेल, बीमारी और कुनबे की कलह के भंवर में उलझे हुए हैं।

कभी पटना से दिल्ली तक भारी-भरकम दखल रखने वाले शरद यादव अपनी ही पार्टी से बेगाने होकर नेपथ्य में चले गए हैं। अटल सरकार में कद्दावर मंत्री रहे यशवंत सिन्हा मोदी सरकार के विरोध में खड़े हैं, तो स्टार प्रचारक रहे सिने स्टार शत्रुघ्न सिन्हा बयानों के तीर से भाजपा को ही घायल करने पर आमादा हैं। जनता में नीतीश की छवि भी अब पहले जैसी नहीं रही। कुछ लोग उनके बार-बार पाला बदलने से निराश हैं, तो कुछ बिहार में फिर से भ्रष्टाचार और अपराध के सिर उठाने से नाराज।

जातियों का गुणा-भाग सबसे बड़ा फैक्टर

बिहार की सियासत बार-बार घूम-फिर कर जातियों के गणित पर ही आ टिकती है। चुनाव करीब आते-आते विकास और तमाम मुद्दे हाशिए पर चले जाते हैं। इस बार पाले-खेमे उलट-पुलट हो चुके, लेकिन एक चीज नहीं बदली। इस बार भी जातियों का गुणा-भाग ही सबसे बड़ा फैक्टर होगा। हां, इतना तय है कि 2019 के संग्राम में बिहार की जीत-हार इसका फैसला करने में अहम भूमिका निभाएगी कि अगली बार दिल्ली की कुर्सी किसे मिलेगी और कौन चूक जाएगा।

 

वोट बैंक में सेंध लगाकर अपना आधार बढ़ाने के लिए नीतीश ने नई सोशल इंजीनियरिंग की...

आम चुनाव के परिणाम यह भी तय करेंगे कि जदयू और भाजपा के इस बार के नाते की उम्र क्या होगी? क्या भाजपा करीब सालभर बाद ही होने वाले विधानसभा चुनाव में भी नेतृत्व नीतीश को सौंपेगी? मौजूदा उप मुख्यमंत्री सुशील मोदी, केंद्रीय मंत्री अश्विनी चौबे, फायरब्रांड नेता गिरिराज सिंह की महात्त्वाकांक्षाएं नीतीश को कब तक स्वीकार करती रहेंगीं?

वोट बैंक और चुनौतियां

बार-बार नए समीकरणों से सरकार बनाते रहे नीतीश कुमार का राजद की तरह ठोस और अचल वोट बैंक नहीं है। राजद के वोट बैंक में सेंध लगाकर अपना आधार बढ़ाने के लिए नीतीश ने नई सोशल इंजीनियरिंग की। ओबीसी से ईबीसी (एक्सट्रीमली बैकवर्ड क्लास) और दलितों में से अलग कर महादलित बनाए। नौकरियों और योजनाओं में इन्हें अलग से लुभाने के प्रयास किए। उन्हें इसका लाभ भी मिला। माना जाता है कि नीतीश अकेले नहीं जीत सकते। उन्हें राजद या भाजपा के साथ रहने पर फ्लोटिंग वोट बैंक का लाभ मिल जाता है।

शराबबंदी की वजह से नीतीश को महिलाओं का व्यापक समर्थन मिला। यह फायदा इस बार आम चुनाव में राजग को कितना मिलेगा, यह देखना दिलचस्प होगा। राजद की राजनीति 'एम-वाइ' (मुस्लिम-यादव) फार्मूले पर चलती है। लालू की गैर-मौजूदगी में अपने पुख्ता वोट बैंक को एकजुट रखना तेजस्वी के लिए बड़ी चुनौती होगी। यहां पहले भाजपा को सवर्णों का स्पष्ट समर्थन रहा, लेकिन बाद में उसने लोक जनशक्ति पार्टी (एलजेपी) और अन्य राजद विरोधियों से मिलकर अपना आधार पिछड़ी जातियों में भी बनाने में कामयाबी पाई। कांग्रेस अपने पुराने काडर और मुस्लिम वोट पर निर्भर रहती है। एलजेपी, रालोसपा, वाम दल आदि का छोटे-छोटे पॉकेट्स में अपना पुख्ता आधार है।

कुशवाहा नए मौसम विज्ञानी!

दामन में विद्रोह और संघर्ष का लंबा इतिहास समेटे बिहार में हाल तक राजग का हिस्सा और केंद्र में मंत्री रहे रालोसपा के उपेन्द्र कुशवाहा ने भी चुनावों से ऐन पहले पाला बदला। अब वे महागठबंधन का हिस्सा हैं और मोदी-नीतीश को हराने की हुंकार भर रहे हैं। 'अचूक मौसम विज्ञानी' माने जाने वाले लोजपा के रामविलास पासवान इस बार भी हैं तो राजग खेमे में ही, लेकिन उनके तेवर कुछ तल्ख नजर आ रहे हैं। सियासत के जानकार कुशवाहा को नया 'मौसम विज्ञानी' मान रहे हैं।

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