scriptBihar through a phase of politics of dilemma | बिहार में विकल्पहीनता और लाचारी की राजनीति का दौर | Patrika News

बिहार में विकल्पहीनता और लाचारी की राजनीति का दौर

तैयार की जाने लगी है आम चुनाव की पृष्ठभूमि

Published: June 02, 2022 11:03:11 pm

प्रियरंजन भारती
वरिष्ठ पत्रकार

राज्यसभा तथा राष्ट्रपति के चुनाव के साथ ही आगामी विधानसभाओं और 2024 के आम चुनाव की पृष्ठभूमि तैयार की जाने लगी है। इस लिहाज से उत्तर प्रदेश के साथ बिहार एक महत्त्वपूर्ण राज्य है। बिहार में भाजपा सत्ता में रहते हुए भी मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की राजनीतिक शैली के चलते परेशानियों का सामना कर रही है। जनाधार की अनुकूलता के बावजूद वह विकल्प नहीं बन पा रही है। गौर करें तो 1995 में समता पार्टी के काल से भाजपा का सहयोग लेते हुए 17 सालों के मुख्यमंत्रित्व काल में नीतीश कुमार ने ही कभी कोई विकल्प बनने नहीं दिया। भाजपा के भरपूर सहयोग व समर्थन का लाभ तो लिया पर किसी और नेता की भाजपा से नजदीकी कभी बर्दाश्त नहीं की। राज्यसभा की पांच सीटों के लिए हो रहे चुनाव में केंद्रीय इस्पात मंत्री व पार्टी में दूसरे नंबर के स्वाभाविक बड़े नेता रामचंद्र प्रसाद सिंह (आरसीपी) को उम्मीदवार न बनाकर नीतीश ने फिर वही कर दिखाया है। इनकी जगह झारखंड जदयू के प्रदेश अध्यक्ष खीरू महतो को इस तर्क के साथ उम्मीदवार बना दिया कि आरसीपी को हर तरह के अवसर दिए गए, पार्टी हित में शुरू से काम करने वाले नेताओं को भी मौका देना जरूरी है। दरअसल भाजपा नेतृत्व से आरसीपी की नजदीकियां ही यह पटकथा तैयार कर गई कि उन्हें नीतीश अब और आगे नहीं बढऩे देंगे।
फाइल फोटो
फाइल फोटो
आरसीपी एकमात्र उदाहरण नहीं हैं। पहले भी ऐसे अनेक उदाहरण नीतीश पेश कर चुके हैं। समता पार्टी के दौरान जॉर्ज फर्नांडिस के करीबी रघुनाथ झा ने पार्टी की कार्यशैली से तौबा कर 2003 में इस्तीफा दे दिया। वह नीतीश कुमार से आजिज आकर आरजेडी में शामिल हो गए। नीतीश कुमार अपने सहयोगी भाजपा के बल पर सत्ता शीर्ष पर बने रहे और हमेशा जरूरत आने पर उसी पर दबाव बनाया और सौदेबाजी उसी से की। ऐसा करते रहने के साथ-साथ उन्होंने सहयोगी दल के करीबी हो चुके नेताओं को आगे बढऩे से हमेशा ही रोक दिया। इस सूची में पार्टी के दिग्गज जॉर्ज फर्नांडिस, शरद यादव, दिग्विजय सिंह, उपेंद्र कुशवाहा, पीके सिन्हा जैसी हस्तियां शामिल हैं। नीतीश के नजदीकी उपेंद्र कुशवाहा बेशक आज उनकी पार्टी में अहम पद पर हैं मगर 2007 में उन्हें भी नीतीश कुमार की नाराजगी झेलनी पड़ी। फिर 2009 में वह जदयू में आए और 2013 में तंग आकर पार्टी छोड़ दी।
इसी तरह 2004 में पार्टी अध्यक्ष बनाए गए दिग्गज समाजवादी नेता जॉर्ज फर्नांडिस को 2009 में नीतीश कुमार ने मुजफ्फरपुर से उम्मीदवार नहीं बनाया और कैप्टन जयनारायण निषाद को खड़ा कर दिया। जेपी आंदोलन के दौरान मुजफ्फरपुर जेल में रेकॉर्ड मतों से जीत दर्ज करने का कीर्तिमान बना चुके जॉर्ज निर्दलीय चुनाव मैदान में उतरे तथा बुरी तरह पराजित रहे। बाद में उन्होंने जदयू छोड़ दिया। नीतीश कुमार ने जॉर्ज को अध्यक्ष पद से भी बेदखल कर शरद यादव को यह जिम्मेदारी दे दी। रक्षा मंत्री रहे जॉर्ज फर्नांडिस जदयू के ऐसे नेताओं में गिने जाते हैं जिनकी भाजपा से नजदीकी बेहद बढ़ चुकी थी। इस शृंखला में जदयू नेताओं के बड़े नाम हैं जो नीतीश कुमार का कोपभाजन महज इस कारण बनते रहे कि भाजपा से उनका मेल-जोल बढ़ चुका था।
प्रखर समाजवादी नेता कर्पूरी ठाकुर से नीतीश का परिचय करवाने वाले शरद यादव का इस्तेमाल जॉर्ज फर्नांडिस को अध्यक्ष पद से बेदखल करने के लिए किया गया। 2017 में यादव का नीतीश कुमार से मतभेद बढ़ा तो राज्यसभा सीट तक उन्हें गंवानी पड़ गई। वह एक ऐसे दिग्गज समाजवादी नेता थे जिन्होंने शुरुआत में समर्थन कर नीतीश को मुख्यमंत्री बनवाया, लेकिन फजीहत झेलकर अंतत: उन्हें जदयू से बाहर का रुख करना पड़ा। तब उन्होंने अलग ही पार्टी का गठन कर लिया था।
यह सब केवल इसलिए होता आ रहा है क्योंकि नीतीश भाजपा की दुखती नस को जमकर दबाए हुए हैं। यह नस विकल्पहीनता की है। यह नस दबाए रखकर नीतीश राज्यसभा से लेकर राष्ट्रपति चुनाव और अगले साल हो रहे विधानसभा चुनावों से लेकर आगामी आम चुनावों तक भाजपा के आगे भाग जाने का भय दिखाते हुए उसका भयादोहन करते रहेंगे। बीते कुछ महीनों में वह इफ्तार दावतों व जातिगत जनगणना के बहाने तेजस्वी और लालू परिवार से निकटता का खूब दिखावा कर चुके हैं।

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