ब्रेक्सिट पर बवंडर

जून 2016 में ब्रेक्सिट पर जनमत संग्रह के दौरान टेरेसा मे ने ईयू के साथ ब्रिटेन के बने रहने के पक्ष में प्रचार किया था, पर प्रधानमंत्री बनने के बाद उन्होंने जनादेश के सम्मान का वादा किया।

By: सुनील शर्मा

Published: 13 Jul 2018, 10:44 AM IST

- स्वर्ण सिंह, अंतरराष्ट्रीय मामलों के विशेषज्ञ

एक राष्ट्र के इतिहास में हफ्ते भर का वक्त काफी लंबा होता है। ब्रिटेन की प्रधानमंत्री टेरेसा मे द्वारा कल जारी 77 पन्ने के ‘ब्रेक्सिट पर श्वेतपत्र’ के संदर्भ में ब्रेक्सिट मंत्री डेविड डेविस, विदेश मंत्री बोरिस जॉनसन और सत्ताधारी कंजर्वेटिव पार्टी के दो वरिष्ठ उपाध्यक्षों के इस्तीफों ने न सिर्फ टेरेसा मे बल्कि ब्रेक्सिट के भविष्य पर भी सवाल खड़े कर दिए हैं।

लंबे समय से उनकी कैबिनेट के भीतर असहमतियों को लेकर मीडिया में चर्चा थी। पिछले शुक्रवार प्रधानमंत्री के चेकर्स स्थित आवास पर 12 घंटे चली बैठक में इन नेताओं को मिली मात के बाद ये असहमतियां सतह पर आ गईं। उस बैठक में प्रधानमंत्री ने ब्रेक्सिट को लेकर अपनी नरम रणनीति पर एक सहमति कायम करने की कोशिश की थी, जिसका उद्देश्य यूरोपीय संघ (ईयू) के साथ ब्रिटेन के रिश्तों को बिगाडऩे के बजाय महज दोबारा परिभाषित करना था।

चेकर्स की इस बैठक को डेविड डेविस ने टेरेसा मे की ओर से किया गया ‘घात’ करार दिया और सबसे पहले अपना इस्तीफा भेज दिया। इसके बाद टेरेसा मे से असहमत लोगों ने प्रधानमंत्री की ब्रेक्सिट योजना पर अपनी आपत्तियां सार्वजनिक कर डालीं। शायद यही वजह है कि श्वेतपत्र का आखिरी अध्याय इस सवाल को कायदे से संबोधित कर पाने में नाकाम रहा कि यदि बाकी यूरोप ब्रिटेन की बारह मांगों को स्वीकार करने से इनकार कर दे तो ऐसी स्थिति में ब्रिटेन क्या करेगा, जबकि माना जा रहा है कि ब्रिटेन को अगले साल के मार्च तक ही ब्रेक्सिट की प्रक्रिया पूरी कर लेनी है।

आज ब्रेक्सिट में बुनियादी विरोधाभास यह है कि एक ओर जहां ब्रिटेन ने ईयू के एकल बाजार को छोडऩे की प्रतिबद्धता जता दी है, वहीं अब भी ऐसा लग रहा है कि वह ईयू तक अपनी व्यापारिक पहुंच को सबसे मुक्त और अवरोधरहित बनाने में जुटा हुआ है। ब्रेक्सिट पर ब्रिटेन के जनमत और टेरेसा मे की योजना (व्यापार से लेकर सुरक्षा जैसे मसलों पर ईयू के साथ करीबी सहयोग बनाए रखने की) में विरोधाभास नजर आता है। इस लिहाज से तय है कि वे ब्रेक्सिट के तय उद्देश्य बदलना चाहती हैं जिसके निहितार्थ गहरे हो सकते हैं।

ब्रेक्सिट की प्रक्रिया में नौ माह का संक्रमण काल है जिसके बाद मार्च 2019 तक ब्रिटेन ईयू से अलग हो जाएगा। ऐसी खबरें आई हैं कि इस दौरान अचानक मध्यावधि चुनाव हो सकते हैं और नेतृत्व परिवर्तन भी संभव है। सनद रहे कि जून 2016 में ब्रेक्सिट पर जनमत संग्रह के दौरान टेरेसा मे ने ईयू के साथ ब्रिटेन के बने रहने के पक्ष में प्रचार किया था, पर जुलाई 2016 में प्रधानमंत्री बनने के बाद उन्होंने जनादेश का सम्मान करने का वादा किया।

पिछले साल जनवरी में अमरीकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप ने ब्रेक्सिट को ‘महान’ और वैश्विक रुझानों का एक अंश करार दिया था। ट्रंप के वाइट हाउस पहुंचने के बाद अमरीका का दौरा करने वाली टेरेसा मे पहली अंतरराष्ट्रीय नेता बनीं। उन्होंने ईयू छोडऩे के बाद की सबसे बड़ी उपलब्धियों में अमरीका और यूके के बीच के ताजा रिश्ते को गिनवाया था। ट्रंप के ‘अमरीका फस्र्ट’ नारे के साये में एक बेहतर यूएस-यूके व्यापार सौदे की यह उम्मीद भी अब खतरे में नजर आती है। ट्रंप ने अमरीका के सहयोगियों और दुश्मनों दोनों से ही आयात पर शुल्क में भारी वृद्धि कर डाली है। ईयू से आयात पर पहले ही अमरीका में शुल्क काफी कम होता था। लिहाजा ब्रेक्सिट के बाद ब्रिटेन को इस मोर्चे पर कोई खास फायदा देखने को नहीं मिलेगा, जिससे वह ब्रेक्सिट से पडऩे वाले नकारात्मक प्रभाव की भरपाई कर सके।

सत्ता पर टेरेसा मे की पकड़ इतनी ढीली कभी नहीं थी। हालात सुधरने की उम्मीद भी कम ही है। पिछले साल जब यूके ने ट्रंप को आमंत्रित किया था, तब 1.86 मिलियन लोगों ने एक याचिका पर दस्तखत कर कहा था कि उन्हें राजकीय दौरे पर नहीं आना चाहिए क्योंकि उनका अप्रत्याशित और सनकी व्यवहार महारानी को शर्मिंदगी में डाल सकता है और पुलिस को ट्रंप विरोधी प्रदर्शनों को नियंत्रित करने में काफी दिक्कत आ सकती है। आज भी स्थिति यही है। अमरीकी दूतावास ने अमरीकी नागरिकों को ट्रंप की तीन दिवसीय ब्रिटेन यात्रा के दौरान लंदन न आने की सलाह दी है। इस बार पचास हजार से ज्यादा लोगों ने ट्रंप विरोधी प्रदर्शनों के लिए दस्तखत किए हैं।

कल ट्रंप जब हेलसिंकी के लिए निकलेंगे जहां उन्हें रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन से मुलाकात करनी है, तब ब्रिटिश संसद लंबे समय से टल रहे व्यापार विधेयक पर बहस की तैयारी कर रही होगी, जिसे कंजर्वेटिव पार्टी के ब्रेक्सिट बागियों व लेबर पार्टी का समर्थन है। यह विधेयक ब्रिटेन के ईयू कस्टम्स यूनियन में बने रहने का आह्वान करता है।

बहुत संभव है कि सोमवार की इस बहस के वक्त कुछ सांसद टेरेसा मे के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव लाने की कोशिश करें। कंजर्वेटिव पार्टी के केवल 48 सांसदों यानी पूरी संसद के 15 फीसदी द्वारा मांग उठाने पर विश्वास मत करवाया जा सकता है। हालांकि जीत के लिए 158 सांसदों का समर्थन चाहिए। इसलिए फिलहाल टेरेसा मे महफूज दिखती हैं, लेकिन पिछले हफ्ते के इस्तीफों के बाद ब्रेक्सिट की प्रक्रिया को सहजता से आगे बढ़ाने और उसकी कमान अपने हाथ में रखने की उनकी स्थिति कमजोर हुई है।

सुनील शर्मा
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