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Leadership: शैली को गतिशील रूप से बदलने की क्षमता जरूरी

कर्मचारी के व्यवहार भी भावनाओं में निहित होते हैं, जो निरंतर बदलते रहते हैं और उनकी जरूरतों से इनकी उत्पत्ति होती है। आवश्यक है कि संस्थान को प्रगति की ओर अग्रसर करने हेतु एक लीडर या प्रबंधक उनकी भावनाओं को समझे, स्वीकारे और उनके अनुसार अपनी नेतृत्व शैली का चयन करे।

 

Published: March 28, 2022 03:42:58 pm

प्रो. हिमांशु राय
(निदेशक, आइआइएम इंदौर)

श्रीमद्भगवद्गीता में श्रीकृष्ण के नेतृत्व में पांडवों ने विजय प्राप्त की थी। उन्होंने अर्जुन के सारथि के रूप में अपनी भूमिका का अद्भुत रूप से वहन किया और विभिन्न नेतृत्व शैलियों का भी प्रयोग किया। श्रीकृष्ण अर्जुन के मन में जटिल भावनात्मक उथल-पुथल के प्रति संवेदनशील होकर यह जानने में भी सक्षम रहे कि कौन-सी भावनाएं और विचार अर्जुन को भावनात्मक रूप से अप्रत्याशित व दुर्बल बनाते हैं। अर्जुन की दशा व वर्तमान आवश्यकताओं के अनुरूप श्रीकृष्ण अपनी अनुनय शैली को गतिशील रूप से परिवर्तित करते रहे, और अर्जुन को कर्तव्यों की पूर्ति करने में सक्षम होने के लिए सांत्वना व समर्थन देते रहे। इस प्रक्रिया में वे अर्जुन को धर्म के लिए युद्ध लड़ने के लिए प्रेरित करते रहे।
प्रतीकात्मक चित्र
प्रतीकात्मक चित्र
श्रीकृष्ण की ये नेतृत्व शैलियां आज भी प्रासंगिक है, क्योंकि एक सफल लीडर अपने अधीनस्थों की भावनात्मक जरूरतों को समझकर अपनी शैली को गतिशील रूप से बदलने में सक्षम होता है। साथ ही, किस स्थिति में कौन-सी शैली अधिक उपयोगी होगी, इस तथ्य से भी अवगत होता है। उदाहरण के लिए, पांडवों के युद्ध जीतने के बाद युधिष्ठिर को हस्तिनापुर का राजा बनाया गया। अर्जुन ने श्रीकृष्ण से अनुरोध किया कि वे उन्हें गीता ज्ञान फिर से सुनाएं, क्योंकि श्रीकृष्ण ने उन्हें जो कुछ युद्धभूमि पर बताया था, वह उन्हें ज्यादा याद नहीं था। श्रीकृष्ण अर्जुन के अनुरोध की गंभीरता समझते हैं और फिर से 'अनु गीता' के रूप में दिव्य ज्ञान देते हैं। यह धर्म पर एक बहुत लंबा और अधिक विस्तृत प्रवचन है, क्योंकि इस बार पृष्ठभूमि युद्ध की नहीं है। यह ज्ञान प्राप्त करते समय अर्जुन युद्धभूमि में नहीं अपितु एक अलग प्रकार की मानसिक स्थिति में सचेत हैं और दर्शन की गहराई को आत्मसात कर सकते हैं। इस अनु गीता में कर्म योग और ज्ञान योग का विस्तृत वर्णन है, पर श्रीकृष्ण इस बार भक्ति योग के बारे में विस्तार से नहीं बताते हैं और न ही अर्जुन को अपने लौकिक रूप से परिचित कराते हैं।
श्रीकृष्ण आवश्यकताओं, भावनाओं व स्थितियों को समझते हैं और फिर एक निश्चित शैली पर अडिग रहने के बजाय दूसरों के लिए एक उपयुक्त और उचित स्वर, शैली और प्रतिक्रिया तैयार करते हैं। यह उन्हें एक सफल लीडर और संरक्षक बनाता है, जो इस बात पर ध्यान केंद्रित करने में कुशल होता है कि किसी विशेष व्यक्ति को किसी स्थिति में वास्तव में क्या चाहिए। कर्मचारी के व्यवहार भी भावनाओं में निहित होते हैं, जो निरंतर बदलते रहते हैं और उनकी जरूरतों से इनकी उत्पत्ति होती है। आवश्यक है कि संस्थान को प्रगति की ओर अग्रसर करने हेतु एक लीडर या प्रबंधक उनकी भावनाओं को समझे, स्वीकारे और उनके अनुसार अपनी नेतृत्व शैली का चयन करे।

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