दांव पर सीबीआई

जब भारतीय जनता पार्टी विपक्ष में थी वह सीबीआई को 'कांग्रेस ब्यूरो ऑफ इन्वेस्टिगेशन' बता कर उसे निशाना बनाती थी। आज भाजपा सत्ता में है तो कांग्रेस उसे जीबीए यानी 'गुजरात ब्यूरो ऑफ इन्वेस्टिगेशन' बता रही है

By: शंकर शर्मा

Published: 16 Dec 2015, 10:51 PM IST


केन्द्रीय जांच ब्यूरो भी 'गरीब की जोरू' जैसा होता जा रहा है। जब जिसका दांव लगता है वह उसका चीरहरण करने में जुट जाता है। जो पार्टी सत्ता में होती है, उस पर आरोप लगते हैं कि वह अपने हित साधने के साथ विपक्ष को कमजोर करने के लिए उसका रणनीतिक इस्तेमाल करती है। उधर सत्ता पक्ष के पास रटा-रटाया जवाब होता है कि कानून अपना काम करेगा। कल तक जब भारतीय जनता पार्टी विपक्ष में थी वह सीबीआई को 'कांग्रेस ब्यूरो ऑफ इन्वेस्टिगेशन' बता कर उसे निशाना बनाती थी। आज भाजपा सत्ता में है तो कांग्रेस उसे जीबीए यानी 'गुजरात ब्यूरो ऑफ इन्वेस्टिगेशन' बता रही है। दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल के प्रधान सचिव राजेन्द्र कुमार के यहां मंगलवार को पड़ा छापा और उस पर हुआ बावेला इसका एक और उदाहरण है। सीबीआई की आड़ में दोनों पक्ष जिस तरह एक-दूसरे पर कीचड़ उछाल रहे हैं, यह निष्कर्ष निकाल पाना मुश्किल है कि कौन सही और कौन गलत है।

केजरीवाल ने मामले को केन्द्रीय वित्त मंत्री अरुण जेटली की सक्रियता वाले दिल्ली जिला क्रिकेट संघ से जोड़कर और पेचीदा बना दिया है। परिणाम क्या होगा, कोई नहीं जानता लेकिन इतना तय है कि सीबीआई की साख एक बार फिर दांव पर है। क्या सीबीआई को इस तरह जन चर्चाओं में होना चाहिए? क्या वह पहले भी ऐसी रहती थी? और यदि वह ऐसे चर्चाओं में नहीं रहती थी तब अचानक क्या परिवर्तन आए कि अब उसका चोला बदल गया। बुधवार को ही एक चर्चा में ब्यूरो के पूर्व निदेशक जोगिन्दर सिंह कह रहे थे कि किसी प्रधानमंत्री ने उन्हें बुलाकर एक मामले में मदद का आग्रह किया था। इस पर उन्होंने प्रधानमंत्री से लिखित आदेश मांग लिए थे जो आज तक नहीं मिले।

कुल मिलाकर बात यह है कि सीबीआई हो या अन्य कोई संस्था, यदि उसे अपनी इज्जत बचानी है, बनानी है और बढ़ानी है तो उसे ही आगे आकर पहल करनी होगी। कितना भी खराबा हो गया हो लेकिन आज भी जब कोई बड़ा अपराध होता है, मांग सीबीआई जांच की ही की जाती है। क्यों? क्योंकि अभी भी उसकी प्रतिष्ठा है, जनता के मन में उसके प्रति विश्वास है। जरूरत इस विश्वास को बनाए रखने की है।

वैसे तो स्वयं सरकार को भी चाहे वह किसी भी पार्टी की हो यह कोशिश करनी चाहिए कि वह सीबीआई से ऐसा कोई अनुचित काम करने को नहीं कहे जिससे उसकी प्रतिष्ठा पर आंच आए। और यदि कभी वह ऐसी हिमाकत कर भी बैठे तो वैसी ही हिम्मत सीबीआई के निदेशक सहित अन्य आला अफसरों को दिखानी चाहिए जैसी कि जोगिन्दर सिंह ने दिखाई। दबाव सब पर होते हैं जरूरत निष्पक्षता को बनाए रखने की है। केन्द्र को भी सशक्त लोकपाल कानून बनाकर सीबीआई जैसी संस्थाएं उसके अधीन कर देनी चाहिए। तभी सरकार राजनीतिक इस्तेमाल के आरोप से बच पाएगी।
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शंकर शर्मा
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