प्रतिभाशाली खिलाड़ियों को मिले मौका

प्रतिभाशाली खिलाड़ियों को मिले मौका

Vikas Gupta | Publish: Sep, 04 2018 05:24:33 PM (IST) विचार

यह विषय बड़ी चिन्ता का कारण होना चाहिए कि यदि खेलों में प्रतिभाशाली नए लोग यथा समय राष्ट्रीय-अर्न्राष्ट्रीय खेल स्तर पर प्रवेश नहीं पाते तो फिर कॉलेजों, स्कूलों तथा विश्वविद्यालयों में चलाए जा रहे खेल कार्यक्रमों का अर्थ क्या है ?

देश में दिनों-दिन खेलों के विकास के नाम पर जो भी कुछ हो रहा है, उस पर दृष्टिपात किया जाए तो यह स्पष्ट होता है कि खेल उद्योग बनते जा रहे हैं। खेलों के इस व्यावसायीकरण से नए उदीयमान खिलाड़ी सामने नहीं आ पा रहे तथा चन्द जमे-जमाए नाम ही खेल जगत पर छाए हुए हैं। यह विषय बड़ी चिन्ता का कारण होना चाहिए कि यदि खेलों में प्रतिभाशाली नए लोग यथा समय राष्ट्रीय-अर्न्राष्ट्रीय खेल स्तर पर प्रवेश नहीं पाते तो फिर कॉलेजों, स्कूलों तथा विश्वविद्यालयों में चलाए जा रहे खेल कार्यक्रमों का अर्थ क्या है ? 125 करोड़ की आबादी वाले हमारे देश में आज भी यही स्थिति है कि खिलाडि़यों की संख्या की भरमार होनी चाहिए तथा ‘एक खोजो तो हजार पाओ’ वाली स्थिति होनी चाहिए। लेकिन खेलों की राजनीति ने हजारों उदीयमान सशक्त खिलाड़ियों की प्रतिभा को कुंठित करके रख दिया है।

वर्तमान में जिस किसी खेल पर नजर जाती है, उसकी अर्न्तकथा में कोई न कोई राजनीतिक दाँव-पेंच जरूर फँसा हुआ है। उसकी व्यवस्था समूचे रूप से राजनीति से प्रभावित है। खोज करने पर यह बात स्पष्ट हो जाती है कि प्रत्येक खेल के प्रत्येक खिलाड़ी का सम्बन्ध किसी न किसी बड़े राजनेता अथवा दल से है और वह इसी बल पर वहाँ पैर जमाए हुए हैं। उनका चयन रानजीतिक आधार पर हुआ है तथा अब वे कमजोर प्रदर्शन के बाद भी खेल जगत से नहीं हटना चाहते। यदि हटाया जाता है तो उसे दूसरी तरह रंग देकर उछाला जाता है और खेल परिषदों एवं बोर्डो के आंतरिक विवाद गबन, घोटालों तथा अव्यवस्थाओं के चर्चे होने लगते हैं। इस डर से भी बाद में खिलाडि़यों को उनके क्षेत्र से हटाकर नए को ला पाना सहज नहीं रह जाता।

राष्ट्रीय-अन्तर्राष्ट्रीय खिलाडि़यों की स्थिति आज यह है कि वे खेलों से बेखबर होकर अपने लिए आर्थिक लाभों तक सीमित हो गए हैं तथा राजनीतिक उठा-पटक से आर्थिक सहायता कोई पुरस्कार अथवा बड़ा पद हथियाने की फिराक में है। ये खिलाड़ी आज इस स्थिति में है कि इन्हें रहन-सहन, खान-पान तथा ऐयाशी की कोई कमी नहीं है, लेकिन इनकी लिप्साएँ तथा महत्त्वाकांक्षाएँ देश अथवा खेलों के लिए नहीं अपितु स्वयं के वैभवशाली जीवन के लिए केन्द्रित होकर रह गई है। आज टेनिस, क्रिकेट, बैडमिंटन तथा हॉकी एवं फुटबाल के अनेक खिलाड़ी हैं, जो पूरी तरह व्यावसायिक होकर खेल रहे हैं तथा हजारों डॉलर प्रतिवर्ष विदेशी मुद्रा के रूप में कमा रहे हैं। जिनका खेल देखने के लिए भी जमा होती है और यह भीड़ किसी नोसिखिए का खेल नहीं देखना चाहती। भीड़ की रूचियाँ विकृत होती हैं और यह प्रख्यात खिलाडि़यों के खेल प्रदर्शन से ही अपना सम्बन्ध रखना चाहती है। यही नहीं विभिन्न संगठन एवं संस्थाएँ, जो विविध खेलों के मैच टिकटों के जरिए आयोजित करती है और जनता से लाखों रूपये बटोरते हैं। इससे भी खिलाड़ी खेलों को आर्थिक पक्ष से जोड़ता है और उसकी देश के लिए या अपने नाम के लिए खेल की रूचि कम होती है। देश के लिए ऐसे विशिष्ट आयोजनों में ही वे खेलना चाहते हैं जिनमें स्वर्ण पदक के अलावा हजारों, लाखों रूपये पुरस्कार रूप में भी प्राप्त होते हैं। इस अवसर पर वे केन्द्र सरकार से तो आर्थिक लाभ लेते ही हैं, इसके अलावा जिस राज्य सरकार के अन्तर्गत आते हैं, उससे भी भरपूर आर्थिक लाभ लेते हैं।

चन्द प्रख्यात खिलाडि़यों ने इतने लाभ एवं सुविधाएँ प्राप्त कर ली हैं कि यदि वे चाहें तो अब आराम से अपना कार्य करते हुए नए प्रतिभाशाली लोगों को खेलों के गुर बताएँ तथा उन्हें तैयार करें। लेकिन प्रोत्साहित करना तो दूर, अभी उनकी अपनी लिप्ताएँ ही अधूरी हैं और वे खेल व्यवसाय का पूरा लाभ लेने की चिन्ता में हैं। बड़े-बड़े व्यावसायिक प्रतिष्ठानों में अधिकारी स्तर के पदों पर कार्य कर रहे हैं, अधिकारी स्तर के पदों पर कार्य कर रहे हैं, अधिकारी स्तर को नौकर-चाकर, बंगला-कोठी कार की सुविधा है, लेकिन खेलों का लाभ मिलने से बड़े-बड़े सरकारी पदों पर विराजमान हैं। वे नहीं चाहते है कि अब नए खिलाडि़यों के लिए काम किया जाए। यही नहीं, वे अपने खेल में विफल अथवा सेवानिवृत होने के बाद विभिन्न सरकारी, गैर-सरकारी खेल संगठनों एवं संघों के अध्यक्ष तथा पदाधिकारी बनने की तिकड़म में लड़ाते हैं और खेल व्यवसाय को जारी रखते हैं। फिर, वे लोग इन संगठनों में मनमानी, पक्षपात एवं गुटबाजी फैलाते हैं तथा अपने लोगों को खिलाडि़यों के नाम पर प्रवेश दिलाते हैं। इस व्यवस्था में सैंकड़ों में खिलाड़ी उपेक्षित रह जाते हैं जो चयनित खिलाड़ी से हर दृष्टि से श्रेष्ठ रहे हैं। वे श्रेष्ठ उपेक्षित खिलाड़ी कुछ समय बाद खेलकूद भूलकर अपने परिवार के लिए रोटी एवं जीविकोपार्जन में पिल जाते हैं और कई मामलों में तो खेलों में पिछड़ने की कुण्ठा जिन्दगीभर उसे टीसती रहती है और यह घाव जब-तब हरे होकर उसे मानसिक रूप से विकृत एवं रूग्ण करते हैं। प्रारम्भ में खिलाड़ी की महत्त्वांकाक्षाएँ अपने तथा देश के नाम को ही रोशन करने की होती है, लेकिन लम्बे समय तक एक ही खेल में पाँव जमने के बाद उसका व्यावसायीकरण होने लगता है तथा वह इस प्रवृत्ति से निजात केवल नए-नए खिलाडि़यों को प्रवेश देकर पाई जा सकती है, क्योंकि नया खिलाड़ी प्रारम्भिक स्थिति में कुछ करिश्मा करने के मूड में रहता है।

तात्पर्य यह नहीं है कि खिलाडि़यों को लाभ अथवा आर्थिक सहायता नहीं दी या ली जानी चाहिए, प्रश्न यह है कि खेलों को व्यवसाय बनने से रोका जाना चाहिए। चूँकि इन्हें व्यवसाय का लर्जा प्रदान करने के लिए खिलाड़ी ज्यादा जिम्मेदार है। अतः उसी के स्तर पर पहल होनी चाहिए ताकि नए खिलाड़ी भी अपने एवं देश के लिए कुछ उल्लेखनीय कार्य कर सकें। इससे लाभ का प्रतिशत भी बढ़ेगा तथा सीमित खिलाडि़यों के बजाय ज्यादा खिलाड़ी लाभांवित हो सकेंगे। विदेशों में जाकर व्यावसायिक रूप से खेल रहे खिलाडि़यों को प्रतिबन्धित किया जाना चाहिए और देश के लिए खेलने के लिए प्रेरित किया जाना चाहिए। आज जिस प्रमुख खेल को देखा जाए, उसी में हम पिछड़े रह गए हैं और छोटे-छोटे देशों से परास्त हो रहे हैं। एशियाड- 82 में भी हम खेलों में कोई उल्लेखनीय करिश्मा नहीं कर पाए थे। विश्व हॉकी में भी पिट गए। जिन खेलों के पदक एवं हमारे पास वर्षो तक रहे हैं वे शनैःशनैः हमसे छिन रहे हैं। खिलाड़ी खेलने के अभ्यस्त बस इस रूप में हो गए हैं कि विदेशों का दौरा होगा। खेल विशेष में उसकी सूक्ष्म तकनीक के लिए अब खिलाड़ी सजग नहीं रहे हैं। उनकी सजगता और चेतना खेल में चयन तक तो जागृत रहती है, लेकिन उसमें छा जाने के बाद वह खेलों के प्रति उपेक्षित रहते हैं और वहाँ मात्र बने रहकर लाभ कमाना चाहते हैं। खेलों के प्रति खिलाडि़यों की यह भावना ही खेलों में पिछड़ने तथा अपनी छवि धूमिल करने के लिए पूरी तरह जिम्मेदार हैं।

यहाँ यह भी तात्पर्य नहीं है कि विश्व के तमाम खेलों का अग्रणी हमारा देश ही बन जाए, बल्कि कथन यह है कि हम हारें या जीतें, लेकिन कुछ ऐसा प्रदर्शन तो करें, जो स्मरणीय प्रदर्शनीय और दर्शनीय हो। परन्तु इन मामलों में भी हमारे खेल खत्म हो रहे हैं और केवल आर्थिक आपा-धापी में रत हो गए हैं। महिला खिलाडि़यों के टिकट पर होने वाले शो भी व्यवसाय की श्रेणी में आते हैं। चालक व धन्धेबाज जनता इस बात से बेखकर हैं कि यह सब खेलों में प्रदूषण की तरह फैलता जा रहा है और यह धीमा जहर खेलों के लिए आत्मघाती साबित होगा। लोग टिकिटों से चन्द नामधारियों का खेल देखकर उन्हें धनाढ़्य कर रहे हैं और नए खिलाडि़यों की उपेक्षा कर उनकी संभावनाओं के लिए चुनौती बन रहे हैं। इसलिए खेलों को व्यवसाय बनने से रोकने के लिए सरकारी स्तर पर तो प्रयास होने ही चाहिए, जन चेतना भी इस मामलों में महती भूमिका रखती है। स्वयं खिलाडि़यों को भी अपने प्रतिभाशाली साथियों के लिए अच्छा और रचनात्मक रूख अपना कर उन्हें प्रोत्साहित करना चाहिए फिर कोई कारण नहीं है कि हम खेलों में पिछड़े रहे अथवा बार-बार परास्त हों।

चन्द्रकान्ता शर्मा

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