क्षमतावान राजनीतिज्ञों की दरकार

क्षमतावान राजनीतिज्ञों की दरकार

Sunil Sharma | Publish: Sep, 04 2018 01:18:09 PM (IST) विचार

आज के दौर में राजनीतिज्ञों की जमकर परीक्षाएं ली जा रही हैं। तमाम मजबूरियों के बावजूद जनता अपनी लड़ाई में अपने साथ अपने जनप्रतिनिधि को भी खड़े देखना चाहती है, भले ही वह काम होने वाला ही न हो।

- महेश भारद्वाज, विश्लेषक

मौजूदा दौर की राजनीति के बारे में यह बार-बार कहा जा रहा है कि इसमें वही टिक पाएगा जो पूर्णकालिक तौर पर इसे अपनाएगा। अर्थात जो लोग राजनीति को पार्ट-टाइम तौर पर करना चाहते हैं उनके लिए कम से कम इस दौर में तो सफलता की संभावनाएं कम ही हैं। एक लोकतांत्रिक देश में जब चारों ओर राजनीति छाई हो और ड्राइविंग सीट पर राजनीतिज्ञ ही बैठे हों तो ऐसी सोच स्वाभाविक है।

यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी कि अब तो देश में किसी भी बड़े बदलाव की सफलता भी उसे मिलने वाले राजनीतिक समर्थन पर निर्भर रहने लगी है। फिर चाहे आर्थिक सुधार हों, खेल सुधार हों या प्रशासनिक सुधार। अब तो सामाजिक व सांस्कृतिक सुधारों के लिए भी राजनीतिक समर्थन जरूरी लगने लगा है। अन्ना आंदोलन का ताजा उदाहरण है जिसमें जोर-शोर से कहा गया था कि इस आंदोलन का राजनीति से कोई लेना-देना नहीं। बाद में हमने देखा कि इस आंदोलन से जुड़े लोगों ने ही आम आदमी पार्टी बनाई। राजनीति से दूरी की बात करने वाले अन्ना हजारे के आंदोलन का हश्र सब जानते ही हैं। जाहिर है सब जान गए हैं कि इस मुल्क में कुछ भी करने के लिए राजनीतिक संबल जरूरी है। यह बात अलग है कि कुछ लोग सीधे तौर पर राजनीति मे हैं तो कुछ लोग पर्दे के पीछे हैं लेकिन है सबके केंद्र में राजनीति ही।

एक तथ्य यह भी है कि राजनीति में बढ़ते विश्वास के बीच पिछले सत्तर बरस के दौरान विविध घटनाक्रमों ने जनता का विश्वास राजनीतिज्ञों पर से कुछ डिगा सा दिया है। यही वजह है कि आज के दौर में राजनीतिज्ञों से जनअपेक्षाएं पहले के मुकाबले बढ़ रही हैं। राजनीतिज्ञों की जमकर परीक्षाएं ली जा रही हैं। तमाम मजबूरियों के बावजूद जनता अपनी लड़ाई में अपने साथ अपने जनप्रतिनिधि को भी खड़े देखना चाहती है, भले ही वह काम होने वाला ही न हो। इसे यों भी कहा जा सकता है कि जनता अपने दुख और सुख दोनों को अपने जनप्रतिनिधि से बांटना चाहती है।

सवाल उठता है कि जिस स्तर की सहभागिता की उम्मीद जनता जनप्रतिनिधियों से रखती है, क्या वह सबके बस की बात है? जाहिर है 18-20 घंटे काम करने की क्षमता के साथ-साथ उसकी बौद्धिक क्षमता होनी चाहिए। फिर बौद्धिक क्षमता के बिना तो दांवपेच की राजनीति में कामयाब हुआ नहीं जा सकता। इतनी बड़ी आबादी वाले मुल्क में दोनों तरह से क्षमतावान लोगों के मिलने में कोई समस्या नहीं होनी चाहिए।

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