कब होगा खुशहाल बचपन और देश?

Sunil Sharma

Publish: Nov, 15 2017 01:05:41 PM (IST)

Opinion
कब होगा खुशहाल बचपन और देश?

शायद ही ऐसा कोई दिन होता होगा जबकि समाचार पत्र या टेलीविजन के जरिए बाल यौन शोषण की घटना सामने नहीं आती हों

- पंकज चौधरी

बाल यौन शोषण के खिलाफ जैसे ही हम अपनी चुप्पी तोड़ेंगे और लोगों को जागरूक करेंगे तो अपराधियों का मनोबल कमजोर होगा । इससे बाल शोषण व हिंसा की दर में स्वत: कमी आएगी। अपराधियों से डरें नहीं बल्कि इस दिशा में जन-जागरूकता अभियान बड़ा कदम हो सकता है।

शायद ही ऐसा कोई दिन होता होगा जबकि समाचार पत्र या टेलीविजन के जरिए बाल यौन शोषण की घटना सामने नहीं आती हों। देश के कोने-कोने से ऐसी घटनाएं सामने आती रहती हैं जो रौंगटे खड़े कर देती हैं। ये घटनाएं हमारी सभ्यता, संस्कृति, परंपरा और आधुनिकता को भी कठघरे में खड़ा कर देती हैं। बाल यौन शोषण के कई रूप हैं जो समय-समय पर प्रकट होते रहते हैं।

पिछले दिनों दिल्ली के रोहिणी इलाके से एक ऐसी घटना सामने आई, जिसमें पुलिस ने 10 ऐसे आरोपितों के खिलाफ मुकदमे दायर किए हैं जिन्होंने दो मासूम बच्चों को पहले तो चोरी के इल्जाम में फंसाकर उन्हें प्रताडि़त किया। और फिर, उन दोनों नाबालिगों पर एक दूसरे से अप्राकृतिक यौनाचार करने का दबाव भी बनाया। यह लोगों की विकृत और घृणित होती जा रही मानसिकता को उजागर करता है। समझ नहीं आता कि आखिर कुछ लोग मासूम से मासूम और पवित्र से पवित्र थाती को भी ‘खेल और मनोरंजन’ में तब्दील कर देना चाहते हैं। गनीमत है कि यह मामला दिल्ली पुलिस के संज्ञान में आ गया। लेकिन, बाल यौन शोषण की ऐसी घटनाएं रोजाना घटती रहती हैं और उसकी खबरें आम लोगों तक पहुंच भी नहीं पाती हैं।

नेशनल क्राइम रिसर्च ब्यूरो की एक रिपोर्ट के अनुसार देश में रोजाना 40 बच्चे बलात्कार के शिकार होते हैं, 48 के साथ दुराचार होता है, 10 बच्चे ट्रैफिकिंग (दुव्र्यापार ) के शिकार होते हैं। हर 6 मिनट में एक बच्चा लापता हो जाता है। यही नहीं दुव्र्यापार और लापता हुए बच्चों का भी इस्तेमाल किसी न किसी रूप में यौन शोषण के लिए ही किया जाता है। बाल यौन शोषण और हिंसा की घटनाएं हमारे आसपास घटती रहती हैं। स्कूल, चौक-चौराहे, घर-परिवार ऐसी कोई जगह नहीं बची है जहां बच्चों के साथ यौन शोषण और दुराचार जैसी अमानवीय घटनाएं नहीं हो रही हों। लेकिन, यह सब देख और सुनकर भी हम चुप रह जाते हैं। इसके खिलाफ आवाज नहीं उठाते। पता नहीं हमारी संवेदनाओं को क्या हो गया है?

बाल यौन शोषण के खिलाफ जैसे ही हम अपनी चुप्पी तोड़ेंगे और अपने साथ लोगों को जागरूक करेंगे तो अपराधियों का मनोबल कमजोर होगा और बाल शोषण व हिंसा की दर में स्वत: कमी आ जाएगी। अपराधियों से डरने की कोई जरूरत नहीं है। इस दिशा में जन-जागरूकता अभियान एक बड़ा कदम हो सकता है। और इसी उद्देश्य के साथ नोबेल शांति पुरस्कार विजेता कैलाश सत्यार्थी ने हाल ही में देशव्यापी भारत यात्रा का आयोजन किया। इस जन-जागरूकता अभियान में देश के 12 लाख से ज्यादा लोग जुड़े और ‘सुरक्षित बचपन, सुरक्षित भारत’ के निर्माण का संकल्प लिया। उन्होंने यह भी संकल्प लिया कि वे बाल यौन शोषण और दुव्र्यापार के खिलाफ पूरे देश में जागरूकता अभियान चलाएंगे।

दूसरा कदम जो सबसे महत्वपूर्ण और कारगर हो सकता है वह है बाल यौन शोषण को रोकने के वास्ते समाज के सभी वर्गों तक पहुंच बनानी होगी। राजनेताओं के साथ-साथ विभिन्न धर्मगुरुओं, कानून निर्माताओं, शिक्षा जगतों और कॉरपोरेटों को इस अभियान से जोडऩे की भी आवश्यकता है। राजनेता एक ओर जहां बाल यौन शोषण और हिंसा के खिलाफ संसद और विधानसभाओं में कानून बनवाने में मदद दे सकते हैं, वहीं धर्मगुरु मंदिरों, मस्जिदों, गुरुद्वारों और गिरजाघरों के दरवाजे उन अपराधियों के लिए बंद कर सकते हैं जो बाल यौन शोषण में किसी भी तरह से संलिप्त रहे हों। वे धर्मगुरु बाल हिंसा के अपराधियों को धर्म से अलग करने का भी काम कर सकते हैं।

भारत का समाज धर्म और उनके धर्मगुरुओं से सबसे ज्यादा संचालित होता है इसीलिए यहां उनकी बड़ी भूमिका और जिम्मेदारी हो जाती है। धर्मगुरुओं का काम मानवाधिकार और मानवीय मूल्यों की भी रक्षा करना है। कानून व नीति-निर्माता बाल हिंसा के खिलाफ दायर मुकदमों के जरिए जल्द से जल्द गुनाहगारों को सजा दिलवाने में मददगार हो सकते हैं। गौरतलब है कि पिछले साल पॉक्सो के तहत दर्ज मुकदमों में से सिर्फ 4 फीसदी मामलों में ही अपराधियों को सजा मिल सकी। कानून व नीति-निर्माता मुकदमों के त्वरित निपटान के लिए फास्ट ट्रैक कोर्ट भी बना सकते हैं। बच्चों को त्वरित न्याय दिलाने के लिए देश के प्रत्येक जिले में जिला अदालत का भी गठन किया जा सकता है।

नीति-निर्माता चाहें तो अपनी निगरानी में कानूनी कार्रवाई करा सकते हैं और मुकदमों के निपटान में बाल हिंसा के खिलाफ दायर मुकदमों को प्राथमिकता दे सकते हैं सुनवाई में। शिक्षा जगत बाल अधिकारों के साहित्य को अपने पाठ्यक्रमों का हिस्सा बनाकर और उससे लोगों को शिक्षित करके बाल हिंसा को रोकने की दिशा में जागरूकता ला सकते हैं। कॉरपोरेट बाल हिंसा को रोकने की दिशा में संसाधन और धन मुहैया कराने का काम कर सकते हैं। बाल यौन शोषण और हिंसा को रोकने में यदि इनका प्रयोग किया जाए तो कोई कारण नहीं कि इस दिशा में हमें सफलता नहीं मिले। सत्यार्थी का भी कहना है कि नए भारत का निर्माण और विकास तब तक अधूरा है जब तक कि इस देश का एक भी बच्चा हिंसा की चपेट में है और वह असुरक्षित है। यह हमें नहीं भूलना चाहिए कि सुरक्षित बचपन से ही सुरक्षित भारत का निर्माण होगा।

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