scriptChina's 'Global Security Initiative' and India | चीन की 'वैश्विक सुरक्षा पहल' और भारत | Patrika News

चीन की 'वैश्विक सुरक्षा पहल' और भारत

चीन 'बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव' के साथ-साथ 'वैश्विक सुरक्षा पहल' के प्रस्ताव पर भी सबका समर्थन चाहता है। यह भी सच है कि अपने 'बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव' की तरह चीन अपने इस नए प्रस्ताव को भी काफी देशों से मनवाने की क्षमता रखता है। यह चीन-केंद्रित दृष्टिकोण तनाव का कारण हो सकता है।

Published: May 17, 2022 06:35:47 pm

स्वर्ण सिंह
नई दिल्ली के जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में कूटनीति और निरस्त्रीकरण के प्रोफेसर हैं

चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने एक दशक से चले आ रहे अपने 'बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव' के बाद अब एक 'ग्लोबल सिक्योरिटी इनिशिएटिव' (वैश्विक सुरक्षा पहल) के अपने दृष्टिकोण को सामने रखा है। इस प्रस्ताव को शी जिनपिंग ने हाल ही में चीन के 'बोआओ फोरम फॉर एशिया', जिसे एशिया का 'दावोस फोरम' भी कहते हैं, में रखा। इसमें शी जिनपिंग ने एशिया को विश्व शांति का आधार और शक्ति केंद्र बनाकर विश्व स्तर पर व्यापक और अविभाज्य सुरक्षा के ढांचे की रूपरेखा साझा की। चीन 1990 के दशक से अपनी इससे मिलती-जुलती 'नई सुरक्षा संकल्पना' को भी बार-बार दोहराता रहा है। पिछले दो दशकों से चीन 'सामंजस्यपूर्ण विश्व' (हारमोनियस वल्र्ड) की भी अपनी संकल्पना को दोहराता रहा है।
सवाल यह है कि फिर इस बार शी जिनपिंग के इस प्रस्ताव पर दुनिया भर में इतनी गहन बहस क्यों छिड़ रही है? संक्षिप्त में कहें, तो आज का चीन शक्तिशाली है, आक्रामक है और अपनी सोच को साझा करने के साथ-साथ दूसरे विश्वयुद्ध से चले आ रहे ज्यादातर ढांचों और पश्चिमी देशों की सोच को नकारात्मक बता रहा है। शी जिनपिंग के 'नए दौर' में चीन का यह निश्चयात्मक रुख खुलकर सामने आया है। पश्चिमी देशों ने चीन के इन बदले हुए तेवरों को 'वुल्फ वॉरियर डिप्लोमेसी' का नाम भी दिया है और दुनिया भर में चीन के बढ़ते निवेश में ऋणजाल की चिंता भी जाहिर की है। चीन के सभी पड़ोसी देशों ने लगातार चीन के बदले हुए रुख को झेला है। यही कारण है कि शी के इस प्रस्ताव को आलोचक चीन की महत्त्वाकांक्षा का संकेत बता रहे हैं। सच तो यह है कि दो साल से चल रही सर्वव्यापी महामारी ने चीन को और अधिक आत्मविश्वासी बना दिया है। यहां एक तरफ विश्व के सभी बड़े और छोटे देशों को भारी नुकसान हुआ है, पर चीन उससे अभी काफी हद तक बचा हुआ है। चीन एकमात्र बड़ा देश है, जहां अर्थव्यवस्था की वृद्धि दर सकारात्मक बनी रही है। आज चीन अपने को 16 ट्रिलियन की अर्थव्यवस्था घोषित कर चुका है और जल्द ही अमरीका की 21 ट्रिलियन अर्थव्यवस्था को पीछे छोडऩे के संकेत दे रहा है। राष्ट्रपति शी जिनपिंग पहले ही अपनी 'चाइना ड्रीम' की अवधारणा को जाहिर कर चुके हैं। 2049 में जब चीन की कम्युनिस्ट क्रांति के सौ साल पूरे होंगे, तब तक वह चीन को विश्व का सबसे समृद्ध, शक्तिशाली, आधुनिक और सुंदर देश बनाने का संकल्प ले चुके हैं। 2021 के अंत में चीन से तीव्र गरीबी को समाप्त करने के दावे के बाद शी अब 2035 तक चीनी सेना को विश्व की सबसे सक्षम सेना बनाने के लिए प्रतिबद्ध हैं। यह सब वह राष्ट्रपति के रूप में तीसरे कार्यकाल के लिए अपने दावे को सुदृढ़ करने के लिए भी कर रहे हैं।
चीन 'बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव' के साथ-साथ 'वैश्विक सुरक्षा पहल' के प्रस्ताव पर भी सबका समर्थन चाहता है। यह भी सच है कि अपने 'बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव' की तरह चीन अपने इस नए प्रस्ताव को भी काफी देशों से मनवाने की क्षमता रखता है। यह चीन-केंद्रित दृष्टिकोण तनाव का कारण हो सकता है। ऐसा इसलिए कि यह दृष्टिकोण विश्व स्तर पर लम्बी बहस का नतीजा न होकर केवल चीन के राष्ट्रपति की व्यक्तिगत सोच है, जो चीन को विश्व का केंद्रबिंदु बनाने की उनकी महत्त्वाकांक्षा को दर्शाता है। महामारी के बाद अब यूक्रेन संकट के मामले में भारत की तटस्थता की नीति पर भी विश्व भर में बहस छिड़ी हुई है। विश्व जानना चाहता है कि चीन का शक्तिशाली पड़ोसी भारत शी के इस प्रस्ताव को कैसे देखता है या फिर चीन भारत से क्या अपेक्षा रखता हैं। दो साल से चल रहे सीमा तनाव में चीन के नेता, यूक्रेन संकट में चीन-भारत की साझा सोच को उभार कर तालमेल बेहतर करने में लगे हुए हैं। भारत भी, रूस को अकेला छोड़, चीन के पाले में डालना नहीं चाहता। इसके अलावा, चीन आज भारत का सबसे बड़ा कारोबारी हिस्सेदार, आयात का सबसे बड़ा स्रोत और बड़ा निवेशक है। जाहिर है कि भारत को इस माहौल में चीन और अमरीका के बीच बढ़ते तनाव में भी तटस्थता की नीति बनाए रखनी होगी।
भारत को कोई सकारात्मक पहल करनी होगी, नहीं तो न केवल शी जिनपिंग पड़ोसी देशों पर लगातार दबाव बनाए रखेंगे, बल्कि पश्चिमी देशों की सोच को शीतयुद्ध का नजरिया बताते रहेंगे। यूक्रेन संकट में शी जिनपिंग और पुतिन की बढ़ती नजदीकियों ने पश्चिमी देशों को और भी चौकन्ना कर दिया है। ज्यादातर पश्चिमी विशेषज्ञ राष्ट्रपति शी जिनपिंग के 'ग्लोबल सिक्योरिटी इनिशिएटिव' को उनके क्वाड और औकस सुरक्षा तंत्रों का प्रतियोगी मानते हैं, जो कुछ हद तक सही भी है। पर, यूक्रेन संकट की वजह से पश्चिमी देशों के आंतरिक मतभेद भी सामने आए हैं, जिसका फायदा चीन उठा सकता है। इस माहौल में भारत के लिए अवसर तो बढ़े ही हैं, अपेक्षा भी बढ़ जाती है।
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