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अनदेखी का फायदा उठाकर चीन कर रहा है अपने प्रभाव का विस्तार

अमरीका व सहयोगी देशों को मौलिक व दीर्घकालिक सहायता के प्रस्ताव देकर व निवेश कर प्रशांत क्षेत्र के इन द्वीपीय राष्ट्रों का विश्वास जीतना होगा। उनको यह भरोसा दिलाना होगा कि उनके पास चीन के साथ भागीदारी के नाम पर अपना भविष्य दांव पर लगाने के अलावा और भी विकल्प हैं

Published: April 18, 2022 05:23:50 pm

जोश रोजिन
स्तंभकार और राजनीतिक विश्लेषक

पिछले कुछ सप्ताह से पूरी दुनिया का ध्यान यूक्रेन पर रूस के हमले पर ही लगा हुआ है। इस बीच उनके निकट सहयोगी चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग पश्चिम की अनदेखी का पूरा फायदा उठाते हुए चुपचाप दक्षिणी प्रशांत क्षेत्र में चीनी प्रभाव का दायरा बढ़ाने में लगेे हैं। अगर वॉशिंगटन अब भी इस खतरे के प्रति सावचेत नहीं हुआ, तो क्षेत्र में अपना प्रभुत्व बढ़ाने के चीन के प्रयासों का नतीजा भयावह व अमिट हो सकता है। गत माह ही जब चीन और सोलोमन द्वीप के बीच सुरक्षा सहयोग संबंधी दस्तावेज लीक हुआ था, तो एशिया के अधिकारी और विशेषज्ञ हैरान रह गए थे। सोलोमन द्वीप दक्षिण प्रशांत क्षेत्र में है, जो एक ब्रिटिश उपनिवेश था, वह 1978 में स्वतंत्र हो गया था। इस समझौता पत्र के अनुसार, चीन सोलोमन द्वीप के आग्रह पर 'सामाजिक व्यवस्था कायम रखने में सहयोग' सहित अनेक कार्यों के लिए वहां सशस्त्र पुलिस और सैनिक भेज सकेगा। गोपनीय श्रेणी के इस दस्तावेज में यह भी दर्ज है कि चीन द्वीप पर चीनी नागरिकों और परियोजनाओं की रक्षा के लिए जहाज और सैनिक भेज सकता है। सभी का ध्यान चीन के मित्र समझे जाने वाले प्रधानमंत्री मानेश्शे सोगावरे के नेतृत्व वाली सोलोमन द्वीप सरकार की ओर होना आवश्यक है।
अगर किसी को इस द्वीप के सामरिक महत्त्व को लेकर जरा भी आशंका है, तो एक बार नक्शा जरूर देखिए। यह वह स्थान है, जहां से चीन पांच घंटे से कम अवधि की उड़ान में पीपुल्स लिबरेशन आर्मी (पीएलए) को ऑस्ट्रेलिया के पूर्वी छोर तक भेज सकता है। साथ ही, यह जगह अमरीका के भी अत्यधिक निकट है। निश्चित तौर पर चीन द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान सोलोमन द्वीप की भूमिका को नहीं भूला है, खास तौर पर 1942-43 में गुआडल कैनाल युद्ध के दौरान। ट्रम्प के कार्यकाल में राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद् में ओसैनिया और हिन्द-प्रशांत सुरक्षा निदेशक एलैक्स ग्रे ने कहा था-'ऑस्ट्रेलिया के करीब-करीब नजदीक स्थित भौगोलिक दृष्टि से सामरिक महत्त्व वाले ये द्वीप चीनी दबाव और सैन्य उपस्थिति से मुक्त रहें; यह अमरीका और ऑस्ट्रेलिया के लिए सामरिक दृष्टि से अति महत्त्वपूर्ण है।Ó
चीन का कहना है कि यह समझौता कोई बड़ी बात नहीं है और इसकी निंदा नहीं की जानी चाहिए। इस बीच अमरीका और ऑस्ट्रेलिया जी तोड़ कोशिश कर रहे हैं कि यह समझौता पूरा न हो। ऑस्ट्रेलियाई अधिकारी सोगावरे सरकार के साथ कूटनीति में व्यस्त हैं। राष्ट्रपति जो बाइडन के शीर्ष एनएससी अधिकारी (एशिया) कुर्त कैंपबेल अगले सप्ताह सोलोमन द्वीप का दौरा करने वाले पहले अमरीकी अधिकारी होंगे। इस क्षेत्रीय दौरे में वे कई और जगह भी जाएंगे। कैंपबेल ने ही जनवरी में भविष्यवाणी की थी कि चीन इस साल प्रशांत क्षेत्र में 'सामरिक दृष्टि से चौंकाने वालाÓ खुलासा कर सकता है। जाहिर है, अमरीकी और ऑस्ट्रेलियाई सरकारों को पहले से अंदाजा था कि ऐसा कुछ हो सकता है। इसके बावजूद दोनों ने ही चीन के इस कदम को रोकने की कोशिश नहीं की। विशेषज्ञों का कहना है कि अब दोनों ही सरकारें चीन को रोकने के लिए जूझ रही हैं। ऑस्ट्रेलिया में राष्ट्रीय सुरक्षा अधिकारी रह चुके जॉन ली का कहना है कि 'शुरुआत में ही चीन के इस कदम को रोकने की बजाय उसे पलटना जोखिम भरा और मुश्किल है।Ó इस समझौते को अमल में लाने से रोकने के लिए अधिक प्रयास करने में विफलता का मतलब है कि अमरीका और उसके सहयोगियों को अधिक संसाधन और क्षेत्रीय राजनीतिक पूंजी खर्च करनी पड़ सकती है।
बाइडन सरकार के अधिकारियों का मानना है कि वे दरअसल प्रशांत क्षेत्र के द्वीपों में बुरी तरह से व्यस्त हैं। बाइडन ने अगस्त माह में प्रशांत द्वीप के नेताओं से जूम पर बात की थी। विदेश मंत्री एंटोनी ब्लिंकन ने फरवरी माह में फिजी का दौरा किया। गत माह बाइडन ने अमरीकी राजदूत जोसेफ युन को प्रशांत क्षेत्र के तीन अन्य राष्ट्रों के साथ अमरीकी समझौतों के नवीनीकरण के लिए विशेष दूत नियुक्त किया था। विदेश विभाग के जलवायु दूत जॉन एफ. केरी ने इसी सप्ताह पलाऊ में एक सम्मेलन में भाग लिया था। बाइडन सरकार के एक वरिष्ठ अधिकारी ने कहा था कि कोरोना पाबंदियों के चलते आमने-सामने बैठकर कूटनीतिक वार्ताएं बाधित हुई हैं, लेकिन बाइडन सरकार क्षेत्र में अमरीका का दबदबा बढ़ाने के लिए प्रतिबद्ध है। इन सबके बावजूद कहना मुश्किल है कि बाइडन सरकार सोगावरे को इस बात पर कैसे सहमत करेगी कि वह चीन का सहयोग न करे। इसलिए इसकी संभावना काफी कम है। अधिकारी ने कहा है कि यह कोई नई बात नहीं है और न ही यह प्रशांत क्षेत्र या दुनिया का एक मात्र स्थान है, जहां चीन अति सक्रिय है। हां, यह उसकी सबसे नई और संभवत: सबसे साहसिक कार्रवाई है। सोलोमन द्वीप प्रशांत क्षेत्र के कई द्वीपों में से एक है, जहां चीन अपना प्रभाव बढ़ा रहा है। चीन ने हालिया वर्षों में सोलोमन द्वीप सहित क्षेत्र के दो द्वीपों को इस बात पर सहमत कर लिया है कि वे ताइवान को राजनयिक स्तर पर मान्यता न दें। चीन इन देशों के भ्रष्ट नेताओं को रिश्वत देकर आर्थिक, राजनयिक और सैन्य सहायता जैसे प्रलोभन देता है।
अमरीका व सहयोगी देशों को मौलिक व दीर्घकालिक सहायता के प्रस्ताव देकर व निवेश कर प्रशांत क्षेत्र के इन द्वीपीय राष्ट्रों का विश्वास जीतना होगा। उनको यह भरोसा दिलाना होगा कि उनके पास चीन के साथ भागीदारी के नाम पर अपना भविष्य दांव पर लगाने के अलावा और भी विकल्प हैं। रूस इस वक्त सबसे बड़ा खतरा है, लेकिन चीन अधिक गंभीर दीर्घकालिक प्रतिद्वंद्वी है। वह इस खुशफहमी में है कि हमारी अनदेखी का फायदा उठा रहा है। चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग की महत्त्वाकांक्षाएं विश्वव्यापी हैं। इसका अर्थ है कि हमें एक साथ कई जगह चीन के आक्रामक रवैये का मुकाबला करना होगा। अगर प्रशांत द्वीप चीन की चौकियां बन गए, तो
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