पूर्वोत्तर की राजनीति में भूचाल की आहट

पूर्वोत्तर की राजनीति में भूचाल की आहट

Amit Kumar Bajpai | Publish: Mar, 14 2019 01:39:51 PM (IST) विचार

  • असम और मेघालय में सुलग रहा है नागरिकता संशोधन बिल का विरोध
  • साहित्य और छात्रों की आवाज से मुखर है देश का इकलौता राज्य असम
  • बीते आम चुनाव के बाद से अब विकास का मुद्दा भी लोगों की मांग है

मनोज कुमार सिंह, गुवाहाटी से

मिजोरम में कांग्रेस का आखिरी किला ढहने और देश के पूर्वोत्तर क्षेत्र में क्षेत्रीय दलों और भाजपा की सत्ता कायम होने के बाद आठ राज्यों में फिलहाल राजनीतिक हलचल थमी हुई सी हैं, पर नागरिकता बिल को लेकर राजनीति में भूचाल की आहट सुनाई पड़ रही है। इस कुनबे में शामिल सिक्किम राज्य जरूर फिलहाल शान्त नजर आ रहा है लेेकिन पूर्वोत्तर के सबसे बड़े राज्य असम और पड़ोसी राज्य मेघालय में नागरिकता संशोधन बिल के विरोध का धुआं उठने लगा है। पिछले लोकसभा चुनाव से लेकर अब तक इसी मुद्दे पर सबसे बड़ा बदलाव दिख रहा है। आगामी लोकसभा चुनाव में इसके भडकऩे और बड़ा चुनावी मुद्दा बनने के आसार दिखाई दे रहे हैं।

असम में 14 और मेघालय में 2 लोकसभा सीटों पर भाजपा, क्षेत्रीय दलों और कमजोर पड़ी कांग्रेस में दिलचस्प मुकाबले के आसार बन रहे हैं। राष्ट्रीय नागरिक पंजीकरण (एनआरसी) का विवाद अभी ठंडा भी नहीं पड़ा कि भाजपा और केन्द्र सरकार ने नागरिकता संशोधन बिल लाने की पहल कर असम की राजनीति गरमा दी है।

केंद्र सरकार मौजूदा नागरिकता कानून में संशोधन कर बांग्लादेश, सहित अन्य देशों से आए मुसलमान शरणार्थियों के अलावा हिन्दू व अन्य सभी शरणार्थियों को भारतीय नागरिकता देना चाहती है। हिन्दू शरणार्थियों को भारतीय नागरिकता देने का वादा कर भाजपा ने 2014 के लोकसभा चुनाव में असम की 14 में से 7 सीटों पर जीत प्राप्त की थी और दो साल पहले कांग्रेस को हटा कर राज्य की सत्ता पर काबिज हुई।

 

ये राज्य की राजनीति तय करते हैं और राजनीतिक पार्टियों पर भारी पड़ते हैं...

पार्टी ने जब वादा पूरा करने की पहल की तो असम गण परिषद और कांग्रेस के साथ ही अन्य छोटी पार्टियों और विभिन्न संगठनों ने इसके खिलाफ जबर्दस्त मोर्चा खोल दिया है। सबसे तीव्र विरोध नॉर्थ ईस्ट स्टूडेन्ट ऑर्गेनाइजेशन (नेसो) के बैनर तले राज्य की जनता में प्रभाव रखने व राजनीति में उलट-फेर की क्षमता रखने वाले छात्र संगठन अखिल असम छात्र संघ (आसू ) और असम साहित्य सभा कर रहे हैं।

असम देश का इकलौता राज्य है, जहां छात्र संगठन व साहित्यकारों का जनता पर गहरा प्रभाव है। ये राज्य की राजनीति तय करते हैं और राजनीतिक पार्टियों पर भारी पड़ते हैं। उक्त दोनों संगठन दूसरे देश से आए हिन्दू शरणार्थियों को भारतीय नागरिकता देने से असम की डेमोग्राफी बिगडऩेे, राज्य पर अत्यधिक बोझ बढऩे और सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक तौर से स्थानीय असमिया लोगों के कमजोर होने की आशंका जाहिर कर रहे हैं।

 

असम साहित्य सभा के अध्यक्ष परमानंद राजवंशी ने पत्रिका को बताया कि नागरिकता संशोधन बिल असम के हितों के खिलाफ है। इसे लाया गया तो अगले लोकसभा चुनाव में बड़ा मुद्दा बनेगा और हम कड़ा विरोध करेंगे। हालांकि नागरिकता संशोधन बिल पर बवाल मचने के बीच असम पंचायत चुनाव में मिली भारी सफलता से भाजपा के हौसले बुलंद हैं। पंचायत चुनाव में अपनी बड़ी जीत को पार्टी इस मुद्दे पर जनता को अपने साथ होना मान रही है। इसके साथ ही वह लोगों का ध्यान विकास की ओर आकर्षित करने की कोशिश में जुटी है।

मेघालय पर विरोध की आंच

ईसाई बहुल मेघालय में पूर्व लोकसभा अध्यक्ष पीए संगमा के पुत्र कनराड संगमा की पार्टी एनपीईपी और भाजपा की सरकार है। लगातार 10 साल राज्य की सत्ता में रहने के बाद कांग्रेस विपक्ष में, लेकिन मजबूत स्थिति में हैं। पार्टी हिन्दू शरणार्थियों के साथ ही मेघालय में रह रहे दूसरे देश से आए मुस्लिमों को भी भारतीय नागरिकता देने की मांग कर रही है।

 

गोकशी का मुद्दा भाजपा के लिए परेशान पैदा करता दिख रहा है....

वह सिर्फ हिन्दू शरणार्थियों को नागरिकता देने का विरोध कर रही है। लेकिन छात्र और दूसरे स्थानीय संगठन दूसरे देश से आए किसी भी समुदाय के लोगों को भारतीय नागरिकता दिए जाने का कड़ा विरोध कर रहे हैं। राज्य में रह रह कर जोर पकडऩे वाला गोकशी का मुद्दा भाजपा के लिए परेशान पैदा करता दिख रहा है।

नागालैंड में तूफान से पहले की शांति

पूर्वोत्तर के बाकी राज्यों मिजोरम, मणिपुर, नागालैण्ड, त्रिपुरा और अरुणाचल प्रदेश में भी लोकसभा चुनाव की सुगबुगाहट शुरू हो गई है। नागालैंड के राजनीतिक गलियारे में तूफान आने से पहले जैसा सन्नाटा माना जा रहा है। दोनों उग्रवादी संगठन एनएससीएन (आईएम) सीजफायर पर हैं। एनएससीएन (के) शांत है, लेकिन इन्होंने नागालैंड से सटे असम और मणिपुर के हिस्सों को लेकर ग्रेटर नागालैंड राज्य बनाने की अपनी मांग छोड़ी नहीं है।

विकास भी बना बड़ा मुद्दा

गत पांच साल में स्थानीय मुद्दों के साथ नए सिरे से विकास का मुद्दा भी जुड़ गया है। लंबे समय से विकास के पैसे के भ्रष्टाचार की भेंट चढऩे से पिछड़ापन, बेरोजगारी और गरीबी और इससे उत्पन्न आक्रोश और उग्रवाद से त्रस्त पूर्वोत्तर राज्यों की जनता अब विकास को महत्व देने लगी है। विकास के प्रति लोगों का रुझान देख कर क्षेत्रीय राजनीतिक पार्टियां भी विकास को अपने मुद्दों में शामिल कर रही हैं। केन्द्र और राज्य सरकारें विकास को महत्व देने लगी हैं।

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