कोरोना से जंग में साफ पानी भी जरूरी

इस संकटकाल में हम अपने गुरु खुद बनें। अपने घर में ही रहकर स्वच्छ जल का इस्तेमाल करते हुए इस महामारी से स्वयं को बचाकर जल संरक्षण की कला को भी सीख सकते हैं।

By: Prashant Jha

Updated: 05 May 2020, 02:25 PM IST

डॉ. सीपी पोखरना, रसायनविज्ञ एवं सेेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरमेंट नई दिल्ली से सम्बद्ध

कोरोना वायरस से बचाव के लिए विश्व स्वास्थ्य संगठन ने जो मापदण्ड तय किए हैं उनके अनुसार हमें हर बार कम से कम बीस सैकण्ड तक हाथ धोना चाहिए। बचाव के अन्य तरीकों के मुकाबले कोरोना से बचाव का सबसे अच्छा तरीका हाथ धोना ही माना गया है। जब हम कह रहे हैं कि कोरोना संक्रमण में बचाव ही उपचार है, ऐसे में बार-बार हाथ धोना नितांत जरूरी है। लॉकडाउन के दौर में और अब जहां आंशिक छूट भी मिली है, अन्य गतिविधियों के मुकाबले हाथ धोने, सब्जियों व फल की धुलाई करने व बाजार से लाए गए दूध और अन्य पैकेजिंग मेें आ रही सामग्री को धोया जा रहा है। ऐसे मेें इन सब कामों के लिए साफ पानी की जरूरत भी बढ़ गई है। ऐसे में यह ज्वलंत विषय हमारे सामने है कि क्या हमारे पास कोरोना से लडऩे के लिए साफ पानी की उपलब्धता पर्याप्त है? भारत सहित कई विकासशील देशों में हाथ धोने के लिए स्वच्छ पानी की उपलब्धता निश्चय ही चिंता का विषय है।

कोविड-19 से लड़ाई के लिए हमें हाथ पर साबुन से झाग बनाने , उसे हाथ से दोनों और मलने और फिर पानी से साफ करने में लगभग 30 से 40 सेकंड का समय लग जाता है। यदि साबुन मलते समय में नल को बंद कर दिया जाए तो पानी की खपत करीब 2 लीटर होती है , लेकिन यदि नल खुला रह जाता है तो करीब 4 लीटर पानी खर्च हो जाता है। सामान्य दिनों में हम जहां औसतन 5 बार हाथ धोते थे अब दस से ज्यादा बार हाथ धोने होते हैं। पांच सदस्यों के परिवार में प्रतिदिन 200 लीटर साफ पानी की जरूरत है। नल खुला छोडऩे या अधिक चिकनाईयुक्त साबुन का प्रयोग करने पर यह खपत और अधिक हो सकती है। अन्य घरेलू कार्यों में भी साफ जल की आवश्यकता बढऩा स्वाभाविक है । ऐसे में अपशिष्ट जल की मात्रा भी बढ़ गई है, जो सीवेज में चला जाता है यानी उसको रिसाइकल करने की कोई प्रभावी व्यवस्था हमारे पास नहीं है। दूसरी और गंदे जल की मात्रा का बढऩा भी हमारे स्वास्थ्य पर विपरीत प्रभाव डाल सकती है।

विश्व स्तर पर 1980 के बाद से प्रतिवर्ष पानी की खपत लगातार एक प्रतिशत की दर से बढ़ रही है। इसका कारण तेजी से हो रहे आर्थिक विकास, जनसंख्या में हो रही बेतहाशा वृद्धि एवं जल के उपयोग के तरीकों में बदलाव को माना जाता है। इनके अलावा जलवायु परिवर्तन एवं बढ़ता प्रदूषण भी पानी की आपूर्ति को प्रभावित करते हैं। भीषण जल संकट का एक भयावह उदाहरण हम भूले नहीं है। पिछले वर्ष पानी के लिए 70 लाख की आबादी वाले चेन्नई में त्राहि-त्राहि मच गई थी। यहां का भूजल आने वाले कुछ सालों में शुन्य हो जाएगा। मेक्सिको की करीब 50 लाख ग्रामीण आबादी को साफ पानी के लिए तरसना पड़ रहा है। आज संसार के करीब करीब सारे महाद्वीप कोरोनावायरस से अछूते नहीं हैं। विकासशील देशों के लिए हाथ धोने के लिए साफ पानी की उपलब्धता एक कठिन चुनौती है गंदी बस्तियों में रहने वाली एक बड़ी आबादी को नल से पानी नसीब नहीं हो पाता है

वैश्विक स्तर पर मानव गतिविधियों से उत्पन्न अपशिष्ट जल का लगभग 80 प्रतिशत अनउपचारित ही रहता है। साथ ही, मानव जनित भांति-भांति के दूषित पदार्थों की मार सार्वजनिक जल प्रणाली को झेलनी पड़ती है । घरेलू उपयोग में आने वाली कई प्रकार की वस्तुएं, रसायन ,दवाइयां एवं प्रसाधन सामग्री जल में बहा दी जाती है , जिससे जल को उपचारित करना कठिन हो जाता है। इस कठिन दौर में जल प्रबंधन की प्रभावी व्यवस्था करके जल संकट से बचा जा सकेगा।

लॉकडाउन के समय विशेषज्ञ इस बात पर चिंतन कर सकते हैं कि ऐसी फसल की बुवाई को कैसे बढ़ाया जाए , जिसमें कम जल की आवश्यकता हो तथा औद्योगिक इकाइयों के अपशिष्ट जल को पुन: प्रयोग के लायक बना सके। आने वाले समय में कारों एवं अन्य वाहनों की धुलाई में पानी की कम से कम मात्रा का प्रयोग हो। घरेलू उपयोग में आने वाले जल की एक भी बूंद व्यर्थ नहीं जाए। लॉकडाउन काल में घर के सभी सदस्य थोड़ा चिंतन कर सामूहिक प्रयासों से जल को व्यर्थ बहने से रोक सकते हैं । इस संकट काल में हम अपने गुरु खुद बनकर ,घर में ही रहकर इस महामारी से स्वयं को बचाते हुए, जल संरक्षण की कला को भी सीख सकते हैं ।

Prashant Jha
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