मिलीभगत की कुश्ती

राजस्थान पत्रिका लम्बे अर्से से रामगढ़ बांध (Ramgarh Dam) के मुद्दे को उठा रहा है। राजस्थान उच्च न्यायालय (Rajasthan High Court) के कई निर्णय/फैसले निष्प्रभावी हो गए। जयपुर की जलापूर्ति करने वाला बांध मरा पड़ा है। क्यों? क्यों हमें बीसलपुर (Bisalpur) का पानी दिया जा रहा है? वहां के लोगों के लिए पानी का प्रबन्ध किस बांध से किया जा रहा है और क्यों?

By: Shri Gulab Kothari

Published: 26 Jun 2020, 11:00 AM IST

गुलाब कोठारी

राजस्थान पत्रिका लम्बे अर्से से रामगढ़ बांध (Ramgarh Dam) के मुद्दे को उठा रहा है। राजस्थान उच्च न्यायालय (Rajasthan High Court) के कई निर्णय/फैसले निष्प्रभावी हो गए। जयपुर की जलापूर्ति करने वाला बांध मरा पड़ा है। क्यों? क्यों हमें बीसलपुर (Bisalpur) का पानी दिया जा रहा है? वहां के लोगों के लिए पानी का प्रबन्ध किस बांध से किया जा रहा है और क्यों? रामगढ़ बांध क्षेत्र और भराव क्षेत्र में पक्के निर्माण और खेती की स्वीकृति किसने दी? ये सारे प्रश्न अफसरशाही में पल्लवित भ्रष्टाचार को ही इंगित कर रहे हैं। यह तो एक बानगी है। आप किसी भी क्षेत्र में हाथ डालें, उत्तर एक जैसे ही मिलेंगे। राष्ट्रसंघ खेलों के उदाहरण यहां भी प्रत्येक विभाग में जस के तस हैं। कल पहली बार राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने सार्वजनिक रूप से स्वीकार किया कि अफसरों में भ्रष्टाचार बढ़ रहा है। ऐसी स्थिति नियंत्रण से बाहर जा रही है।

अशोक जी को मुक्त कण्ठ से बधाई! आपने अपराध शाखा को चेतावनी तो दी है कि (भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो) एसीबी के भय के बिना अपराध रोकना संभव नहीं है। क्या इसका अर्थ यह नहीं है कि आज तक एसीबी प्रभावी नहीं हो पाई? वहां भी तो अफसर वही हैं। मध्यप्रदेश के शहला मसूद काण्ड में सब छूट गए। राजस्थान के 19 अफसरों के खिलाफ न्यायालय में मुकदमे पहुंचे और स्वयं राज्य सरकार ने वापस ले लिए। बजरी माफिया कितनों की जान ले चुका। भू-माफिया, मादक पदार्थों से जुड़ा माफिया, हथियार माफिया, सूदखोर माफिया, मानव तस्करी माफिया, खनन माफिया, दलालों की मण्डी जैसे हालात चारों ओर दिखाई पड़ते हैं। ऊर्जा विभाग में खरीद, स्वास्थ्य-शिक्षा विभाग, सार्वजनिक निर्माण की खरीद तो आटे में नमक है।

राजस्थान में इतने सम्मेलन करने के बाद भी क्यों नहीं पनप रहे उद्योग? राजस्थान पत्रिका के पुराने अंक गवाह हैं कि अफसरशाही रास्ता नहीं देती। चालू उद्योगों पर भी अफसर माफिया स्वयं हावी है। मध्यम दर्जे के उद्योगों पर भी 40-45 निरीक्षक चौथ वसूली करते हैं। तब कैसे चीन के उद्योगों को राजस्थान लाने का सपना देख रहे हैं। हमें सभी बड़ी योजनाओं का समय और लागत की दृष्टि से आकलन तो करना ही चाहिए। देरी के साथ नई लागत और गुणवत्ता साफ। फिर भी सारे गुनाह माफ!

अभी वर्षा सिर पर है। कहीं बाढ़ से निपटने की तैयारी के कार्य नहीं हैं। पानी भरने पर, बाढ़ आने पर हवाई यात्राएं दिखाएंगे। रात्रि भोज उड़ेंगे। कृषि और किसान भगवान भरोसे। देखते ही देखते बजट कम पड़ जाता है। इसी तरह किसान से हर साल अनाज खरीदते हैं-लाखों टन। कोई गोदाम बनाने की नियमित योजना नहीं है। दवाइयों और फल वालों को देेने के बाद अनाज तो सड़क पर ही रहेगा। बरसात में भीगेगा भी, सड़ेगा भी। इसका कोई तो हिसाब देखे। हर साल केवल राजस्थान और मध्यप्रदेश में 50-50 हजार टन अनाज सड़ता है। कहां जाता है यह सारा धन? मुख्यमंत्री ने कह तो दिया है, किन्तु क्या वे कुछ कर भी पाएंगे? संभव नहीं लगता। वे कोई पहली बार तो मुख्यमंत्री बने नहीं हैं। पिछली बार पांच साल में भाजपा सरकार की कोई फाइल नहीं खोली। न भाजपा सरकार ने कांग्रेस राज की फाइल खोली। मिली-भगत की कुश्तियां ही दिखाई पड़ती हैं। मंत्रिमण्डल तक में धुर माफिया और अपराधी आ जाते हैं। क्या अशोक जी नहीं जानते? प्रश्न यह है कि आज अचानक ऐसा क्या हो गया कि अफसरों के खिलाफ मोर्चा खोलना पड़ा। क्या मुख्यमंत्री स्वयं कोई निर्णय नहीं ले सकते। क्यों उन्हें एसीबी का रास्ता सहज लग रहा है?

एसीबी हो या आइबी, अधिकारी तो वही हैं। यहीं से जाते हैं। पिछले 15-20 सालों में क्या ऐसा उजागर कर दिया एसीबी ने, जिसे देखकर उन्हें विश्वास हो चला कि चरम पर चल रहे पुलिस भ्रष्टाचार को उजागर कर देंगे। आज जनधारणा तो यह है कि जिनको बचाना है, उनकी फाइल एसीबी को दे दो। मदेरणा जी जेल में बैठे ही हैं न!

समस्या कहीं और है। अफसरों की ट्रेनिंग अंग्रेजियत के आधार पर होती है। भारतीय संस्कृति और सभ्यता से इनका परिचय ही नहीं होता। न मानवीय मूल्यों से पाला पड़ता। सारा चिन्तन यान्त्रिक हो जाता है। अपराधबोध तो होता ही नहीं। न देश की माटी के प्रति दर्द, न बच्चों को देशप्रेम की शिक्षा। आम नागरिक इनकी दृष्टि में पराया रह जाता है। भौतिकवाद शिक्षा के साथ ही मानसिकता को घेर लेता है। शरीर के लिए जीते हैं, आत्मा होती ही नहीं।

भ्रष्टाचार को कम करना है तो पहले अधिकारियों को मानवीय संवेदना का पाठ पढ़ाना जरूरी है। देश रहेगा तो हम रहेंगे। अफसर आज देश में रहने के सपने ही नहीं देखता। गांवों में जाकर साल-छह महीने रहे, तब आदमी को समझेगा। उसमें ईश्वर की छवि देख सकेगा। भगवान का डर बेठेगा। भय बिन होत न प्रीत। आज मुख्यमंत्री हों या मंत्री, कुछ भी गैरकानूनी करवाना है तो अफसर के बिना संभव नहीं है। यही भ्रष्टाचार की जड़ है।

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