शब्दों का दरवेश : खामोशियां सहलाते स्मृतियों के रंग

बेमिसाल सृजन के लिए प्रतिष्ठित रजा पुरस्कार से सम्मानित संजू ने अपने निजी एकांत में उभरे स्मृति बिम्बों को यहां सिरजा है।

By: विकास गुप्ता

Published: 20 May 2021, 08:16 AM IST

विनय उपाध्याय

स्मृतियों को भला दस्तक देने की आदत कहां होती है? ये तो अचानक आती हैं और अपना अलबम खोल कर बैठ जाती हैं। मनोहर काजल की कहानी 'अनछुई गंध' का यह जुमला यकायक चौखट में जड़े कुछ चित्रों की हमजुबां बनकर खामोशियों को सहला देता है। यकीनन यह बीहड़ सन्नाटे का वक्त है और मन बार-बार बीत गए कल के आगोश में बिरमना चाहता है। स्मृतियों की हरी दूब पर पांव धरकर अतीत की पगडंडियों पर चलना सदा ही मन को भाता है, गोया कि भीतर यादों की एक नदी है, जिसके किनारों पर बैठकर वक्त की लहरों को गिनना भी भला कितना सुखकर है।

दरअसल, ऐसी ही कुछ स्मृतियों का लेखा-जोखा लिए चित्रकार संजू जैन के कैनवास मेरी आंखों के सामने हैं। बेमिसाल सृजन के लिए प्रतिष्ठित रजा पुरस्कार से सम्मानित संजू ने अपने निजी एकांत में उभरे स्मृति बिम्बों को यहां सिरजा है। इन्हें याद करने का संदर्भ इस वक्त इसलिए भी है कि यहां उस देहाती मन की छापें हैं, जो अपनी सरजमीं की धरती-धूल, पेड़-पहाड़, नदी-सरोवर, आकाश-पंछी, वन-वनस्पतियों से अपने गहरे सरोकारों या परस्परता में बिंधे स्वस्थ और खुशहाल जीवन को गाता है। यानी प्रकृति और स्मृति के आलोक में यहां एक चितेरे की कल्पना का स्वाधीन संसार खुलता है। पेपर मेशी, हैंडमेड पेपर और एक्रेलिक रंगों के संयोजन से संजू की कलाकृतियां कुछ इस तरह खिल आई हैं कि खोई हुई सी कोई दुनिया, सुना-अनसुना सा कोई अफसाना, अच्छा सा कोई मौसम, तन्हा सा कोई आलम या किसी महान प्रार्थना की तरह प्रकृति में लय हो जाने की पवित्र उत्कंठा जाग उठती है। कुछ गहरे, कुछ हल्के रंगों को सतह पर फैलाते हुए संजू का आग्रह स्मृतियों के जरिए एक आध्यात्मिक यात्रा पर चल पडऩे का आमंत्रण भी है, उनका कला पक्ष खुलासा करता है कि गांव की गुहार लगाती ये सुनहरी यादें शहरों के यांत्रिक बंधन से मुक्त उस जीवन के प्रति आस्था जगाती है, जो सच्चे अर्थों में आत्मनिर्भरता की कसौटी पर अपनी हदों में संतुष्ट है।

ग्रामीण परिवेश के आस-पास खिलखिलाते चालीस चित्रों की नुमाइश वे जहांगीर आर्ट गैलेरी, मुम्बई में कर चुकी हैं। बकौल संजू, ये चित्र उनकी रूह के बेहद करीब हैं, क्योंकि ये उनके लड़कपन की बेशुमार यादों के मरकज हैं। वक्त का वह चेहरा भी उन्हें यहां नुमाया होता है, जब एक स्वस्थ, खुशहाल और समरस जीवन हमारे वजूद का हिस्सा था। हम कुदरत के कितने नजदीक थे और कुदरत खुद हम पर कितनी निहाल थी।

फलक पर छलक उठे ये रंग यादों को मूल्यवान सम्पदा की तरह सहेज कर रखने का आग्रह करते हैं। अच्छी यादें विरासत होती हैं। अपने वक्त की इबारत, सच का दामन थामती हुर्इं, खामोशियों की उदास चौपालों पर स्मृतियों की ऐसी ही गुलजार महफिलें मुबारक।
(लेखक कला साहित्य समीक्षक और टैगोर विश्वकला एवं संस्कृति केंद्र के निदेशक हैं)

विकास गुप्ता
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