स्तुत्य संकल्प

कल टीवी पर आपका वक्तव्य सुनकर लगा कि इस बार के जनादेश ने आपका हृदय रूपान्तरित कर दिया है और आप राजनीति के समुद्र को क्षीरसागर की तरह देखने लगे हो।

By: Gulab Kothari

Published: 25 May 2019, 08:42 AM IST

- गुलाब कोठारी

माननीय नरेन्द्र भाई,
कल टीवी पर आपका वक्तव्य सुनकर लगा कि इस बार के जनादेश ने आपका हृदय रूपान्तरित कर दिया है और आप राजनीति के समुद्र को क्षीरसागर की तरह देखने लगे हो। कल आप ‘नमो’ नहीं ‘नम:’ लग रहे थे। जनशक्ति और आशीर्वाद के आगे धन, बल, सत्ता सब छोटे पड़ जाते हैं। आपकी वाणी सरदार पटेल और महात्मा गांधी को छूती हुई बह रही थी, तो कहीं-कहीं विवेकानन्द भी याद आ रहे थे। मानो सहसा आपकी प्रज्ञा का जागरण हो गया हो। दृष्टि में सूक्ष्म स्पष्ट हो रहा हो।

यह जनादेश केवल राजनीति करने के लिए नहीं सौंपा गया है। राजस्थान पत्रिका का मूल क्षेत्र राजस्थान, मध्यप्रदेश, गुजरात, छत्तीसगढ़ पूर्ण रूप से आपकी भावी योजनाओं के साथ समर्पित है। जैसा कि परिणाम स्वयं आपके साथ है। तीन चौथाई देश भी आपके साथ खड़ा है।

मुझे नहीं मालूम आपने 2014 में दस वर्ष का कार्यकाल क्या सोचकर मांगा था, किन्तु जनता ने दे भी दिया। आपके मन में यह गहरा उतर भी गया, जब आपने तीन बड़े वादे जनता से किए।


‘मेरा वादा, मेरा संकल्प, मेरी प्रतिबद्धता-
1. बदइरादे या बदनीयत से कोई काम नहीं करूंगा।
2. मैं मेरे लिए कुछ नहीं करूंगा।
3. मेरा पल-पल और मेरा कण-कण देशवासियों को समर्पित होगा।’

साथ में आपने यह भी कह दिया कि ‘जब आप मेरा मूल्यांकन करें तो संकल्पों के इस तराजू पर जरूर कसना, कमी रह जाए तो कोसना भी।’
यह कोई साधारण समर्पण नहीं है। हिन्दुत्व या भगवा से अथवा राजनीति से बहुत ऊपर का दर्शन प्रकट हुआ है। आपने पहले ही वादे में वह सब सार्वजनिक रूप से स्वीकार कर लिया जिसका साहस देख पाना आज अत्यन्त दुर्लभ है। राजनीति के सारे दाग धो डाले। अब किसको विश्वास नहीं होगा आपकी बात पर। ‘सरकार बहुमत से नहीं सर्वसम्मति से चलती है।’ यह कहकर आपने अपने संकल्प पर एक शक्तिशाली मोहर ही लगाई है।

आपका यह संकल्प कि, मैं अपने लिए कोई कार्य नहीं करूंगा, मेरी ही बात को 130 करोड़ लोगों तक पहुंचा गया। आभारी रहूंगा सदा। सृष्टि में कोई भी बीज स्वयं को सुरक्षित रखकर पेड़ नहीं बन सकता। न कोई बीज अपने फल खा पाता है, न अपनी छाया का सुख भोगता है। आपके संकल्प ने उद्घोष कर दिया कि आप अपने फल नहीं खाएंगे। स्वयं के लिए नहीं जीएंगे। जमीन में गडकऱ पेड़ बन जाने की प्रतिबद्धता निश्चित ही स्तुत्य है। आज से पत्रिका का संकल्प भी आपके साथ सहभागी रहेगा। बिना किसी भी प्रलोभन अथवा राजनीतिक स्वार्थ के।

लगता है वह समय आ गया है जब भारत के आधिदैविक धरातल को पुनर्जीवित होना है। इसके शिलान्यास का समय शुरू हो गया है। देश में फैले विषैले कंटक-विचार-चर्या-अकर्मण्यता के भाव स्वच्छता अभियान में सिमट जाने को हैं। भारत का गौरव फिर से लौटता दिखाई देने लगा है। तीनों पायों को बस जमीन से जोडऩे की जरूरत है। इनको विदेश से घर लाना है। विदेशी नकल ने विकास के नाम पर न केवल हमारी संस्कृति की हत्या की है, न केवल इंसान की कीमत घटाई है, न केवल खाने में जहर घोला है, बल्कि हमारी आस्था के धरातल को शरीर तक समेटकर तितर-बितर कर दिया है।

श्रीमान! आपके ये संकल्प शरीर और बुद्धि से परे के हैं। शायद अव्यय मन-आत्मा-के धरातल से जुड़े हैं। मानो नया जनादेश आपको देवासुर संग्राम में विजयी बना गया। आपको चौदह रत्न मिल गए।

एक बात और! पूरे चुनाव में भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष-अमित शाह-आपके सारथी रहे। उनका युद्ध कौशल भी आपको कई नए आयाम दे गया होगा। शपथग्रहण के बाद आपको राष्ट्र निर्माण के रथ का सारथी बनना है। मन विकल्पों में न अटक-भटक जाए। संभावना भी नहीं है।

किसी शायर ने लिखा है-
जहां भी जाएंगे, रोशनी लुटाएंगे।
किसी चिराग का अपना मकां नहीं होता।
सादर अभिवादन! नमस्कार!!

Gulab Kothari
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