राहुल का ‘त्याग’

संघर्ष के दुरूह रास्ते राहुल गांधी को आकर्षक लग रहे हैं लेकिन क्या ये अन्य नेताओं और कार्यकर्ताओं को भी लुभा पाएंगे?

By: dilip chaturvedi

Published: 07 Jul 2019, 06:29 PM IST

कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने आम चुनावों में हार का जिम्मा लेते हुए इस्तीफा तो पहले ही दे दिया था, अब सार्वजनिक रूप से त्यागपत्र देकर पार्टी के भीतर लंबे समय से चल रहे असमंजस को एक तरह से समाप्त कर दिया है। हालांकि, उन्होंने दूसरी तरह का असमंजस पैदा कर दिया। उन्होंने चार पेज का जो लंबा खुला पत्र जारी किया, उसमें कई ऐसी बातें विस्तार से जाहिर की गई हैं जिनसे यह समझना आसान हो जाता है कि वह पार्टी से क्या अपेक्षा कर रहे हैं। सबसे पहले तो यही कि पार्टी के बड़े नेताओं को हार की जिम्मेदारी लेकर ‘त्याग’ करना चाहिए। त्याग किए बगैर भाजपा की विचारधारा का मुकाबला नहीं किया जा सकता।

अन्य बड़े नेताओं को जिम्मेदार ठहराने और इस्तीफा मांगने से पहले स्वयं उन्हें ऐसा करना चाहिए, इसलिए वह अपने निर्णय पर अडिग हैं। दूसरा, पार्टी को फिर से खड़ा करने के लिए कड़े फैसलों की जरूरत है। तीसरा यह कि विचारधारा की लड़ ाई है जो पहले से भी लड़ी जा रही है और आगे भी लड़ी जाएगी। चौथा, इस लड़ाई में आम चुनावों के दौरान वह अकेले ही खड़े थे। दल के अन्य सहयोगियों ने वैसा साथ उन्हें नहीं दिया जैसा देना चाहिए था। इन चार बिंदुओं में सबसे आखिरी सबसे अहम है। एक ऐसी पार्टी में जहां गांधी-नेहरू परिवार को सर्वेसर्वा माना जाता रहा हो, भला राहुल गांधी अकेले क्योंकर खड़े थे?

दरअसल, राहुल गांधी एक ऐसे दोराहे पर खड़े हैं , जहां से एक रास्ता आजादी के बाद बनाए गए उस हाइवे की तरफ जाता है, जिस पर चलते हुए कांग्रेस ने लंबे समय तक देश पर राज किया है। जहां संघर्ष नहीं, मौके का इंतजार ही जीत का मंत्र है। यह मंत्र कांग्रेस संस्कृति में इस तरह रच-बस गया है कि विपक्ष की कार्यशैली भी पार्टी भूल चुकी है। मोदी सरकार का पिछला कार्यकाल पार्टी ने इस उम्मीद में निकाल दिया कि जनता आखिर तंग आकर फिर से कांग्रेस को मौका दे ह ी देगी। पर इस बार जनता ने ऐसा नहीं किया। दूसरा रास्ता आजादी के पहले की उन पगडंडियों से होकर गुजरता है जिस पर लंबा संघर्ष करते हुए पार्टी ने अंग्रेज शासकों के खिलाफ मोर्चा लिया था और देश को दासता से मुक्ति दिलाई थी।

अब जबकि पहला रास्ता बंद होता नजर आ रहा है, संघर्ष के दुरूह रास्ते राहुल गांधी को आकर्षक लग रहे हैं लेकिन क्या ये अन्य नेताओं और कार्यकर्ताओं को भी लुभा पाएंगे? यह एक ऐसा सवाल है जिनसे गुजरे बगैर कुछ भी कहना मुश्किल है। पार्टी अध्यक्ष पद से इस्तीफे के बाद भाजपा के खिलाफ दस गुनी ज्यादा ताकत से लडऩे का संकल्प जता देने भर से कांग्रेस का संकट खत्म होता नजर नहीं आ रहा है। भाजपा के खिलाफ आज सबसे मजबूत राष्ट्रव्यापी चेहरा राहुल गांधी का ही है। इसलिए उन्हें अपने-आप को इस तरह स्थापित करना चाहिए कि उनकी स्वीकार्यता बढ़ सके। क्या ‘त्याग’ से ऐसा हो सकता है? भविष्य ही बता पाएगा।

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dilip chaturvedi Desk
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