बंद हों बचने के रास्ते

बंद हों बचने के रास्ते

Dilip Chaturvedi | Publish: Dec, 23 2018 02:10:19 PM (IST) विचार

भ्रामक विज्ञापनों के खिलाफ सख्त कानून से राहत मिल जाएगी, ऐसा सोचना जल्दबाजी होगी। सरकार को कारगर व्यवस्था भी करनी होगी।

 

भ्रामक विज्ञापनों के खिलाफ उपभोक्ता संरक्षण विधेयक का पारित होना आम आदमी के लिए सुकून भरी खबर मानी जा सकती है। गलत विज्ञापन से उपभोक्ताओं को लुभाने पर अब दो साल की सजा और दस लाख रु. जुर्माने का प्रावधान भी किया गया है। अपराध दोहराने पर जुर्माने की रकम 50 लाख चुकानी पड़ेगी और कैद की अवधि दो से बढ़कर पांच साल हो जाएगी। बीते कुछ सालों में भ्रामक विज्ञापनों के जरिए उपभोक्ताओं को लूटने की शिकायतें बेतहाशा बढ़ी हैं। खासकर घर निर्माण और ऑनलाइन-टेलीशॉपिंग पर उपभोक्ताओं को ठगने के नए-नए तरीके सामने आए हैं। लम्बे अर्से से ऐसे भ्रामक विज्ञापनों के खिलाफ सख्ती बरतने की आवाजें भी उठ रही थीं। संसद में पारित नए विधेयक में उपभोक्ताओं के हित संरक्षण के लिए अनेक प्रावधान शामिल किए गए हैं। इनमें सबसे बड़ा प्रावधान ये कि जिला और राज्य उपभोक्ता फोरम यदि उपभोक्ताओं के हित में फैसला सुनाते हैं तो आरोपी कंपनी के पास राष्ट्रीय फोरम में जाने का अधिकार नहीं होगा।

इसे उपभोक्ताओं में आ रही जागरूकता का नतीजा ही माना जाएगा कि सरकार को भ्रामक विज्ञापनदाताओं के खिलाफ कड़ा कानून लाना पड़ा। एक सौ तैतीस करोड़ की जनसंख्या वाले देश में कंपनी और उपभोक्ता के बीच रिश्ते तेजी से बदल रहे हैं। ऑनलाइन और टेलीशॉपिंग तेजी से विस्तार ले रही है, लेकिन उपभोक्ता उतना सजग नहीं, जितना उसे होना चाहिए। अपने खिलाफ हो रही ठगी के खिलाफ आवाज उठाने के तरीके उसे मालूम नहीं। और अगर मालूम हैं तो वह इतने जटिल कि वह झंझट में पडऩा नहीं चाहता। भ्रामक विज्ञापनों के खिलाफ सख्त कानून बना देने से उपभोक्ताओं को राहत मिल जाएगी, ऐसा सोचना जल्दबाजी होगी। नया विधेयक पारित होने से पहले भी कानून थे लेकिन ठगी का धंधा फिर भी फल-फूल रहा था। भवन निर्माण से जुड़ी कंपनियों के विज्ञापनों में फंसकर अपनी मोटी रकम फंसाने के अनेक मामले सुप्रीम कोर्ट में सालों से लंबित हैं। 'अपने घरौंदे' की आस में लाखों परिवार कानूनी लड़ाई लड़ रहे हैं। देश में आज जितनी जरूरत उपभोक्ताओं के हितों के संरक्षण की है, उससे अधिक आवश्यकता कानून के प्रभावी क्रियान्वयन की है। भ्रामक प्रचार के जरिए उपभोक्ताओं को लूटने वालों को सलाखों के पीछे पहुंचाने की जरूरत है। आए दिन मिलावटी सामान जब्त करने की खबरें सामने आती हैं लेकिन कभी मिलावटखोरों को पांच साल कैद की सजा होते सुनाई नहीं पड़ती। कहीं मिलावटी सामान के सैंपल बदल दिए जाते हैं तो कहीं और किसी तरीके से बचाव के रास्ते तलाश लिए जाते हैं।

ऑनलाइन और टेलीशॉपिंग का दौर दिनों-दिन बढऩे वाला है। ऐसे में इस पर सतत निगरानी की जरूरत हर दिन पडऩे वाली है। एक बार कानून बनाकर बैठ जाने से काम चलने वाला नहीं। ये एक ऐसा मुद्दा है, जिस पर राजनीति कतई नहीं होनी चाहिए। संसद में हर मुद्दे पर हंगामा करने वाले जनप्रतिनिधि आखिर उपभोक्ता भी तो हैं। नया विधेयक स्वागतयोग्य तो है, लेकिन इसकी उपयोगिता तभी साबित मानी जाएगी, जब उपभोक्ता को इसका फायदा भी मिले। नए प्रावधानों की जानकारी आमजन तक पहुंचे, इसकी कारगर व्यवस्था भी सरकार को ही करनी होगी। प्रावधान के अनुसार वस्तु और सेवा प्रदाता को उपभोक्ता की शिकायतें सुनने की उचित व्यवस्था करनी होगी। लेकिन यदि वह व्यवस्था नहीं करता है तो उपभोक्ता क्या करे? यानी उपभोक्ताओं की तमाम जिज्ञासाओं का खुलासा भी सरकार करे तो बेहतर हो।

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