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जलवायु परिवर्तन से निरंतर बढ़ रहा खतरा, फिर भी नहीं बदली बहस

locationजयपुरPublished: Nov 24, 2022 09:34:30 pm

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Patrika Desk

  • कॉप-27: उम्मीद से कमतर रहा शिखर सम्मेलन
  • जलवायु गतिविधियों के लिए वैश्विक वित्त की जरूरत साल दर साल बढ़ती जा रही है। 2050 तक नेट-जीरो लक्ष्य पाने के लिए, अक्षय ऊर्जा में 2030 तक हर साल लगभग 4 ट्रिलियन डॉलर निवेश की जरूरत है। पर विकसित देश, विकासशील देशों को 2020 तक हर साल 100 बिलियन डॉलर वित्तीय मदद देने का वादा ही पूरा नहीं कर सके हैं।

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सुमित प्रसाद
प्रोग्राम लीड, काउंसिल ऑन एनर्जी, इनवायरनमेंट एंड वॉटर (सीईईडब्ल्यू)
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जलवायु परिवर्तन पर 27वां वैश्विक शिखर सम्मेलन (कॉप27) अपने निर्धारित समय से दो दिन ज्यादा चला। इसकी सबसे बड़ी उपलब्धि विकासशील देशों के लिए ‘हानि व क्षति’ (लॉस एंड डैमेज) कोष बनाने पर सहमति रही। सम्मेलन में जहां विकसित देशों ने ऐतिहासिक जिम्मेदारियों व जलवायु महत्त्वाकांक्षा (लक्ष्यों) को बढ़ाने जैसी बातों से बचने की कोशिश की, वहीं भारत ने अपनी नेतृत्वकारी भूमिका को पूरी दुनिया के सामने रखा। भारत ने न केवल सम्मेलन में सक्रियता से हिस्सा लिया, बल्कि वार्ताओं में समानता और जलवायु न्याय (क्लाइमेट जस्टिस) के सिद्धांतों को अंतिम दस्तावेजों में शामिल किए जाने पर भी जोर दिया। भारत ने स्पष्ट किया कि मौजूदा जलवायु संकट विकसित राष्ट्रों के अत्यधिक और ऐतिहासिक उत्सर्जन का परिणाम है और सभी तरह के जीवाश्म ईंधन चरणबद्ध तरीके से घटाए जाने चाहिए।
कॉप27 में केंद्रीय पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्री भूपेंद्र यादव इस बात पर अडिग रहे कि भारत जलवायु संबंधी समस्याओं के समाधान का हिस्सा है, न कि इस समस्या का। उन्होंने सम्मेलन के दौरान भारत की दीर्घकालिक कम उत्सर्जन विकास रणनीति (एलटी-एलईडीएस) को जारी किया। यह भारत के 2070 तक नेट-जीरो लक्ष्य को हासिल करने की एक व्यापक रूपरेखा पेश करती है। उन्होंने सभी मंचों पर ‘मिशन लाइफ’ (पर्यावरण के लिए जीवनशैली, सस्टेनेबिलिटी की दिशा में एक पहल) को भी प्रमुखता से सामने रखा। कॉप27 से उम्मीद थी कि वादों से आगे बढक़र बातचीत वादों को लागू करने की दिशा में बढ़ेगी, पर ‘हानि व क्षति’ कोष को छोडक़र विभिन्न चर्चाओं के नतीजों में कोई ठोस प्रगति नहीं दिखाई दी।
पिछले कुछ वर्षों में विकासशील देशों ने भीषण गर्मी, सूखा और विनाशकारी बाढ़ का सामना किया है। इससे लाखों लोग प्रभावित हुए हैं और अरबों डॉलर का नुकसान हुआ है। सच्चाई यह है कि इससे सबसे ज्यादा प्रभावित देश मौजूदा जलवायु संकट के लिए बमुश्किल जिम्मेदार हैं, पर इसका नुकसान उठा रहे हैं। इसलिए, जलवायु परिवर्तन से होने वाली ‘हानि व क्षति’ के लिए फंडिंग पर सहमति कॉप27 की प्रमुख उपलब्धि है। हालांकि, न तो कोष का स्रोत स्पष्ट हुआ, न ही कोष में योगदान के लिए विकसित देशों की कोई बाध्यकारी जिम्मेदारी ही तय की गई।
जलवायु गतिविधियों के लिए वैश्विक वित्त की जरूरत साल दर साल बढ़ती जा रही है। 2050 तक नेट-जीरो लक्ष्य पाने के लिए, अक्षय ऊर्जा में 2030 तक हर साल लगभग 4 ट्रिलियन डॉलर निवेश की जरूरत है। पर विकसित देश, विकासशील देशों को 2020 तक हर साल 100 बिलियन डॉलर वित्तीय मदद देने का वादा ही पूरा नहीं कर सके हैं।
सम्मेलन में बहुपक्षीय विकास बैंकों (एमडीबी) और अंतरराष्ट्रीय वित्तीय संस्थानों (आइएफआइ) को भी शामिल करने पर चर्चा हुई, पर वित्तीय संसाधन जुटाने संबंधी अड़चनों को दूर करने की स्पष्ट टाइमलाइन पर सहमति नहीं बन पाई। काउंसिल ऑन एनर्जी, इनवायरनमेंट एंड वॉटर (सीईईडब्ल्यू) के अध्ययन के मुताबिक 2070 तक नेट-जीरो लक्ष्य पाने के लिए भारत को 10 ट्रिलियन डॉलर से अधिक के निवेश (2020 की कीमत पर) की जरूरत है जिसमें 3.5 ट्रिलियन डॉलर कम पड़ सकते हैं।
जलवायु संबंधी महत्त्वाकांक्षाओं पर पूरी बहस में कोई विशेष बदलाव नहीं आया, जबकि खतरा निरंतर बढ़ रहा है। वर्तमान प्रतिबद्धताओं के साथ इस सदी के अंत तक वैश्विक तापमान बढ़ोतरी 2.5 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच जाने का अनुमान है। इतना ही नहीं, 1.5 डिग्री सेल्सियस (50 प्रतिशत संभावना के साथ) लक्ष्य के आधार पर पूरी दुनिया के लिए निर्धारित कार्बन बजट का लगभग 86 प्रतिशत हिस्सा 2030 तक खत्म होने की दिशा में है। बावजूद इसके, कॉप-27 के अंतिम दस्तावेज में सभी तरह के जीवाश्म ईंधनों को चरणबद्ध तरीके से घटाने की भारत की मांग को शामिल नहीं किया गया। लेकिन इसमें चरणबद्ध तरीके से कोयले का उपयोग घटाने और अप्रभावी जीवाश्म ईंधन सब्सिडी खत्म करने को जगह मिली है।
कुल मिलाकर, कॉप27 सभी मोर्चों पर ‘कार्यान्वयन के लिए एकजुट होने’ का उद्देश्य साधने में कमजोर रहा। ऐसे में कॉप28 से अपेक्षाएं बहुत बढ़ गई हैं। इनमें ‘हानि व क्षति’ के लिए वित्तीय प्रवाह सुनिश्चित करना, जलवायु वित्त की आपूर्ति के लिए रोडमैप बनाना और पृथ्वी के तापमान में वृद्धि 1.5 डिग्री सेल्सियस से ज्यादा न होने देने से संबंधित लक्ष्यों को जीवित रखना शामिल है।

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