कोरोना का सबसे बड़ा सबक स्वावलम्बन

आज देश और दुनिया कोरोना वायरस जिसे इससे चीनी वायरस भी कहा जा रहा है, के कहर से जूझ रही हैं। दुनिया भर के देशों में चीन पर निर्भरता को समाप्त कर स्वावलंबन की ओर रुझान है। अपने अपने देश की प्रतिभा और सामर्थ्य के अनुरूप देशों की अर्थव्यवस्थाओं को चलाने की ओर प्रयास चल रहे हैं ऐसे में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी कहा है कि इस वायरस से हमें जो सबसे महत्वपूर्ण सबक मिला है वो है स्वावलंबन।

By: Prashant Jha

Published: 10 May 2020, 04:36 PM IST

डॉ. अश्विनी महाजन , आर्थिक मामलों के जानकार

11 मई 1998 को जब तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने अमरीका को धता बताते हुए अंतरिक्ष में भारत की निगरानी करते हुए उसके उपग्रहों की नाक के नीचे भारत को परमाणु महाशक्ति के रूप में परिभाषित करते हुए राजस्थान के पोखरण में परमाणु विस्फोट कर दुनिया में धमाका मचा दिया था।उस दिन देश का मस्तक गर्व से ऊंचा हो गया था। तब से भारत परमाणु हथियारों से लैस एक महाशक्ति बन गया। भारत ने इस संदर्भ में इस बात की परवाह नहीं की कि अमेरिका या विश्व के अन्य देशों की इसके बाद क्या प्रतिक्रिया होगी । उसके बाद जब अमरीका ने भारत पर आर्थिक प्रतिबंध लगा दिए तो भी भारत सरकार ने प्रत्यक्ष अथवा परोक्ष रूप से अमरीका से उन प्रतिबंधों को हटाने के लिए भी नहीं कहा। विषय देश के सम्मान का था। देश को आणविक महाशक्ति के रूप में स्थापित कर अपना लोहा मनवाने का था।इस ऑपरेशन का नाम दिया गया ‘स्माईलिंग बुद्धा’ जिसका संकेत यह था कि भारत को परमाणु शक्ति बनाने का हेतु किसी देश पर आक्रमण करना नहीं , विश्व शान्ति का था। किसी को डराना धमकाना भी उसका हेतु नहीं था, सबब उन देशों को नसीहत देने का और उन्हें अपनी शक्ति का गलत उपयोग करने हेतु रोकने का था। अपनी इस शक्ति का प्रदर्शन करते हुए प्रधानमंत्री वाजपेयी ने भारत की परमाणु शक्ति को ‘न्यूक्लियर डेटरेंट’ कहा था यानी आणविक निवारक।

इसे दूसरे मुल्कों को आणविक हथियारों के उपयोग से रोकने वाली शक्ति के रूप में परिभाषित किया गया।दुनिया में कुल 9 ऐसे देश हैं जिनके पास आणविक हथियार हैं।यदि किसी देश के पास आणविक युद्ध की क्षमता नहीं होती तो उसे डर के माहौल में जीना पड़ता है, कि कहीं दूसरे मुल्क उस पर परमाणु हमला न कर दें। परमाणु हमला होने की स्थिति में भयानक विनाश होता है। लेकिन यदि हमारे देश के पास भी परमाणु हथियार होते हैं तो कोई भी देश हमारे ऊपर परमाणु हमला करने की कोशिश नहीं कर सकता।

अमेरिका और अन्य आणविक शक्तियों के दोहरे मापदंड
जब भारत ने परमाणु परीक्षण किया तो अमेरिका समेत अन्य परमाणु शक्तियों ने भारत की आलोचना की कि उसने शांति भंग करने का काम किया है।गौरतलब है कि दुनिया में घोषित रूप से जिन 8 देशों के पास परमाणु हथियार हैं, वे है- अमरीका , रूस, ब्रिटेन, फ्रांस और चीन वे देश है जो ‘एनपीटी’ संधि का हिस्सा हैय जबकि तीन देश भारत, पाकिस्तान और उत्तर कोरिया ऐसे देश हैं जिनके पास घोषित रूप से परमाणु हथियार तो हैं लेकिन वे देश एनपीटी का हिस्सा नहीं हैं। परमाणु हथियारों से लैस एक अन्य देश इजराइल है जिसने अपने परमाणु कार्यक्रम को गुप्त रखा हुआ है।

उपलब्ध सूचना के आधार पर इजराइल के पास 90 परमाणु हथियार हैं, अमरीका के पास 6185 परमाणु हथियार हैं जबकि रूस के पास 6500, ब्रिटेन के पास 215 फ्रांस के पास 300 , चीन के पास 250 और भारत के पास 140 परमाणु हथियार हैं। ऐसा बताया जाता है कि उत्तर कोरिया के पास 30 परमाणु हथियार हैं। ऐसे में जब अमरीका और अन्य देशों के पास परमाणु हथियारों का भारी जखीरा है और वे चाहते हैं कि वे दुनिया की थानेदारी करते रहें। इसीलिए यदि दुनिया का कोई देश सामरिक दृष्टि से मजबूत हो रहा हो तो वे विश्व शांति के नाम पर उस पर प्रतिबंध लगाने की कोशिश करते हैं। 11 मई 1998 को भारत ने केवल परमाणु विस्फोट ही नहीं किया बल्कि इन देशों की हेकड़ी को भी तोड़ा। अमेरिका ने यह कहकर कि भारत ने उसकी मर्जी के खिलाफ परमाणु विस्फोट किया है, भारत पर आर्थिक प्रतिबंध लगा दिए तो भारत द्वारा उसकी बिल्कुल परवाह भी नहीं की गई और लगभग 6 माह बाद अमेरिकी सरकार को अपनी ही कंपनियों के दबाव में सभी आर्थिक प्रतिबंध वापस लेने पड़े और इसके बाद भारत सरकार द्वारा अपने सामरिक हितों के लिए और भी कई कदम उठाए गए जैसे अंतरिक्ष कार्यक्रम, दूर मार करने वाली मिसाइल निर्माण इत्यादि, तो भी अमेरिका दादागिरी नहीं दिखा पाया था। कहा जा सकता है कि मजबूत भारत की तरफ यह पहला कदम था।यह नहीं कि पोखरण विस्फोट का अवसर 1998 में ही आया। वास्तव में हमारे वैज्ञानिकों ने इस प्रकार के परीक्षण की तैयारी बहुत पहले से ही कर रखी थी। लेकिन शायद अटल बिहारी वाजपेयी से पहले की सरकारें इतना साहस नहीं जुटा पाईं थी।
सामरिक मजबूती की दरकारआज विश्व में एक तरफ अमेरिका और दूसरी तरफ चीन अपनी सामरिक ताकत की धौंस जमा रहे हैं, भारत को अपनी संप्रभुता की रक्षा के लिए सामरिक दृष्टि से मजबूत होना जरूरी है। अटल बिहारी वाजपेयी ने पोखरण विस्फोट के माध्यम से एक स्वतंत्र सामरिक नीति का साहस दिखाया था। बाद के वर्षों में कांग्रेस के शासनकाल में अमेरिका के दबाव हुई परमाणु संधि के कारण सामरिक स्वतंत्रता में शिथिलता भी आई। हालांकि उसके कारण कांग्रेस का साम्यवादी दलों के साथ गठबंधन भी टूट गया।

हाल ही के वर्षों में भारत ने सामरिक एवं कूटनीतिक स्वातंत्र्य के उदाहरण पेश किए हैं। चीन के तमाम दबावों के बावजूद भारत द्वारा आर सी ई पी संधि से बाहर आना, चीन की ओ बी ओ आर योजना को सिरे से नकारना, अमेरिका के तमाम दबावों के बावजूद ई-कॉमर्स, व्यापार संधि और पेटेंट कानून में बदलाव के प्रस्तावों को ठुकरा देना, जैसे कई फैसले हैं, जो सरकार की इच्छाशक्ति और स्वतंत्र कूटनीति और अर्थनीति की ओर इंगित करते हैं।

आज देश और दुनिया कोरोना वायरस जिसे इससे चीनी वायरस भी कहा जा रहा है, के कहर से जूझ रही हैं। दुनिया भर के देशों में चीन पर निर्भरता को समाप्त कर स्वावलंबन की ओर रुझान है। अपने अपने देश की प्रतिभा और सामर्थ्य के अनुरूप देशों की अर्थव्यवस्थाओं को चलाने की ओर प्रयास चल रहे हैं ऐसे में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी कहा है कि इस वायरस से हमें जो सबसे महत्वपूर्ण सबक मिला है वो है स्वावलंबन।

11 मई का दिन हमारे लिए संकल्प का दिन है कि हम लगातार बिना किसी दबाव के अपनी अर्थनीति, कूटनीति और प्रौद्योगिकी नीति पर कदम बढ़ाएँ। आज की इस महामारी के चलते अमेरिका और चीन में तनाव बढ़ने के भी संकेत हैं। हमें अपनी तटस्थता और स्वातंत्र्य बनाए रखते हुए, अपने देश के हित में लगातार बिना दबाव के सामरिक शक्ति का निर्माण तो करना ही होगा। स्वतंत्र अर्थनीति और कूटनीति के माध्यम से स्वदेशी, स्वावलंबन और आत्मनिर्भरता के लक्ष्य को भी प्राप्त करना होगा। आज हमारी युवा शक्ति, सामर्थ्य, उद्यमशीलता, वैज्ञानिक उन्नति और कौशल के आधार पर इस लक्ष्य की ओर आगे बढ़ना होगा। अपनी ताकत के आधार पर भारत विश्व का मैन्यूफैक्चरिंग हब तो बनेगा ही, हमारे युवाओं को लाभकारी रोजगार, हमारी कृषि का विकास भी इसी रास्ते पर चलकर होगा।

Prashant Jha
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