कोरोनाकाल के बीच काश्तकारों के लिए पहल, स्वामित्व परियोजना का होगा आगाज

ग्रामीण भारत के लिए एक एकीकृत संपत्ति सत्यापन की योजना के तहत पंचायती राज मंत्रालय, राज्य राजस्व विभागों और भारतीय सर्वेक्षण विभाग के सहयोग से ड्रोन व नवीनतम सर्वेक्षण विधियों का उपयोग करके ग्रामीण क्षेत्रों में निवासियों की भूमि का सीमांकन किया जाएगा।

 

By: Prashant Jha

Published: 23 Apr 2020, 07:14 PM IST

विजयशंकर पांडेय, पूर्व सचिव , भारत सरकार

देश आजकल करोना वायरस से जूझ रहा है लॉकडाउन के बाद से अधिकांश सरकारी दफ्तर महीने भर बंद रहे , बाज़ार की रौनक गायब रही और व्यापारिक गतिविधियां भी ठप सी ही रहीं मॉडिफाइड लोकडाउन से अब 20 अप्रैल के बाद से देश के ग्रामीण इलाकों मैं जहाँ खेती बाड़ी का कामकाज शुरू हो गया है वहीँ ट्रकों और अन्य माल ले जाने वाले वाहनों को भी छूट दे दी गयी है। आशा की जा रही है आगे आने वाले समय में जनता के भरपूर सहयोग के चलते देश अपने सामर्थ पर इस वायरस पर जरूर काबू पाने में सफल होगा ।

विश्वव्यापी इस महामारी के प्रकोप के समय में हमारा देश वर्षों से चली आ रही एक अत्यंत व्यापक एवं गंभीर समस्या का समाधान करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम उठाने जा रहा है । प्रधानमंत्री 24 अप्रैल को स्वामित्व" परियोजना का शुभारम्भ करेंगे जिसे ग्रामीण इलाकों का भविष्य बदलने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम के रूप में देखा जा सकता है ।
इस योजना का उद्देश्य ग्रामीण भारत के लिए एक एकीकृत संपत्ति सत्यापन समाधान प्रदान करना है। इस योजना के तहत पंचायती राज मंत्रालय, राज्य राजस्व विभागों और भारतीय सर्वेक्षण विभाग के सहयोग से ड्रोन की तकनीक का उपयोग करके नवीनतम सर्वेक्षण विधियों का उपयोग करके ग्रामीण क्षेत्रों में निवासियों की भूमि का सीमांकन किया जाएगा। यह गाँव के घरेलू मालिकों को, अपने घरों को ऋण और अन्य वित्तीय लाभों के लिए एक वित्तीय संपत्ति के रूप में उपयोग करने में सक्षम करेगा और गाँवों में बसे हुए ग्रामीण क्षेत्रों के अधिकारों का रिकॉर्ड प्रदान करेगा।

इस परियोजना के तहत सर्वे ऑफ़ इंडिया अपनी उन्नत तकनीक का प्रयोग करते हुए ड्रोन की सेवाएं लेकर पूरे आबादी का सर्वे करके पूरे स्थल का एक डेटाबेस तैयार करने के उपरांत मौके पर राजस्व विभाग एवं अन्य सहयोगी विभागों के प्रतिनिधि यों के साथ ग्रामीणजनों की उपस्थिति में लोगों के स्वामित्व का रिकॉर्ड तैयार करेगी । इसी के साथ मौके पर होने वाले विवादों के निस्तारण के लिए भी एक विस्तृत व्यवस्था का निर्धारण किया गया है ।

यह संतोष की बात है कि निर्धारित प्रक्रिया का पालन करते हुए महाराष्ट्र , हरियाणा, कर्नाटक, आदि में पायलट प्रोजेक्ट के रूप में ग्रामीण आवासों का मानचित्रण, और भूमि अधिकारों के अभिलेख तैयार करने का कार्य प्रारम्भ किया जा चुका है तथा अभी तक के अनुभवों के आधार पर कहा जा सकता है कि लोगों ने इस प्रयास का भरपूर रूप से स्वागत किया है और इस प्रयास कि सराहना की है ।

आबादी की जमीन का कोई नक्शा या सीमांकन न होने के कारण सहन , नाली , नाबदान , जानवर बाँधने , मकान के निर्माण सम्बन्धी विवादों के निस्तारण के लिए पक्षों को सिविल न्यायालय की शरण लेनी पड़ती है जहाँ एक सर्वेक्षण के अनुसार इस प्रकार के आबादी सम्बन्धी विवादों के अंतिम रूप से निपटारे में लगभग बीस वर्षों का समय औसतन लगता है। अकेला यह तथ्य इस प्रकार के मामलों में शामिल पक्षों की त्रासदी को स्पष्ट कर देता है। इतना ही नहीं विशेषज्ञों के अनुसार हमारे देश के सिविल अदालतों में वर्त्तमान में लम्बित कुल मामलों में से कम से काम चालीस प्रतिशत मामले ग्रामीण आबादी से जुड़े मामले हैं जो पैदा सिर्फ इस कारण से हुए की आबादी की भूमि का कभी सीमांकन , नापजोख , लोगों के स्वामित्व को निर्धारित करने का प्रयास नहीं किया गया

इस दृष्टि से केंद्र सरकार के पंचायती राज मंत्रालय द्वारा आबादी भूमि के भीतर रहने वाले सभी लोगों की भूमि का सीमांकन करने और उनका स्वामित्व निर्धारण करने के लिए शुरू की जाने वाली इस परियोजना को एक ऐसे प्रयास के रूप में देखा जाना चाहिए जो ग्रामीण इलाकों में बढ़ते विवाद , मुकदमेबाजी को समाप्त करने में सहायक बनेगा । सिर्फ इस एक कदम से हमारी अदालतों में वर्षों से लंबित करोड़ों मामलों का आसानी से निस्तारण हो जायेगा वहीँ भूमि के स्वामित्व सम्बन्घी अभिलेखों से आबादी भूमि के आधार पर ग्रामीण अर्थव्यवस्था को बढ़ावा देने में मदद भी मिलेगी ।

 

यह प्रयास हमारे देश के ग्रामीण आबादी के भविष्य के लिए अपार संभावनाएं अपने गर्भ में छिपाये हुए हैं । समय आ गया है कि ग्रामीण इलाकों में भी शहरों की तरह ही नागरिक सुविधाओं की व्यवस्था करने पर देश कि सरकारें सोचना प्रारम्भ कर दें क्योंकि शहरों और गांव के बीच की खाई को और ज्यादा दिन बना रहने देना अब देश के हित में नहीं होगा।

Prashant Jha
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