कायम रहे पुलिस का यह सेवाभाव

देश के पुलिसकर्मी कोरोना संकट के इस दौर में सेवाभाव के अनूठे उदाहरण पेश करने में आगे रहे हैं। आगे भी उनको चाहिए कि वे कोरोना काल में अपने इस सेवाभाव को अपनी ताकत बनाएं । चिकित्सकों एवं पुलिस पर पथराव की कुछ घटनाओं को अपवाद स्वरूप छोड़ दिया जाये तो यह स्पष्ट है कि बिना बल प्रयोग के भी लोक-व्यवस्था स्थापित की जा सकती है।

By: Prashant Jha

Published: 26 May 2020, 02:28 PM IST

आर.के. विज, छत्तीसगढ़ में वरिष्ठ आईपीएस अधिकारी

विगत दो माह से कोविड-19 महामारी के चलते पूरे देश में पहले पूर्ण और अब आंशिक लाॅक-डाउन है। कोरोना के दर से घरों में दुबकना सबके लिए मजबूरी है। भय के इस माहौल में पुलिस आपातकालीन सेवा में, अन्तर्राज्यीय सीमा पर और प्रवासी मजदूरों के लिए स्थापित राहत शिविरों पर सतर्कता के साथ अपनी ड्यूटी दे रही है। हां , इतना जरूर है कि जहाॅं भी पुलिस ने डन्डे बरसाये, मीडिया ने उसकी खूब आलोचना की। सोशल मीडिया में उत्तरप्रदेश के एक स्थान पर राशन की लाइन में खड़ी महिला पर लाठ़ी चलाने वाले पुलिस कर्मी को देखकर यहाॅं तक लिख दिया गया कि पुलिस द्वारा घरों में जाकर केक काटने से बेहतर है वे सड़क पर अपना आचरण सुधारे। ऐसे दृष्टांतों के बावजूद अधिकांश स्थानों पर पुलिस एक सेवक के रूप में खड़ी नजर आई है।

कमोबेश देश भर के राज्यों में पुलिस लोगों की सहायता करती नजर आ रही है। सोशल डिस्टेंसिंग का पालन करने एवं बिना मास्क पहने घर से बाहर न निकलने का पाठ पढ़ा रही है। छत्तीसगढ में रायगढ़ के एक थाना प्रभारी ने बैनर लगाकर उसके इलाके से गुजरने वाले मजदूरों के लिए खाने की व्यवस्था की। इंदौर में पुलिसकर्मियों ने स्टाॅल लगाकर नंगे पांव गुजरते मजदूरों के लिए चप्पल आदि की व्यवस्था की। धमतरी पुलिस ने उनके क्षेत्र में पैदल मजदूरांें के प्रवेश पर न केवल खाना खिलाया व जूते-चप्पल पहनाये, बल्कि उन्हें बसों से रायपुर तक पहुॅंचाया। टाटीबंध रायपुर में पुलिस अधिकारी 24×7 घण्टे वहाॅं से गुजरने वाले मजदूर परिवारों की खाने-पीने व आराम करने की व्यवस्था में जुटे हैं।

मुझे एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी ने कान में बताया कि एक महिला पुलिसकर्मी द्वारा मजदूर महिलाओं के लिए सेनेटरी पैड की व्यवस्था की जा रही है। मुझे इस पहल पर खुशी हुई परन्तु, मेरी प्रतिक्रिया थी कि यह व्यवस्था सार्वजनिक रूप से की जाये, इसे गोपनीय रखने की कोई वज़ह नहीं है। कई पुलिसकर्मी निजी बचत एवं शहर के अन्य दानी व्यक्तियों से समन्वय स्थापित कर लोगों की सहायता कर रहे हैं। आम जनता दान देने में कहीं भी पीछे नजर नहीं आई। गुरूद्वारे, लंगर व अन्य माध्यमों से हर प्रकार की सेवा में जुटे हैं।

सभी विभागों के प्रशासनिक अधिकारियोे का लगातार यह प्रयास है कि बाहर प्रदेशों में फंसे चाहे विद्यार्थी हो, मजदूर हो या अन्य लोग, वे अपने घर लौट आयें। पूरा अमला इस काम में एकजुट खड़ा दिखाई दे रहा है। सोशल मीडिया में, मुख्यतः ट्वीटर पर, लोग मुखरता से अपनी बात सामने रख रहे हैं। अधिकारियों की प्रतिक्रिया व उन पर कार्यवाही भी तत्परता से की जा रही है। कोई भी व्यक्ति सोशल मीडिया के माध्यम से अपनी बात शासन-प्रशासन के सबसे उच्च व्यक्ति तक आसानी से पहुॅंचा सकता है।

इन तमाम उदाहरणों के साथ मैं यह चाहता हूॅं कि देश के पुलिसकर्मी कोरोना संकट के इस दौर में किये जाने वाले कार्यों को अपनी ताकत बना लें। चिकित्सकों एवं पुलिस पर पथराव की कुछ घटनाओं को अपवाद स्वरूप छोड़ दिया जाये तो यह स्पष्ट है कि बिना बल प्रयोग के भी लोक-व्यवस्था स्थापित की जा सकती है। गरीब व्यक्ति, चाहे वह मजदूर हो या रिक्शा-ठेला आदि पर काम करने वाला सामान्य व्यक्ति, यदि इनके साथ सद्व्यवहार किया जाये व सेवाभाव रखा जाये तो पुलिस की एक विशिष्ट छवि स्थापित हो सकती है। दरअसल पुलिस का मुख्य ध्येय जनता की सेवा करना ही है। हाल ही में देश में मजदूरों की स्थिति देखकर ऐसा आभास हुआ कि अभी हमें गरीब तबके के लिए बहुत कुछ करना बाकी है। निजी रूप से गरीबों के लिए चाहे पुलिसकर्मी एक सीमित दायरे में आर्थिक सहायता करें परन्तु, सेवाभाव एवं सद्व्यवहार की सिखलाई कभी न गवायें। उसे अपने जीवन का एक अभिन्न हिस्सा बना लें।

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