प्रवाह - बाकी हैं काले कानून

यदि आप सरकारी अधिकारी या कर्मचारी हैं तो भ्रष्टाचार में खूब गोते लगाइए। बस एक बात का ध्यान रखिए कि मंत्रियों और विधायकों से आपके संबंध सुमधुर होने चाहिए। बस आपके सारे अपराध माफ।

By: भुवनेश जैन

Updated: 16 Dec 2020, 09:29 AM IST

- भुवनेश जैन

यदि आप सरकारी अधिकारी या कर्मचारी हैं तो भ्रष्टाचार में खूब गोते लगाइए। बस एक बात का ध्यान रखिए कि मंत्रियों और विधायकों से आपके संबंध सुमधुर होने चाहिए। बस आपके सारे अपराध माफ। राजस्थान सरकार ने पिछले एक साल में ऐसे ही आरोपों मे पकड़े गए 17 अफसरों को 'अभियोजन स्वीकृति' नहीं देकर भ्रष्टाचार को पुरस्कृत कर दिया है। इससे पहले पिछली भाजपा सरकार भी ऐसी ही 'दरियादिली' दिखा चुकी है।

समझ में नहीं आता कि जब रिश्वत और अन्य भ्रष्टाचार के मामलों में पकड़े गए अधिकारियों-कर्मचारियों को पुरस्कृत ही किया जाना है तो भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो बना ही क्यों रखा है। रिश्वत लेते रंगे हाथों पकड़े जाने की रोज खबरें छपती हैं, पर होता क्या है? आरोपी अफसर और कर्मचारी मंत्रियों और विधायकों की शरण में चले जाते हैं और फिर न कोई मुकदमा चलता है, न सजा होती है... सीधे माफी मिल जाती है। अफसर न सिर्फ पदों पर बने रहते हैं, बल्कि तरक्की भी पाते रहते हैं।

खान विभाग के संयुक्त सचिव बी.डी. कुमावत चार लाख की रिश्वत लेते पकड़े गए। एसीबी ने कई सबूत भी जुटाए, पर सरकार ने मुकदमा चलाने की स्वीकृति देने से मना कर दिया। सहायक वाणिज्यिक कर आयुक्त कपिल असारसा, शाहबाद के तत्कालीन विकास अधिकारी राहुल बैरवा, एक्सईएन जितेन्द्र ढाका व डी.पी. सैनी, झुंझुनूं नगर परिषद आयुक्त विनयपाल सहित कितने ही अफसरों को सरकार 'अभयदान' देकर उपकृत कर चुकी है। सिर्फ राजस्थान ही नहीं देश के अन्य राज्यों में भी एेसी ही स्थिति है।

अभी ढाई माह पहले एसीबी की समीक्षा बैठक को संबोधित करते हुए मुख्यमंत्री ने जोर देकर कहा था कि अभियोजन स्वीकृति निर्धारित अवधि में दी जानी चाहिए, नहीं तो एसीबी का मनोबल टूट जाएगा। अब क्या हो रहा है। सरकार ही एसीबी का मनोबल तोड़कर भ्रष्टाचारियों का मनोबल बढ़ा रही है।
दागी लोकसेवकों को बचाने के प्रयास केन्द्र से लेकर राज्य सरकारों के स्तर पर होते रहे हैं। राजस्थान में तो पिछली भाजपा सरकार ने सीआरपीसी में संशोधन करने का अध्यादेश (काला-कानून) ही जारी कर दिया, जिसे 'राजस्थान पत्रिका' के प्रबल विरोध के बाद वापस लेना पड़ा।

भले ही काला-कानून नहीं हो, लेकिन अभियोजन स्वीकृति नहीं देकर अपराधियों को बचाने की सरकार की कोशिश काले-कानून से कम नहीं है। सीआरपीसी की धारा 197 और भ्रष्टाचार निरोधक अधिनियम की धारा 19 भी लोकतंत्र में काले-कानून से कम नहीं है। इनकी आड़ में सरकारें धीरे-धीरे न्यायपालिका के अधिकार कम करती जा रही हैं। न्यायपालिका कोई आदेश दे भी दे तो उसकी परवाह नहीं की जाती। विनीत नारायण मामले में सुप्रीम कोर्ट ने तीन माह में अभियोजन स्वीकृति देने का निर्देश दिया, पर सरकार ने वर्षों तक इसकी पालना नहीं की। अब जाकर केन्द्र सरकार ने इसके लिए समय सीमा तय की है।

रिश्वतखोर और भ्रष्ट अफसरों को बचाने के लिए सरकारें जिस बेशर्मी से अपने अधिकारियों का दुरुपयोग कर रही हैं, इससे लगता है सरकारों के लिए जनहित सिर्फ दिखावा रह गया है, असल में अब भ्रष्टाचार ही उनके लिए शिष्टाचार बन चुका है।

यह कैसा मखौल!

फीस की टीस

भुवनेश जैन
और पढ़े
हमारी वेबसाइट पर कंटेंट का प्रयोग जारी रखकर आप हमारी गोपनीयता नीति और कूकीज नीति से सहमत होते हैं।
OK
Ad Block is Banned