मैं मरूं या देश

लक्ष्य ही जीवन का सारथी होता है। लक्ष्य बन गया तो मंजिल भी स्पष्ट है। लक्ष्य ही सारी योजनाओं का आधार बन जाता है। आप कार स्टार्ट करके उसमें बैठ जाइए। बिना लक्ष्य कौनसी सड़क पकड़ेंगे?

By: Shri Gulab Kothari

Updated: 19 Jul 2020, 07:44 AM IST

लक्ष्य ही जीवन का सारथी होता है। लक्ष्य बन गया तो मंजिल भी स्पष्ट है। लक्ष्य ही सारी योजनाओं का आधार बन जाता है। आप कार स्टार्ट करके उसमें बैठ जाइए। बिना लक्ष्य कौनसी सड़क पकड़ेंगे? आज देश दिशाहीन है, लक्ष्यहीन है, क्षुद्र स्वार्थों के आगे शासन भी नहीं देख पा रहा है। प्रशासन एक कदम और भी आगे चल रहा है। सरकारों का आना-जाना आम बात है। फिर, उनकी अपनी नई-नई समस्याएं बनी रहती हैं। सब अपनी-अपनी धुन में लगे रहते हैं। देशवासी ‘सामान’ की तरह स्वयं अपना भी ध्यान रखें। मृत्युलोक से सारे जन प्रतिनिधि बाहर निकल जाते हैं। आजकल तो रिमोट कंट्रोल का युग है। वेबिनार शीर्ष पुरुष है और घर ही स्वर्गलोक बन गया है। कोरोना ने एक बड़ा वरदान दे दिया-‘वर्क फ्रॉम होम’ (गृहस्थ महिलाओं के लिए नहीं)। कहीं ‘वर्क फ्रॉम होम’ कार्य करने में बहुत सफल सिद्ध हुआ है, तो भारत जैसे गृहस्थ समाज की अपनी कहानी है।

कोरोना के दौर में लॉकडाउन व अनलॉक जैसे अंग्रेजी शब्दों के घेरे में बंट गया जीवन। कभी इस प्रदेश में, कभी उस प्रदेश में सीमाएं सील हो जाती हैं। जीवन में छाले पड़ गए। रोजगार, उद्योग, कार्यालय (सरकारी) ठप पड़े हैं। बाकी देश चल रहा है। भीड़ की जगह भीड़ भी मौजूद है। दिल्ली की जिन सरकारी संस्थाओं में मेरे कुछ निजी कार्य (लेखन सम्बन्धी) अटके हैं, तो कोरोना के कारण। कोरोना ने सरकारों को, नेताओं-अधिकारियों को मानो छुई-मुई बना दिया। बड़े अधिकारी वर्क-फ्रॉम-होम, मंत्रीगण-वर्क-फ्रॉम-होम। बाकी देश? कहां गई लोकतंत्र की जनता के लिए ली हुई शपथ? कोई भी अधिकारी स्वयं को जनता का सेवक मानने वाला नहीं है।

आज कोरोना संक्रमण विस्फोटक दौर में पहुंच चुका है। आगे और भी डरावना होता दिखाई पड़ रहा है। तब क्या हमारे जन प्रतिनिधि ‘जूम’ पर ही बैठकें करते रहेंगे? क्या संसद और विधानसभाओं के सत्र स्कूल-कॉलेजों की तर्ज पर बन्द ही रहेंगे? वेतन भी मिलता रहेगा। देश का क्या होगा? अनेकों गंभीर मुद्दे हवा में झूल रहे हैं। लोकतंत्र में विधायिका यदि ‘वर्क-फ्रॉम-होम’ पर जाती है, तब हम क्या पड़ोसी देशों की कथाएं करते रहेंगे? क्या उद्योगों, बेरोजगारों एवं अन्य आर्थिक मुद्दों को चर्चा से, निर्णयों से बाहर रखेंगे? कोरोना की वापसी यदि साल-दो साल बनी रही, तो क्या संसद/विधानसभाओं के सत्र नहीं होंगे? अब फिर चुनाव आने वाले हैं। वहां इकट्ठा होने में, सभाएं करने में किसी को कोरोना का भय नहीं है।

क्या भारत-चीन सीमा मुद्दे पर संसद में बहस नहीं होनी चाहिए? बांग्लादेश फिर से पाकिस्तान से हाथ मिला रहा है। ‘एक देश, एक राशन कार्ड’ का लम्बित मुद्दा है। सबसे गंभीर तो कोरोना का मुद्दा है, जो कि प्रत्येक प्रदेश की विधानसभा में चर्चा की अनिवार्यता दर्शाता है। ‘डिजास्टर मैनेजमेंट’ के नाम पर क्या हो रहा है। सरकारी प्रयास, उनके परिणाम तथा भावी योजनाएं क्या हैं? जिस तेजी के साथ कोरोना बढ़ रहा है, उसको लेकर अनेक प्रश्न जनता के मन में उठ रहे हैं। कहीं पुन: लॉकडाउन की चर्चाएं चल पड़ी हैं। उधर नेपाल ने भारत के नक्शे को बदल दिया। ईरान ने भारत को छोडकऱ चीन से हाथ मिला लिया। पेट्रोल-डीजल के भाव क्या उद्योगों पर भारी नहीं पड़ेंगे? चीन के साथ नए व्यापार का क्या स्वरूप होगा? उसके औद्योगिक आयात की कैसे हम भरपाई करेंगे? किसानों को बिजली की आपूर्ति, आसमान छूते बिजली के नकली बिल, राशन के अनाज के घोटाले, स्कूलों की फीस के और भर्ती जैसे मुद्दे, बजरी माफिया की जेब में पुलिस की इज्जत, किसानों को खाद-बीज की आपूर्ति में बाधा आदि दर्जनों मुद्दे हैं जो तुरन्त ध्यान चाहते हैं। कोरोना का डर क्या आज भी जनजीवन की तत्कालीन समस्याओं से तथा राष्ट्रीय स्तर के गंभीर मुद्दों से अधिक बड़ा है?

सभी सरकारों को चाहिए कि बिना किसी लीपापोती के अपने-अपने सदनों की बैठकें तुरन्त बुलाने के प्रयास करें। सावधानियां जो भी आवश्यक हों, किसी निर्देशिका के जरिए जारी की जा सकती हैं। भविष्यवाणियां तो कह रही हैं कि कोरोना के फैलने की गति बढ़ेगी। तब क्या ‘सदन’ अनिश्चित काल के लिए बन्द हो जाएंगे? ये तो लोकतंत्र का स्वरूप नहीं कहा जा सकता। किसी के जाने की तारीख तो टल नहीं सकती है, भले ही लॉकर में रहे। देश सेवा के अवसर भी वैसे तो आपातकाल में आते हैं। हम हार नहीं मानेंगे....।

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