आख्यान - कायर होते हैं ज्वलंत प्रश्नों पर चुप रहने वाले

- मनुष्य अपने पितरों के ऋण से तभी मुक्त हो सकता है जब वह उनके देश, धर्म, सभ्यता और उनकी प्रतिष्ठा की रक्षा के लिए अपना सर्वस्व न्योछावर कर दे।

By: विकास गुप्ता

Published: 13 Jan 2021, 01:42 PM IST

अपनी कुटिया में बैठे युधिष्ठिर को समाचार मिला कि दुर्योधन को भीलों ने बंदी बना लिया तो उन्होंने अर्जुन को उन्हें छुड़ाने का आदेश दिया। अर्जुन समाचार सुन कर मन ही मन प्रसन्न हुए। उन्होंने कहा, 'हम उन दुष्टों को मुक्त कराने क्यों जाएं भइया? उन्होंने हमारे साथ छल किया, हमारा अपमान किया, हमारी प्रतिष्ठा पर प्रहार किया... अभी उन्हें उनके कुकर्मों का दण्ड मिल रहा है, उन्हें भोगने दीजिए।

युधिष्ठिर गम्भीर थे। कहा, 'अनुज! वह हस्तिनापुर का युवराज है। उसकी प्रतिष्ठा कुल की प्रतिष्ठा है। कुल की प्रतिष्ठा व्यक्तिगत प्रतिष्ठा से अधिक महत्त्वपूर्ण होती है अर्जुन! हमें उसकी रक्षा करनी ही होगी। अर्जुन के अंदर दुर्योधन के लिए कोई संवेदना नहीं थी। वह रुष्ट स्वर में बोले, 'कुछ भी हो भइया, हमें उन अधर्मियों की रक्षा नहीं करनी चाहिए। मैं उस दुष्ट दुशासन और नीच कर्ण की रक्षा के लिए नहीं जा सकता। मुझे उनके मान-अपमान की क्या चिंता?

युधिष्ठिर अर्जुन की पीड़ा समझतेष वह प्रेम से बोले, 'तो क्या तुम चाहते हो, इतिहास यह बताए कि युधिष्ठिर के रहते महाराज भरत के कुल का युवराज भीलों द्वारा मार दिया गया और वह चुपचाप देखता रहा? दुर्योधन का अपमान यदि केवल उसका अपमान होता तो मैं कुछ नहीं कहता अर्जुन! पर यह पितामह भीष्म, महाराज धृतराष्ट्र, और हमारे समस्त महान पितरों का भी अपमान है। हम तटस्थ नहीं रह सकते...।

अर्जुन ने आपत्ति की, 'तो क्या हमारे अपमान का कोई मूल्य नहीं? युधिष्ठिर ने कहा, 'महान लोग स्वयं के लिए नहीं जीते अर्जुन, वे अपना जीवन अपने युग को समर्पित कर देते हैं। यह युग तुम्हारा है, तो इस युग की हर घटना का उत्तरदायित्व तुम्हारा है। अपने समय के ज्वलंत प्रश्नों पर चुप्पी साध लेने वाले लोग कायर होते हैं अर्जुन! जो लोग स्वयं के मान-अपमान से ऊपर उठ कर अपने समय के लिए जीते हैं वही नायक होते हैं।

अर्जुन के पास अब प्रश्न नहीं बचे थे। युधिष्ठिर ने फिर कहा, 'मनुष्य अपने पितरों के ऋण से तभी मुक्त हो सकता है जब वह उनके देश, धर्म, सभ्यता और उनकी प्रतिष्ठा की रक्षा के लिए अपना सर्वस्व न्योछावर कर दे। मान-अपमान का मोह भी...। अर्जुन युग के नायक थे, समझ गए। बड़े भाई को प्रणाम किया और गांडीव उठा कर कुटिया से निकल गए।

- सर्वेश तिवारी श्रीमुख
पौराणिक पात्रो΄ और कथानको΄ पर लेखन

विकास गुप्ता
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