आत्मघाती गो-केंद्रित राजनीति

आत्मघाती गो-केंद्रित राजनीति

Dilip Chaturvedi | Publish: Jan, 08 2019 03:44:04 PM (IST) विचार

वास्तव में जब तक कृषि और पशु पालन को आर्थिक रूप से फायदेमंद नहीं बनाया जाएगा, तब तक गो-कल्याण उपकर और गो-संरक्षण केंद्रों जैसे उपायों से आवारा गायों और दूसरे जानवरों की समस्या का हल नहीं हो सकता।

प्रमोद मीणा, लेखक-आलोचक

उत्तरप्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ गाय के मुद्दे को लेकर तीखा बोलने वाले भगवा नेता के रूप में ख्यात रहे हैं। किंतु अब यही गोरक्षा संभवत: उनके लिए गले की हड्डी बनती जा रही है। जिस तरह से उत्तरप्रदेश में योगी सरकार के आने के बाद से अनुपयोगी गोवंश और दूसरे आवारा पशु खेती-किसानी के लिए एक बहुत बड़ा सिरदर्द बन चुके हैं, उससे तंग आकर सूबेभर के किसान अब धीरे-धीरे योगी सरकार के खिलाफ लामबंद होने लगे हैं।

खेतों में पसीना और पैसे बहाने वाले किसानों को अपनी कृषि उपज के मंडी में वाजिब दाम नहीं मिलना गंभीर समस्या बनी हुई है। 19 मीट्रिक टन आलू बेचकर मात्र 490 रुपए मुनाफा कमाने वाला किसान इसका जीता-जागता उदाहरण है। दूसरी ओर किसानों को रात-रात भर जागकर आवारा पशुओं से अपनी फसलों की रक्षा करनी पड़ रही है। स्थिति इतनी विस्फोटक हो चुकी है कि अलीगढ़, फिरोजपुर और आगरा आदि जिलों में किसानों द्वारा तंग आकर आवारा मवेशियों को खदेड़कर सरकारी स्वास्थ्य केंद्रों और विद्यालयों में बंद करने की कुछ घटनाएं सामने आई हैं।

शहरी क्षेत्रों में सड़कों पर इधर-उधर भटकते गोवंश के कारण आए दिन दुर्घटनाएं घटती देखी जा सकती हैं। गोवंश को सरकारी स्वास्थ्य केंद्रों और विद्यालयों में जबरन बंद करने की इन घटनाओं को इक्का-दुक्का घटना बताकर स्थिति की गंभीरता को नकारने की चाहे जितनी कोशिशें की जाएं, लेकिन हाल में संपन्न पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों में भाजपा के स्टार प्रचारक और आसन्न आम चुनावों की आहट सुन रहे मुख्यमंत्री योगी जानते हैं कि चुनावी मौसम में किसानों की खड़ी फसलें चट कर रहे गोवंश और दूसरे आवारा पशुओं की समस्या का निराकरण नहीं किया गया तो उनकी गो-केंद्रित आक्रामक भगवा राजनीति पलटकर उन्हीं के ऊपर उलटा वार कर सकती है।
आवारा पशुओं के कारण गहराते कृषि संकट का मुकाबला करने के लिए नए साल के पहले सप्ताह में मुख्यमंत्री योगी ने आनन-फानन में अब यह रास्ता निकाला है कि राज्य भर में भटक रही निराश्रित गायों के लिए अस्थायी आश्रय गृह चालू किए जाएं।

दूसरी तरफ, उन्होंने अतिरिक्त गो-कल्याण उपकर लागू करके आवारा गोवंश का भार आम जन के ऊपर ही डालकर अपनी जिम्मेदारी से बचने की चेष्टा ही की है। समाजवादी पार्टी के प्रवक्ता राजेंद्र चौहान ने मुख्यमंत्री योगी से बिल्कुल उचित ही सवाल पूछा है कि गायों की रक्षा करना जब सरकार की जबावदेही है, तो फिर सरकार की गो-नीति के तहत जो कदम उठाए जा रहे हैं उनका बोझ आम आदमी क्यों उठाए?

किंतु योगी सरकार को लगता है कि गाय के नाम पर आबकारी वस्तुओं पर 0.5 प्रतिशत का अतिरिक्त उपकर भी जनता से वसूला जा सकता है। आवारा गोवंश की समस्या के समाधान के नाम पर आम जनता की जेब काटी जा रही है। किंतु भगवा राजनीति का यह बोझ जनता क्यों उठाए?

असल में योगी आदित्यनाथ और उनकी भगवा ब्रिगेड के लिए गाय, दूध देने वाली जानवर न होकर वोट देने वाली जानवर है। उन्होंने आवारा गायों के लिए आश्रय केंद्रों की अस्थायी व्यवस्था करने के आदेश के साथ-साथ कांजी हाउसों का नाम बदलकर गो-संरक्षण केंद्र करने और १० जनवरी तक सभी आवारा गोवंशों को इन केंद्रों में बंद कर देने का एक और फरमान भी जारी किया है। क्या मात्र नाम बदल देने से कंाजी हाउसों की बदहाली और उनमें जारी भ्रष्टाचार रुक जाएगा।

गौरतलब है कि कई मामलों से अब यह भी साबित हो चुका है कि गो-संरक्षण आर्थिक रूप से भी फायदे का सौदा साबित हो रहा है। आवारा पशुओं से निजात दिलाने के नाम पर चलने वाले कांजी हाउस हों या गो-संरक्षण के नाम पर खोली जाने वाली गोशालाएं हों, इनसे आवारा पशुओं और गायों का कोई कल्याण हुआ हो या न हुआ हो, लेकिन इनके संचालकों के दोनों लोक जरूर संवर जाते हैं।

मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को 'गोदान' लिखने वाले प्रेमचंद की कहानी 'दो बैलों की कथा' भी इस संदर्भ में एक बार जरूर पढ़ लेनी चाहिए। उन्हें 'गोदान' के संदर्भ में भी आवारा गोवंश की समस्या पर विचार करना चाहिए, क्योंकि अगर वे इस दिशा में ईमानदारी के साथ अपनी गो-नीति पर आत्मावलोकन करेंगे तो उन्हें स्पष्ट रूप से समझ आ जाएगा कि अपने द्वार पर गाय बंधी होना जिस उत्तरप्रदेश के किसान की कभी सबसे बड़ी मर्यादा होती थी, उसी उत्तरप्रदेश में अब किसान क्यों अपने द्वार पर उस गाय को नहीं बांधना चाहते, जो गैर उत्पादक हो जाती है।

वास्तव में जब तक कृषि और पशु पालन को आर्थिक रूप से फायदेमंद नहीं बनाया जाएगा, तब तक गो-कल्याण उपकर और गो-संरक्षण केंद्रों जैसे उपायों से आवारा गायों और दूसरे जानवरों की समस्या का हल नहीं हो सकता। उत्तरप्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ भले ही गो-संरक्षण केंद्रों और गोशालाओं को आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनाने की बड़ी-बड़ी बातें करते रहें, लेकिन ये उन्हीं की नीतियां हैं, जिनके कारण गोमाता बेसहारा हो सड़कों और खेतों में भटक रही है। गोवंश की बदहाली के लिए कृषि के मशीनीकरण को ही जिम्मेदार ठहराना भी समस्या का सरलीकरण ही कहा जाएगा।

(लेखक, मोतिहारी (बिहार) के महात्मा गांधी केंद्रीय विश्वविद्यालय में पढ़ाते हैं।)

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