समान उत्तराधिकार के लिए दायित्व भी तो समान होंगे

क्या ससुराल पक्ष, बहू की पैतृक संपत्ति को जिस प्रसन्नता से स्वीकार करेंगे उसी भाव से उसके दायित्वों को भी निभाने में वे सहयोग देंगे?

By: सुनील शर्मा

Published: 10 Feb 2018, 02:06 PM IST

- ऋतु सारस्वत

भारतीय परंपरा, स्त्री के संपत्ति अधिकार के विरुद्ध कभी नहीं रही। 11वीं शताब्दी में ‘मिताक्षरा’ याज्ञवल्क्य स्मृति में जन्मना उत्तराधिकार के सिद्धान्त का उल्लेख किया गया है। इसके अनुसार, प्रत्येक व्यक्ति को जन्म से ही पिता की संयुक्त परिवार संपत्ति में भागीदारी प्राप्त हो जाती है। सर्वोच्च न्यायालय ने भी ‘मिताक्षरा’ का उल्लेख करते हुए कहा कि ‘बेटी संपत्ति में जन्म से साझी हिस्सेदार होगी। उसके भी वही अधिकार व दायित्व होंगे जो बेटे के होते हैं।’ हर संवेदनशील व्यक्ति के लिए यह हर्ष का विषय है परन्तु ‘अधिकारों’ के स्वर इतने मुखरित हो जाते हैं कि अधिकतर ‘दायित्वों’ की बात गौण हो जाती है। इस संदर्भ में भी यही आशंका है।

इसमें संदेह नहीं कि वैधानिक रूप से स्त्री को पैतृक संपत्ति में अधिकार देने की पहल हुई है पर इसका मौन विरोध भी है। जिन बेटियों ने अपने इस अधिकार के बारे में विचार भी किया, उन्हें प्रत्यक्ष यह संकेत दे दिए गए कि अगर वे ऐसा करती हैं तो उन्हें अपने परिवार से सभी प्रकार के भावनात्मक संबंध खत्म करने होंगे और यह किसी भी बेटी को सहज स्वीकार्य नहीं होता और ऐसे में वह अपने अधिकारों को छोड़ अपने परिवार से संबंध कायम रखना बेहतर समझती हैं।

ऐसे परिवारों की संख्या बहुत कम होगी जहां बेटों के रहते, बेटियों को सहजता से पैतृक संपत्ति में अधिकार दिए गए हों। इसके साथ प्रश्न यह भी है कि पैतृक संपत्ति पर समान अधिकारिणी बेटिया क्या सहजता से उन सभी दायित्वों को पूर्ण करने को तत्पर हो पाती है जो सामाजिक रूप से मूलत: बेटों के माने जाते हैं। खास कर विवाहित बेटियां, जिनके दायित्व का दायरा पति और ससुराल होता है। क्या ऐसे में, उसके लिए अपने माता-पिता को अपने समीप रख, उनकी देखभाल करना सहज होगा? क्या ससुराल पक्ष, बहू की पैतृक संपत्ति को जिस प्रसन्नता से स्वीकार करेंगे उसी भाव से उसके दायित्वों को भी निभाने में वे सहयोग देंगे?

यह प्रश्न जितना उलझा हुआ है, उतना ही पीड़ादायक इसका उत्तर है। भरण-पोषण कल्याण अधिनियम 2007 के मुताबिक किसी भी वरिष्ठ नागरिक व माता-पिता की जिम्मेदारी उनके उत्तराधिकारी या बच्चों को उठानी होगी। अवमानना पर जुर्माना व जेल की सजा का प्रावधान है। ऐसे में पैतृक संपत्ति में अधिकारिणी बेटियों के विरुद्ध भी उत्तरदायित्व नहीं निभाने पर माता-पिता अदालत जा सकते हैं? क्या यह बेटियों, उनके ससुराल वालों और खुद माता-पिता को स्वीकार्य होगा? समान अधिकार चाहिए तो इसके लिए भी तैयार रहना होगा। अधिकारों व दायित्वों की उलझन, फिलहाल सहजता से नहीं सुलझने वाली। इन्हें कानून या अदालती फैसलों से नहीं सामाजिक मानसिकता बदलकर ही सुलझाया जा सकता है।

सुनील शर्मा
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