यह समय एक्शन का है: जी.डी. बख्शी

यह समय एक्शन का है: जी.डी. बख्शी

Dilip Chaturvedi | Updated: 25 Feb 2019, 08:10:23 PM (IST) विचार

पुलवामा हमले के आतंकियों को मकान में घेरकर गोलियां चलाने के बजाय हेलिकॉप्टर से टैंक उतारकर, उस इमारत के परखच्चे उड़ा देने चाहिए थे जिसमें आतंकी छिपे थे। इस तरह हमें और शहादतें नहीं देनी पड़तीं। क्या हमारी तोप, टैंक, हेलीकॉप्टर केवल रिपब्लिक डे की परेड के लिए ही हैं?

जी.डी. बख्शी, रक्षा विशेषज्ञ

देश के जवानों पर पुलवामा में हुए हमले के लिए अगर कोई जिम्मेदार है तो वे हैं जम्मू-कश्मीर के राजनेता। उन्होंने अपनी सस्ती लोकप्रियता के लिए और अपना एजेंडा पूरा करने के उद्देश्य से हमारी सुरक्षा एजेंसियों के हाथ बुरी तरह से बांध दिए। इनकी मांग थी इसलिए सुरक्षा एजेंसियों के चेकपोस्ट समाप्त किए गए। ये कहा करते थे कि सेना की जगह सीमा पर है, सीमा के अंदर नहीं। इनके दबाव और संभावित नाराजगी के मद्देनजर दक्षिण कश्मीर खाली करना पड़ा। इसका सेना के मनोबल पर विपरीत असर पड़ा।

मैं कहता हूं कि ऐसे नेताओं की नाराजगी का कोई अर्थ नहीं, जो देश की सेना का मनोबल कमजोर करने के लिए काम करते हों। आज वे कहते हैं कि कश्मीर खतरे में हैं, जबकि वर्ष 2000 से 2005 के दौरान वहां 4500 हथियारबंद आतंकी मौजूद थे और इनमें 60 फीसदी से अधिक पाकिस्तानी थे। जब उन्हें चुन-चुनकर मारना शुरू किया गया, उनकी संख्या केवल 250 रह गई थी। अब इतने से आतंकियों के कारण कश्मीर खतरे में है! इनसे क्या भारत घबरा जाएगा!

बंद होना चाहिए ये जो तमाशा कश्मीर में होता है। वर्ष 2002 से पहले तक जब सेना की गाड़ी निकला करती थीं, तो सिविल ट्रैफिक को रोक दिया जाता था। स्थानीय नेताओं ने चीखना-चिल्लाना शुरू कर दिया कि इससे आम कश्मीरी को परेशानी होती है। अब सिविल ट्रैफिक रोका नहीं जाता और इसी वजह से हमें पुलवामा में 40 से अधिक जवानों की जानें गंवानी पड़ीं।

यह सही है कि अब आतंक की ज्यादातर घटनाओं के पीछे कुछ स्थानीय लोगों का हाथ होता है, जो कि पाकिस्तानी रणनीति का ही नतीजा है। वर्ष 2008 के बाद से उसने अपना पैंतरा बदला है और अब वह स्थानीय कश्मीरी युवाओं को बरगलाता है और मोहरा बनाकर उन्हें इस्तेमाल करता है। वह उन्हें ट्रेनिंग देकर आतंकी कार्रवाइयों को अंजाम देता है। और, जवानों से इन आतंकियों को नन्हे-नन्हे प्यारे घरेलू बच्चे कहकर उदारता दिखाने और छोडऩे के लिए कहा जाता है। लेकिन, बहुत दिखाई जा चुकी है उदारता। अब कठोर रुख अपनाना ही होगा। सशस्त्र सेना को आगे बढ़कर आतंकियों से निपटना होगा। अपनी फायर पावर का इस्तेमाल करना ही होगा।

जब पाकिस्तान, चीन अपने यहां ऑपरेशन में टैंक और तोपों का इस्तेमाल करते हैं तो हम क्यों नहीं करते। पुलवामा हमले के आतंकियों को मकान में घेरकर हम गोलियां चला रहे हैं। आखिर कब तक इस तरह से लड़ते रहेंगे। हमें हेलिकॉप्टर से टैंक उतारकर, जिस इमारत में आतंकी छिपे थे उसके ही परखच्चे उड़ा देने चाहिए थे। हमें और शहादतें नहीं देनी पड़तीं। मैं पूछता हूं कि क्या हमारी तोप, टैंक, हेलीकॉप्टर केवल रिपब्लिक डे की परेड के लिए ही हैं?
अब समय गया है, 'वी शुड गेट टफ अगेंस्ट देम'। बैकफुट पर रहकर लड़ाई कभी नहीं जीती जाती। देश का कानून सभी के लिए बराबर होता है। पत्थरबाजों की परवाह करनी छोडऩी होगी। कश्मीरी नेताओं को ज्यादा तवज्जो देने की अब जरूरत नहीं है। छर्रों से लड़ाई कब तक लड़ेंगे कश्मीर में।

हरियाणा के सिरसा में डेरा सच्चा सौदा में टफ होकर गोली चलाई, एक दिन में छब्बीस लोग मारे गए। फिर कानून का शासन लागू हो गया। कोई मानवाधिकार की बात करने वाला खड़ा नहीं हुआ। वहां न टीयर गैस, वाटर कैनन और न ही छर्रे चलाए गए। यदि हरियाणा में हो सकता है तो कश्मीर में भी हो सकता है जहां पत्थरबाजी हो रही है, सिर फोड़े जा रहे हैं।

अब आर-पार की लड़ाई होनी चाहिए। देश इंतजार कर रहा है बदले की कार्रवाई का। जनता चीत्कार कर रही है। पलटवार करो, अपने इलाके में लड़कर मत मरो, फॉर गॉड सेक हिट बैक। जो रक्षात्मक होकर लड़ते हैं उन्हेंं ***** समझा जाता है। इतिहास याद करें, हम अहिंसा परमोधर्म: का पालन करते रहे हैं। हम रक्षा के लिए अपनी जमीन पर लड़े। इन लड़ाइयों में हमने अपने ही गांव बर्बाद किए। अहिंसा परमोधर्म: ठीक है, लेकिन धर्म की रक्षा के लिए यदि ङ्क्षहसा करनी पड़े तो इसे अनुचित नहीं कहा जा सकता। हमारे देश के जवानों की जानें सस्ती नहीं हैं।

देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सेना को छूट देने की बात कही है, मुझे खुशी है इस बात की। और भी कई मामलों में ठोस फैसले लिए जाने हैं और उनसे सकारात्मक परिणामों की उम्मीद है। उन्हें डांवांडोल होने की जरूरत नहीं है। वे सड़क पर उतरकर विरोध करने वालों की परवाह करना बंद करें।

सवाल उठाए जा रहे हैं कि फौज को हेलीकॉप्टर से क्यों नहीं भेजा सकता था, सड़क के रास्ते क्यों गए। अरे, मैं पूछता हूं कि इन 250 आतंकियों के कारण क्या हम सड़क पर अपना चलना-फिरना बंद कर देंगे? इस सोच ने ही हमें कमजोर बना दिया है। विरोध करने वाले चिल्लपों करते रहेंगे और बाद में गायब हो जाएंगे। ठोक कार्रवाई का विरोध करने वालों की प्रतिक्रिया से प्रभावित होने की जरूरत कतई नहीं है। यह सत्तारूढ़ दल की जिम्मेदारी है कि ऐसी परिस्थिति में वह पलटवार का फैसला ले। अब भी कदम नहीं उठाया गया तो चुनाव आने वाले हैं और जनता फौज से नहीं, बल्कि सत्तारूढ़ दल से ही सवाल पूछेगी। यह समय एक्शन का है, निष्क्रियता बहुत भारी पड़ सकती है। राजनीतिक दलों की सहमति बनने का इंतजार नहीं कर सकते।

सवाल पूछे जाने लगे हैं कि क्या हमारी सेना एक और युद्ध के लिए तैयार है तो जनाब, करगिल युद्ध के वक्त भी जनरल वी.पी. मलिक से यही पूछा गया था। उन्होंने जवाब दिया था कि जो कुछ हमारे पास है, उससे हम जमकर लड़ेंगे। आज भी पूछेंगे तो सेना का यही जवाब होने वाला है।

भविष्य में जब भी मौका मिले तो जम्मू-कश्मीर राज्य को तीन केंद्र शासित प्रदेशों में बांट देना चाहिए। एक जम्मू, दूसरा लद्दाख और तीसरा कश्मीर घाटी। यह आतंक तो केवल घाटी में ही है। घाटी के पांच राज्यों के हालात काबू करने में ज्यादा परेशानी नहीं आने वाली।

(भारतीय सेना के सेवानिवृत्त अधिकारी और लेखक। विशिष्ट सेवा पदक से सम्मानित।)

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