लोकतंत्र देश की सबसे बड़ी ताकत

भारत के लोकतांत्रिक मूल्यों की मिसाल पूरी दुनिया में दी जाती है। लेकिन 25 जून 1975 को जो हुआ उसे भारतीय जनमानस कभी नहीं भूलेगा।

By: shailendra tiwari

Updated: 24 Jun 2020, 04:24 PM IST

  • प्रभात झा, पूर्व सांसद व भाजपा के राष्ट्रीय उपाध्य्क्ष

आज भारत दुनिया का न केवल सबसे बड़ा और सबसे सफल लोकतंत्र है। भारत के लोकतांत्रिक मूल्यों की मिसाल पूरी दुनिया में दी जाती है। लेकिन 25 जून 1975 को जो हुआ, भारत का लोकतंत्र और भारतीय जनमानस कभी नहीं भूलेगा। कांग्रेस सरकार और तत्कालीन प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी ने लोकतंत्र को कुचलने का अक्षम्य कृत्य किया। आज के माहौल में देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी समेत उनके मंत्रिमंडल के कई सदस्य और कई राज्यों के मुख्यमंत्री भी आपातकाल के दमन चक्र का विरोध करने वाले लोकतंत्र के सिपाही हैं।


देश में पहली बार मोरारजी देसाई के नेतृत्व में गैर-कांग्रेसी सरकार बनी। तब संविधान के पन्नों को फिर से सहेजा गया। सबसे पहले सरकार द्वारा 43वें संविधान संशोधन लाकर सर्वोच्च एवं उच्च न्यायालयों को उनके अधिकार वापस दिए गए। सर्वोच्च न्यायालय ने भी 42वें संशोधन के कई प्रावधानों को असंवैधानिक करार देते हुए संविधान को उसका मूल स्वरुप लौटाया। इसके बाद 44वां संशोधन लाया गया। न्यायपालिका को दोबारा मजबूती देकर और 42वें संशोधन के दोषों को दूर करने के साथ ही 44वें संशोधन द्वारा संविधान को अपेक्षा से अधिक सशक्त किया गया, ताकि आपातकाल जैसी स्थिति लाकर फिर से भारतीय लोकतंत्र के साथ खिलवाड़ न किया जा सके।


सही मायने में लोकतांत्रिक अधिकरों को कुचलने वाली हर प्रक्रिया लोकतंत्र और लोकतांत्रिक मूल्यों के लिए खतरा है। साथ ही भारत के विश्व महाशक्ति बनाने में बाधक है। भारतीय लोकतंत्र को ऐसी निरंकुश मानसिकता के चंगुल से बचाना हमारा नागरिक कर्तव्य है। आजाद भारत में 25 जून 1975 को लोकतंत्र की और संविधान की हत्या करने का जो दुस्साहस तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने दिखाया, उसकी याद आते ही आज भी तन-मन सिहर जाता है। देश में यह आपातकाल अकारण लगा दिया गया था। गुइंदिरा गांधी की सरकार ने आम भारतीयों और देश के विपक्षी नेताओं के साथ बुरा बर्ताव करना शुरू कर दिया। उस दौर में पूरा देश सकते में था। आजादी न बोलने की, न लिखने की, न छापने की और न कानून के शरण में जाने की थी. न ही अपनी जिंदगी जीने की, न विरोध करने की. इतना ही नहीं कार्यपालिका का, विधायिका और न्यायपालिका का मान भी कुचलने में कोई कसर नहीं राखी गई।


इंदिरा गांधी ने पांचवीं लोकसभा का चुनाव रायबरेली से जीता था। स्व.श्री राजनारायण ने इस चुनाव के विरुद्ध इलाहाबाद उच्च न्यायालय मे एक याचिका दायर की थी। इस याचिका पर 12 जून 1975 को इलाहाबाद उच्च न्यायालय के न्यायधीश सिन्हा ने इंदिरा गांधी का निर्वाचन रद्द घोषित कर दिया। चुनाव रद्द कर छह वर्षों के लिए उन्हें राजनीति से बेदखल कर दिया। इंदिरा गांधी ने इस निर्णय को षडयंत्र करार दे दिया और 25 जून, 1975 रात 12 बजे आपातकाल की घोषणा कर दी। डिफेंस ऑफ इंडिया रूल और मेंटेनेंस ऑफ इंटरनल सिक्यूरिटी एक्ट (मीसा) लागू कर देश के सभी गैर-कांग्रेसी राजनीतिक दलों, अनेकों सामाजिक संस्थाओं, राष्ट्रवादी शैक्षणिक संस्थाओं, सामाचार पत्रों पर प्रतिबंध लगा दिया गया, वहीं गैर-कांग्रेसी नेताओं तथा राष्ट्रवादी विचारकों एवं पत्रकारों को रातो-रात गिरफ्तार कर लिया गया।


जयप्रकाश नारायण, अटल बिहारी वाजपेयी, लालकृष्ण आडवाणी, प्रकाश सिंह बादल, जॉर्ज फ़र्नान्डिस सहित अनेकों नेताओं व कार्यकर्ताओं को गिरफ्तार करके जेलों में बंद कर दिया गया। जयप्रकाश नारायण को दिल्ली में गिरफ्तार किया गया जहां वे इंदिरा सरकार के विरुद्ध एक विशाल जनसमूह का नेतृत्व कर रहे थे। उनके साथ मोरारजी देसाई, राजनारायण, नानाजी देशमुख को भी गिरफ्तार किया गया। वहीं अटल बिहारी वाजपेयी, लालकृष्ण आडवाणी एवं मधु दंडवते को बंगलुरु से गिरफ्तार किया गया जो वहां संसदीय समिति की एक बैठक में भाग लेने गए हुए थे।


26 जून की सुबह इंदिरा गांधी ने ऑल इंडिया रेडियो (आकाशवाणी) पर देशवासियों को आपातकाल लगाए जाने की जानकारी दी। आपातकाल लगाने के बाद इंदिरा गांधी ने संविधान की धज्जियां उड़ाना शुरू की। कार्यपालिका, विधायिका, न्यायपालिका और खबरपालिका , लोकतंत्र के इन चारों स्तंभों को बंधक बना लिया गया। देश के आम नागरिकों के सभी मौलिक अधिकार छीन लिए गए। जब विपक्ष के सभी नेता जेल में थे, तब संसद में 41वां संशोधन विधेयक लाया गया। इस विधेयक ने तो संविधान विधि द्वारा स्थापित न्याय प्रणाली और संसदीय प्रणाली की धज्जियां उड़ा कर रख दीं। व्यक्तिगत और वाक् स्वतंत्रता एवं निजता के अधिकार जैसे मौलिक अधिकारों को प्रतिबंधित कर दिया गया। आपातकाल की घोषणा किए जाने के दो दिन बाद 28 जून को प्रेस व मीडिया पर प्रतिबंध लगा दिया गया। समाचार पत्रों पर खबर छापने से पहले सरकार की अनुमति लेने की बंदिश लगा दी गई। और सभी समाचार पत्रो मे सेंसर अधिकारी नियुक्त कर दिये गये.


इंदिरा गांधी की सरकार कहती थी जेल से बाहर जाना है तो बीस सूत्रीय कार्यक्रम का समर्थन करो और जमानत कराओ। विरोधियों ने जेल के सीखचों को कबूल किया पर उन्होने बीस सूत्रीय कार्यक्रम का समर्थन नहीं किया और माफी नही मागी। संभावित प्रतिकार को देखते हुए इंदिरा गांधी ने आरएसएस पर भी प्रतिबंध लगा दिया। देशभर में संघ के सैकडो़ं प्रचारकों को जेल भेजा गया। एक लाख से भी अधिक स्वयंसेवकों को कारावास हुआ। जुल्म ज्यादतियों का दौर ऐसा था कि जेल भेजे जाने वालों की सूची रात को बनायी जाती थी और सुबह पुलिस उन्हे पकड़कर जेलो मे ठूंस देती थी।


प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के निजी सचिव रह चुके आरके धवन ने देश में आपातकाल के लिए स्वर्गीय सिद्धार्थ शंकर राय को दोषी ठहराया था। आरके धवन ने एक साक्षात्कार में कहा था 'आपातकाल का पूरा ताना-बाना पश्चिम बंगाल के तत्कालीन मुख्यमंत्री सिद्धार्थ शंकर राय ने बुना था। उन्होंने 8 जनवरी 1975 को पत्र लिखकर आपातकाल की तरह कठोर कार्रवाई करने की सलाह दी थी। इलाहाबाद उच्च न्यायालय के निर्णय के बाद सिद्धार्थ शंकर राय ने दोबारा पत्र लिखकर आपातकाल के लिए उन्हें प्रेरित किया था।
आपातकाल के दौर में भारतीय लोकतंत्र का किस तरह से दमन हुआ इस पर कई पुस्तकें लिखी गई हैं। वरिष्ठ पत्रकार दीनानाथ मिश्र ने आपातकाल के दौरान भीषण संकट और दमन झेला। उन्होंने आपातकाल पर 'गुप्तक्रान्ति नामक पुस्तक लिखी जो 1977 में प्रकाशित हुई। यह पुस्तक आपातकाल पर एक संपूर्ण तथ्य है। दीनानाथ मिश्र ने अपने पुस्तक में यह दर्शाया है कि ‘उस समय सत्ता के लिए जनता सिर्फ चुनाव जीतने का माध्यम थी उससे आगे कुछ नहीं।‘ उन्होंने लिखा कि सेंसरशिप तथा अपनों को जेल में यातनाएं सहते देखकर आक्रोशित हुई जनता ने अधिनायकवाद का आरोप झेल रही इंदिरा गाँधी का तख्ता पलट दिया। जनता विजयी हुई और देश को पुनः लोकतंत्र मिल गया।‘ हमारा यह लोकतंत्र फिर से किसी अधिनायकवादी और निरंकुश सोंच की कठपुतली न बने, यह हर भारतीय का कर्तव्य है।

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