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Dhanteras 2021 : हिन्दू कैलेंडर की काल-गणना है भारतीय कृषि चक्र और आरोग्य का आधार

Dhanteras 2021 : आकाश की घटनाओं की आवृत्ति काल-गणना का आधार बनती हैं। इन्हीं से ऋतुओं का निर्धारण होता है जिनका सीधा संबंध हमारे आहार-विहार से है।
- भारत का कृषि चक्र हो या भारतीयों का स्वास्थ्य, दोनों का सीधा जुड़ाव इस कैलेंडर से है। यही जुड़ाव हमें पांच दिन के दीपोत्सव के प्रथम दिवस धनतेरस पर हिंदू कैलेंडर का महत्त्व समझने में भी मदद करता है।

नई दिल्ली

Published: November 02, 2021 08:29:52 am

रमेश चंद्र कपूर, (खगोलविद, खगोल विज्ञान के इतिहास पर शोधरत)

Dhanteras 2021 : जिस तरह आयु्र्वेद मात्र एक चिकित्सा पद्धति नहीं, बल्कि जीवनशैली है, उसी तरह खगोल शास्त्र भी हमारे जीवन का आधार है। यह हमें आकाश की जीवनदायी शक्तियों से जोड़ता है। सूर्य पथ के मूलभूत बिंदुओं का जश्न मनाने में और कृषि चक्र में मौसम के बदलाव को ध्यान में रखने में खगोल ही हमारी जीवन प्रणाली तय करता है। आकाश की घटनाओं की आवृत्ति काल-गणना का आधार बनती हैं। इन्हीं से ऋतुओं का निर्धारण होता है जिनका सीधा संबंध हमारे आहार-विहार से है।

Dhanteras 2021 : हिन्दू कैलेंडर की काल-गणना है भारतीय कृषि चक्र और आरोग्य का आधार
Dhanteras 2021 : हिन्दू कैलेंडर की काल-गणना है भारतीय कृषि चक्र और आरोग्य का आधार

अधिकांश समुदायों में काल-गणना सूर्य और चन्द्रमा के चलन के अनुसार होती है। भारतीय पंचांग दो प्रकार का है - सौर और चांद्र, जिनके आरम्भ अलग-अलग दिनों में होते हैं। सौर कैलेंडर नाक्षत्रिक वर्ष पर आधारित है। यह वह अवधि है जिसमें सूर्य आकाश में किसी नियत सितारे के पास फिर पहुंचता है। हिन्दू धार्मिक कैलेंडर चांद्र-सौर है। यहां मौसम सूर्य के चलन के अनुसार हैं, तो तिथियां और त्योहार चन्द्रमा के चलन के अनुसार, जो सौर कैलेंडर के साथ जुड़ा रहता है। स्पष्ट है कि भारत का कृषि चक्र हो या भारतीयों का स्वास्थ्य, दोनों का सीधा जुड़ाव इस कैलेंडर से है। यही जुड़ाव हमें पांच दिन के दीपोत्सव के प्रथम दिवस धनतेरस पर हिंदू कैलेंडर का महत्त्व समझने में भी मदद करता है।

जैसे-जैसे साल बीतता है, क्षितिज पर सूर्योदय का स्थान उत्तर-पूर्व से खिसकते हुए दक्षिण-पूर्व में जा पहुंचता है, और दिसंबर पूरा होते तक फिर वापिस उत्तर की ओर। इस दौरान ठीक पूर्व दिशा में सूर्योदय वर्ष में दो बार होता है, 21 मार्च और 22 सितंबर को। यह विषुव का समय है और तब दिन और रात बराबर अवधि के होते हैं। पूर्व दिशा से उत्तर की ओर के दूरतम बिंदु पर सूर्योदय 21 जून के दिन होता है। यह ग्रीष्म अयनांत का दिन है। पूर्व दिशा से दक्षिण की ओर के दूरतम बिंदु पर सूर्योदय 22 दिसंबर के दिन होता है। यह शीत अयनांत का दिन है जिसके बाद सूर्य उत्तरायण हो जाते हैं। संसार भर में लोग सूर्य के इन मूलभूत बिंदुओं से गुजरने के दिनों को जश्न के रूप में मनाते हैं।

वैदिक काल में, वर्ष का आरम्भ इन्हीं में किसी मूलभूत बिंदु से होता था। वेदांग ज्योतिष हमारी सबसे प्राचीन खगोल रचना है। इसके रचयिता हैं लगध तथा काल है 1180 ईसा पूर्व। यह वास्तव में हमारी पहली जंत्री है जिसके अनुसार पांच वर्ष के युग का आरम्भ माघ मास की शुक्ल प्रतिपदा से होता है जब सूर्य और चंद्रमा दोनों श्राविष्ठा (धनिष्ठा) नक्षत्र में होते हैं और यह समय शीत अयनांत का होता है। वेदांग ज्योतिष की यह पद्धति सातवाहनों के काल (200 ई.) तक कायम रही। विष्णु पुराण (275-325 ई.) में बताया गया है कि विषुव के दिन सूर्य तुला या मेष राशि में प्रवेश करते हैं और तब रात-दिन की अवधि एक-समान होती है। उत्तरायण के समय सूर्य मकर राशि में और राशि चक्रमें आगे बढ़ते हुए दक्षिणायन हो कर कर्क राशि में प्रवेश करते हैं। ध्यान योग्य बात यह है कि राशियां, जिन में ग्रहों की स्थिति और चलन ज्योतिष गणना को मूल आधार देते हैं, वास्तव में विदेशी मूल की हैं। 5वीं शताब्दी तक राशियों का भारतीय खगोल ग्रंथों में समावेश हो चुका था। फलित ज्योतिष में इनका महत्त्व 6वीं शताब्दी के मध्य में वराहमिहिर के ग्रंथ बृहद जातक के जरिये स्थापित हो गया।

भारत में मौसमी त्योहार आकाश में सूर्य की स्थिति से संबंधित हैं। वैदिक काल से ही सूर्य की अर्चना हमारे देश में होती रही है। आज यह संक्रांति के रूप में होती है जब सूर्य अगली राशि में प्रवेश करते हैं। संक्रांति का समय पुण्य-काल माना जाता है। सौर वर्ष मेष संक्रांति से आरम्भ होता है - जब सूर्य मेष राशि में प्रवेश करते हैं। यह 14-15 अप्रेल के दिन होती है जिसे पंजाब, ओडिशा, असम, तमिलनाडु, प. बंगाल और केरल में वर्षारम्भ के रूप में मनाते हैं। मकर संक्रांति शीत अयनांत या उत्तरायण का स्मरणोत्सव है। तभी धान की फसल समेटने का भी समय हो रहा होता है। दक्षिण भारत में यह समय पोंगल महोत्सव का है। प्रयाग का माघ मेला तथा लोहड़ी का त्योहार मूलत: उत्तरायण के उत्सव हैं जिन्हें धूमधाम से मनाया जाता है।

कृषि प्रधान देश होने के नाते सौर कैलेंडर हमारे कृषि कार्यों में महत्त्वपूर्ण स्थान रखता है। पोंगल, बैसाखी, ओणम की तरह दिवाली भी फसल के समय के आनंदोत्सव हैं। इसी तरह एक सौर वर्ष के 12 चंद्रमास छह ऋतुओं में बांटे गए हैं, जो भारतीय जीवनशैली और भारतीय जनसामान्य के आरोग्य का आधार हैं।

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