व्यर्थ है बोली और भाषा में अंतर की बहस

भाषा विज्ञानियों का जोर है कि स्कूल, बहुभाषिकता की बुनियाद पर शिक्षा का ताना-बाना बुनें। आइए, हम स्थानीय बोलियों/भाषाओं के प्रति उदार रुख अपनाएं, उन्हें व्यवहार में लाएं।

By: सुनील शर्मा

Published: 19 Feb 2021, 08:15 AM IST

- कालू राम शर्मा, खरगोन (निमाड़, मप्र) में स्कूली शिक्षा क्षेत्र में सक्रिय

मध्यप्रदेश में भाषायी विविधता कहीं अधिक समृद्ध है। यहां उर्दू, मालवी, निमाड़ी, बुंदेली, बघेली, अवधी, काटलो, भीली, निहाली, बारेली, कोरकू आदि बोली जाती हैं। आधुनिकता के इस दौर में इन पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ा है।

भाषा विज्ञानियों का जोर है कि स्कूल, बहुभाषिकता की बुनियाद पर शिक्षा का ताना-बाना बुनें। आइए, हम स्थानीय बोलियों/भाषाओं के प्रति उदार रुख अपनाएं, उन्हें व्यवहार में लाएं।

भाषा हमेशा ही हमारी अस्मिता का मसला रही हैं। कौन भाषा और कौन बोली! क्यों मातृभाषा को लेकर हमारे यहां काफी भ्रम की स्थिति है। मध्यप्रदेश की बात करूं तो अक्सर हिंदी को ही मातृभाषा मान लिया जाता है। ऐसा अन्य प्रदेशों के साथ भी है। मध्यप्रदेश की कामकाज की भाषा हिंदी है, पर अलग-अलग इलाकों में अलग-अलग भाषाएं बोली जाती हैं।

आमतौर मातृभाषा को बोली का दर्जा दिया जाता है। बोलियों के प्रति हमारा रुख सकारात्मक नहीं होता। बोलियां दरअसल भाषाएं ही हैं जिनका अपना व्याकरण होता है। बोली व भाषा में फर्क करने का संदर्भ सामाजिक-राजनीतिक अधिक है। भाषा विज्ञानियों का मानना है कि जो बोलियां हैं वे कभी मानक व वैध समझी जाने वाली भाषाएं बन सकती हैं। दरअसल जो आज भाषा है वह कल बोली बन सकती है और आज जो बोली है वह कभी भाषा रही हो ऐसा संभव है। जैसे ब्रज और अवधी उत्तर प्रदेश के कन्नौज राज्य में कभी कामकाज की भाषाएं थीं लेकिन खड़ी बोली के उदय और दिल्ली में प्रभाव होने के बाद कालांतर में ये बोलियां बन गईं। अक्सर इस विषय पर चर्चा में यही बात उभरती है कि भाषा का व्याकरण होता है जबकि बोली की नहीं। यह सच है कि भाषा का क्षेत्र बोली की तुलना में व्यापक होता है लेकिन यह मान लेना कि वह मानक नहीं है, गलत है। अधिकतर बोलियां मौखिक (वाचिक ) परंपरा में ही रही हैं। क्यों भाषा की तासीर मौखिक ही होती है। लिपि तो उसे संरक्षित करने का काम करती है। बोलियां चूंकि वाचिक परंपरा से उबर नहीं सकीं, इसलिए भी गलतफहमी पैदा होती है।

जब हम मातृभाषा की बात करते हैं तो अधिकतर यह मानते हैं कि प्रदेश की भाषा का उल्लेख किया जा रहा है। दरअसल, मध्यप्रदेश की बड़ी आबादी में हिंदी नहीं बोली जाती। मध्यप्रदेश में ही मालवा में मालवी, निमाड़ में निमाड़ी, बुंदेलखंड में बुंदेली और बघेलखंड में बघेली बोली जाती है। निमाड़ और मालवा में तो एक -सी निमाड़ी व मालवी भी नहीं बोली जाती। मध्यप्रदेश में भाषायी विविधता कहीं अधिक समृद्ध है। यहां उर्दू, मालवी, निमाड़ी, बुंदेली, बघेली, अवधी, गोंडी, काटलो, भीली, निहाली, बारेली और कोरकू बोली जाती हैं। आधुनिकता के इस पहर में इन भाषाओं पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ा है। हालांकि मध्यप्रदेश में भीली, कोरकू, बारेली आदि भाषाओं के शब्दकोश भी तैयार किए गए हैं।

आदिवासी समुदायों के लोक गीतों-लोक कथाओं, उनके रीति-रिवाजों का दस्तावेजीकरण किया जा रहा है। इन भाषाओं में साहित्य नहीं रचा गया, ऐसा नहीं है। स्थानीय साहित्यकारों ने निमाड़ी में साहित्य रचना की है। लिहाजा, नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति में मातृभाषा में बच्चों की शिक्षा पर जोर दिया गया है। चूंकि स्कूल में सभी की मातृभाषा भी एक नहीं हो सकती, इसलिए भाषा विज्ञानियों का जोर है कि स्कूल, बहुभाषिकता की बुनियाद पर शिक्षा का ताना-बाना बुने। आइए, हम स्थानीय बोलियों/भाषाओं के प्रति उदार रुख अपनाएं, उन्हें व्यवहार में लाएं।

सुनील शर्मा
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