आपकी बात, क्या जातीय और धार्मिक मुद्दों का चुनावों पर असर पड़ता है?

पत्रिकायन में सवाल पूछा गया था। पाठकों की मिलीजुली प्रतिक्रिया आईं, पेश हैं चुनिंदा प्रतिक्रियाएं।

By: Gyan Chand Patni

Published: 08 Apr 2021, 06:45 PM IST

जातीय और धार्मिक मुद्दों का असर
जातिवाद और धार्मिक मुद्दों का असर चुनावों पर पड़ता ही है। इसके कारण राजनीतिक दल भी जाति और धार्मिक मतदाताओं की संख्या के आधार पर ही टिकट वितरित करते हैं, ताकि इन मुद्दों को भुना सकें। मतदाताओं में जागरूकता की जरूरत है, ताकि हम जाति और धर्म को लोकतांत्रिक प्रक्रिया से दूर कर एक स्वच्छ लोकतांत्रिक गणराज्य की स्थापना कर सकें, जैसा संविधान की प्रस्तावना में वर्णित है।
-चतुर्भुज अहीर, रामगंजमंडी
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वर्तमान चुनाव में जातीय व धार्मिक मुद्दों का असर विकास से जुड़े मुद्दों से ज्यादा रहता है। सभी दल जाति व धर्म के आधार पर टिकट को प्राथमिकता देते हैं। मजबूर होकर मतदाता भी धर्म व जाति को देखते हुए वोट देते है। ऐसे नेता हैं, जो वर्षों से धर्म या जाति के वोट बैंक से जीतकर सदनों में पहुंच रहे हैं।
-वीरभान गुर्जर, अजमेर
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जाति और धर्म के आधार पर देते हैं वोट
जातीय और धार्मिक मुद्दों का चुनावों पर असर बहुत पहले से पड़ता आ रहा है। आजकल ये असर बहुत ज्यादा हो गया है। अधिकतर लोग अपनी जाति के उम्मीदवार और अपने धर्म से जुड़े लोगों को ही अपना वोट देते हैं। उन्हें इस बात से फर्क नहीं पड़ता है कि उम्मीदवार उनकी समस्याओं का समाधान करेगा या नहीं। बस जाति और धर्म देखकर वोट दे देते हैं।
-देवेन्द्र, जयपुर
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विकास के मुद्दों को प्राथमिकता
वर्तमान में जाति और धार्मिक मुद्दों का असर अधिक नहीं पड़ता है, क्योंकि आज लोग विकास के मुद्दों, देश हित या समाज हित को लेकर ही वोट डालते हैं। आज की शिक्षित युवा पीढ़ी अपने आपको धर्म व जाति से अलग रखते हुए विकास और समृद्धि के लिए वोट करती है। राजनीतिक पार्टियों को भी धर्म व जाति का सहारा ना लेकर देशहित में सर्व कल्याण से संबंधित मुद्दों पर ही चुनाव लडऩा चाहिए ।
-श्याम खाम्बरा, मुबारिकपुर, अलवर
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जाति-धर्म के आधार पर ही मिलता है टिकट
जातीय और धार्मिक मुद्दों का असर चुनावों पर लगातार बढ़ता जा रहा है। राजनीतिक पार्टियां हों या चुनावी मैदान के प्रत्याशी चुनाव जीतने के लिए बनाए जाने वाले संभावित समीकरण में यही देखते हैं कि किस जाति और किस धर्म के मतदाताओं की संख्या अधिक है। साथ ही मतदाता भी यही गौर करता है,कि उनकी जाति या धर्म के प्रत्याशी कौन हैं? यह स्थिति लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए घातक है।
-पी.डी.खैरवार, मंडला, मध्यप्रदेश।
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चिंताजनक स्थिति
निश्चित ही धर्म और जाति का प्रभाव चुनावों पर पड़ता है। यही वजह है कि योग्य व्यक्ति सदन तक नहीं पहुंच पाता। इससे सदन में जनहित के मुद्दे नहीं उठ पाते। यह स्थिति चिंताजनक है।
-पंकज साह, महासमुंद, छत्तीसगढ़
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राष्ट्रीय एकता को नुकसान
आज भी भारतीय जनता में धर्म व जाति के प्रति लगाव है। नेता इसका गलत फायदा उठा रहे हैं। संवेदनशील जनता को धर्म और जाति के नाम पर गुमराह कर उन्हें बोट बैंक के रूप में काम में लिया जाता है। धर्म और जाति के नाम पर राजनीति करने वाले नेता राष्ट्रीय एकता और संस्कृति को नुकसान पहुंचा रहे हैं।
-हुकमाराम सेंवर, औगाला, बाड़मेर
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चुनाव प्रक्रिया से परिणाम तक असर
चुनाव प्रक्रिया से लेकर परिणाम तक जातीय और सांप्रदायिक मुद्दों का असर पड़ता है। पार्टियां भी जाति विशेष बाहुल्य क्षेत्र से उसी जाति के उम्मीदवार को टिकट देती हैं। जातीय-धार्मिक मुद्दों की वजह से राष्ट्रीय मुद्दे गौण हो जाते हैं। इससे समाज में वैमनस्य पैदा होती है। ऐसे माहौल में चुनाव परिणामों का वस्तुनिष्ठता का गुण समाप्त हो जाता है।
- तनवीरसिंह परिहार, बाड़मेर
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नेता उठा रहे हैं फायदा
जातीय और धार्मिक मुद्दों का चुनावों पर बहुत ज्यादा असर पड़ रहा है। जातिवाद एवं धर्म के प्रति बढ़ती कट्टरता का फायदा राजनेता उठा रहे हैं। यह स्थिति ठीक नहीं है। हमारा एक ही धर्म एवं एक ही जाति होनी चाहिए। यानी मानव धर्म एवं मानव जाति।
- सत्य भान सिंह राजपूत, दौसा
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सही जनप्रतिनिधि चुनने में बाधा
भारत में अधिकतर राजनीतिक दल धार्मिक और जातीय तुष्टीकरण के आधार पर चुनाव लड़ते हैं और विभिन्न जातियों और धर्मों के लोगों को विभाजनकारी राजनीति का शिकार बनाते हैं। इससे जनता सही प्रतिनिधि का चयन नहीं कर पाती है।
-प्रेम सिंह सोलंकी , रामगढ़, जैसलमेर
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जातीय और धार्मिक ध्रुवीकरण ने देश के अंदर देशों का निर्माण कर दिया है। हर चुनाव में जाति और धर्म सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण हो गए। इस जातिगत और धार्मिक ध्रुवीकरण ने भारत के सांस्कृतिक सौहार्द को नुकसान पहुंचाया है। यह देखकर भारत के संविधान निर्माताओं और सामाजिक सुधारकों की आत्मा विचलित होती होती होगी।
-सतीश कुमार गौतम, अंता, बारां

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