मत तोड़ो संघीय ढांचा

देश का संघीय ढांचा केंद्र के साथ ही राज्यों को भी स्वायत्तता प्रदान करता है। संविधान में दोनों की भूमिका निर्धारित है।

By: dilip chaturvedi

Published: 05 Feb 2019, 08:31 PM IST

पश्चिम बंगाल में जिस तरह सीबीआइ और प्रदेश सरकार के बीच टकराव की स्थिति बनी है, उसने हमारे संघीय ढंाचे को संकट में ला दिया है। सारदा चिटफंड मामले में सीबीआइ का पूछताछ के लिए कोलकाता पुलिस आयुक्त राजीव कुमार के घर पर पहुंचना और उसके बाद पुलिस का सीबीआइ अफसरों को हिरासत में लेना और फिर सीबीआइ अफसरों की सुरक्षा में स्थानीय पुलिस को छोड़कर सीआरपीएफ की तैनाती करना भविष्य के लिए बेहतर संकेत नहीं हैं। राजनीति में मतभेद और मनभेद अपनी जगह हो सकते हैं, लेकिन केंद्र और राज्य का इस तरह से आमने-सामने आ जाना कहीं न कहीं संवैधानिक संकट जैसी स्थिति है। देश का संघीय ढांचा केंद्र के साथ ही राज्यों को स्वायत्तता प्रदान करता है। संविधान में दोनों की भूमिका निर्धारित है। केंद्र राज्यों के भीतर एक सीमा तक ही दखल दे सकता है। राज्यों के लिए भी जरूरी है कि वे भी केंद्र के साथ रिश्तों में सद्भावनापूर्ण रवैया अपनाएं।

सीबीआइ केंद्र के अधीन कार्य करती है, उसे राज्यों में कार्रवाई करने का अधिकार है। लोकसभा में गृह मंत्री राजनाथ सिंह ने भी केंद्र सरकार की शक्तियों का हवाला देते हुए कहा कि देश के किसी भी हिस्से में स्थितियां सामान्य बनाए रखने के लिए जरूरी कदम उठाने का संविधान के तहत केंद्र को अधिकार है। लेकिन पश्चिम बंगाल में जो घटनाक्रम हुआ, उससे पहला सवाल यही उठता है कि क्या सीबीआइ को पुलिस के इतने बड़े अधिकारी पर कार्रवाई करने से पहले राज्य सरकार को भरोसे में लेने की जरूरत नहीं थी? सवाल इसलिए भी खड़ा होता है, क्योंकि पश्चिम बंगाल सरकार ने सीबीआइ के सीधे दखल पर रोक लगाई हुई है। ऐसे में केंद्र सरकार और सीबीआइ की जिम्मेदारी बनती है कि वह राज्य के अधिकारों का सम्मान करे। सवाल राज्यों के इस रवैये पर भी उठता है कि आखिर ऐसी क्या वजह हुई कि कुछ गैर-भाजपा शासित राज्यों ने सीबीआइ के सीधे दखल पर रोक लगा दी।

कठघरे में सीबीआइ की कार्यशैली भी है। उसकी सक्रियता विपक्षी राज्यों में ही क्यों ज्यादा दिखाई देती है? क्या इसके राजनीतिक मायने नहीं तलाशे जाएंगे? वैसे भी सीबीआइ पर राजनीतिक तौर पर काम करने के आरोप लगते रहे हैं। विपक्षी नेता केंद्र सरकार पर सीबीआइ के दुरुपयोग का आरोप लगाते रहे हैं। खुद भाजपा भी विपक्ष में रहकर ऐसे आरोपों को दोहराती रही है। आज जब वह सत्ता में है, तब यह आरोप उसके ऊपर लग रहे हैं। बेहतर हो कि सीबीआइ अपनी गिरती प्रतिष्ठा को ध्यान में रखे और ईमानदारी और निष्पक्षता के साथ काम करे। राज्यों की भी जिम्मेदारी है कि वह संघीय व्यवस्था को सीधे चुनौती देने से बचें। अगर आपको केंद्र की किसी कार्रवाई पर एतराज है तो आप उचित फोरम पर अपनी बात रख सकते हैं। वजह साफ है, दोनों के ऊपर देश के संघीय ढांचे को बचाए रखने का बराबर जिम्मा है। दोनों को एक-दूसरे के अधिकारों का सम्मान करना होगा। यही देश का संविधान भी कहता है। ऐसे में केंद्र या राज्य सरकारें संविधान के विपरीत जाकर काम नहीं कर सकती हैं। केंद्र और राज्यों के बीच रिश्ते जितने मधुर होंगे, हमारा लोकतंत्र उतना ही ज्यादा मजबूत बनकर उभरेगा।

dilip chaturvedi Desk
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