क्या नेता चुनाव जीतने के लिए धार्मिक और जातीय विवाद पैदा करते हैं?

पत्रिकायन में सवाल पूछा गया था। पाठकों की मिलीजुली प्रतिक्रियाएं आईं, पेश हैं चुनिंदा प्रतिक्रियाएं।

By: Gyan Chand Patni

Published: 18 Jul 2021, 07:11 PM IST

जाति और धर्म भारतीय राजनीति की सच्चाई
भारत में जाति और धर्म पर आधारित राजनीति खत्म होना अब संभव नहीं है। नब्बे के दशक से भारतीय राजनीति में परिवर्तन केवल धर्म और जाति के आधार पर ही देखने को मिला है। कई राजनीतिक दलों व नेताओं का वर्चस्व केवल धर्म और जाति के मुद्दों के आधार पर ही बना है। यदि वे राजनीतिक दल व नेता इन दोनों मुद्दों को छोड़ दें, तो उनका अस्तित्व ही समाप्त हो जाएगा। आज भारतीय राजनीति में चुनावों के लिए टिकटों का वितरण भी उस क्षेत्र में जाति व धर्म का पलड़ा देखकर होता है। यहां लोकतांत्रिक संस्थाओं में प्रतिनिधित्व के लिए सीटें जातियों के आरक्षण के आधार पर निर्धारित हो गई हैं, तो अब कैसे सुधार आएगा?
-राहुल मुदगल, फतेहाबाद, आगरा
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राष्ट्रीय एकता को नुकसान
यह सौ फीसदी सच है कि भारत में आज भी चुनावों में मजहब और जाति के नाम पर ही वोट मांगे जाते हैं। सभी दल जाति व धर्म के आधार पर टिकट को प्राथमिकता देते हैं और इसी के परिणामस्वरूप हमें धार्मिक और जातीय विवाद देखने को मिलते हंै। ऐसे नेताओं की भरमार है, जो वर्षों से धर्म या जाति के वोट बैंक से जीतकर सदनों में पहुंचे हैं। जातीय और धार्मिक मुद्दों का चुनावों पर असर बहुत पहले से चला आ रहा है। आजकल ये असर कुछ ज्यादा हो गया है। एक बड़ा तबका अपनी जाति के उम्मीदवार और अपने धर्म से जुड़े लोगों को ही वोट देता है। उसे इस बात से फर्क ही नहीं पड़ता है कि उम्मीदवार उनकी समस्याओं का समाधान करेगा भी या नहीं। बस जाति और धर्म देखकर वोट दे देना मानो एक चलन-सा हो गया है। हमें समझना होगा कि धर्म और जाति के नाम पर राजनीति करने वाले नेता राष्ट्रीय एकता को नुकसान पहुंचा रहे हैं ।
-प्रिया राजावत, जयपुर
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बिगड़ता है माहौल
देश में चुनाव के समय वोटों के लिए धर्म और जाति की राजनीति देखी जा सकती है। चुनावी रैलियों में नेता कई प्रकार के प्रलोभन देते हैं। नेताओं के बयानों से धार्मिक और जातीय विवाद फैलते हंै। यह देश के लिए घातक है। इस तरह के विवादों से समाज में विद्वेष फैलता है, जिससे देश की एकता और शांति भंग होती है।
-नीलिमा जैन, उदयपुर
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देश को कमजोर किया
नेता चाहे गांव का हो या शहर का चुनाव जीतने के लिए जाति और धर्म का सहारा लेता है। जो चुनाव के लिए जातिवाद और सांप्रदायिकता का सहारा लेते हैं, वे देश को कमजोर करते हैं।
-संजय कुमार झाझरिया, बेरी भजनगढ़, सीकर
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अयोग्यता की निशानी
सभी राजनीतिक दलों के नेता चुनाव जीतने के लिए धर्म और जाति का सहारा लेते हैं, जो कि उनकी अयोग्यता और कर्तव्यहीनता को दर्शाता है। यदि कोई नेता अपने क्षेत्र में जनता के लिए अच्छा कार्य कर रहा है, तो उसे धर्म और जाति का सहारा नहीं लेना पड़ता है। वह किसी भी पार्टी के टिकट पर जीत सकता है।
-श्रीकृष्ण पचौरी, ग्वालियर, मध्यप्रदेश
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घातक है धर्म और जाति की राजनीति
राजनीतिक लाभ प्राप्त करने के उद्देश्य से नेता धर्म तथा जाति से संबंधित विवादों को उभारते हैं तथा जनता में वैमनस्य में वृद्धि करते हैं चाहे वह मंदिर मस्जिद का मुद्दा हो या फिर आरक्षण का। नेता पहले तो धर्म एवं जाति के नाम पर लोगों को भड़काते हैं एवं बाद में हिंसा पर दुख प्रकट करते हैं। कुछ राजनीतिक दल तो पूरी तरह धर्म या फिर जाति के आधार पर ही निर्मित हुए हैं। निश्चित ही स्वस्थ एवं मजबूत लोकतंत्र के मार्ग में धर्म एवं जाति की राजनीति बहुत बड़ी बाधा है ।
-रवि शर्मा, गंगापुर सिटी
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नेताओं की कुटिल चाल
चुनाव जीतने के लिए धार्मिक व जातीय विवाद पैदा करने की कुटिल चाल भी चली जाती है। चुनाव जीतने के लिए पहले धार्मिक उन्माद पैदा करना। इसके बाद मसीहा बनकर जनता के सामने में आना और यह दिखाना कि हम शांति दूत हैं। इस तरह के हथकंडे बंद होने चाहिए।
-सतीश उपाध्याय, मनेंद्रगढ़ कोरिया, छत्तीसगढ़
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विवाद पैदा न करें नेता
नेताओं को यह समझना चाहिए कि इस समय सबसे जरूरी है, लोगों की जान बचाना। यदि वोटों के लिए इस देश के नागरिक ही मौत के मुंह में धकेल दिए जाएंगे तो इस प्रकार से चुनाव जीत कर आने का मतलब क्या रह जाएगा? नेताओं को थोड़ा और अधिक संवेदनशील और जिम्मेदार होने की जरूरत है। मैं यह भी समझता हूं कि देश में लोकतांत्रिक व्यक्तियों की बात प्रभावी तौर पर सुनी जाती है, उनका प्रभाव आम जनता के मन- मस्तिष्क पर ज्यादा पड़ता है। इसलिए उन्हें विवाद पैदा करने की बजाय विवाद खत्म करने का प्रयास करना चाहिए।
-अंकित शर्मा, जयपुर
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हर काम करने के लिए तैयार
पार्टियां तथा नेता धर्म व जाति पर ही विवाद पैदा नहीं करते हंै, बल्कि वोट पाने के लिए वे कोई भी संविधान विरोधी काम करने के लिए तैयार रहते हैं। हर चुनाव में पैसा व शराब का जमकर उपयोग किया जाता है। सरकार, चुनाव आयोग, पुलिस और मीडिया सबको यह बात पता है।
अशौक जैन, भीन्डर, उदयपुर
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चुनाव जीतना ही लक्ष्य
लगभग सभी नेताओं का एकमात्र उद्देश्य चुनाव जीतना और सत्ता पर काबिज होना होता है। मतदाताओं का ध्रुवीकरण करने के लिए जाति व धर्म का सहारा लेना सामान्य बात हो गई है। जिन नेताओं का ठोस जनाधार व मजबूत राजनीतिक पृष्ठभूमि नहीं होती है, वे नेता ही धर्म व जाति को आगे रखते हैं। जब तक लोगों में धार्मिक व जातीय वैमनस्य रहेगा, नेता इसका फायदा अवश्य उठाते रहेंगे।
डॉ. माधव सिंह, श्रीमाधोपुर, सीकर
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जहरीले बयानों से नुकसान
नेता लोगों का मार्ग दर्शन करता है, लेकिन वर्तमान में ऐसे नेताओं की प्रजाति विलुप्ति की कगार पर पहुंच चुकी है। नेता अब घोटाले करते हैं और आम जनता के लिए परेशानी पैदा करते हैं। नेताओं के जहरीले बयानों से देश की एकता कमजोर हो रही है।
-राजेश कुमार मीना, जयपुर
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विकास से हट जाता है ध्यान
चुनाव जीतने के लिए धार्मिक और जातीय मुद्दे उठाना आम बात है। धार्मिक और जातीय मुद्दों पर वोटबैंक की राजनीति पहले से चली आ रही है। धर्म या जाति विशेष पर टिप्पणी कर नेता जनता का ध्यान विकास के मुद्दे से हटा देते हैं।
-कपिल एम.वडियार, जोधपुर
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नेताओं का प्रपंच
हमारे देश में नेतागण चुनाव जीतने के लिए धार्मिक और जातीय उन्माद पैदा करते हैं। यह बात अक्षरश: सही है। नेता चुनाव के समय धार्मिक भावनाओं को आहत करने का प्रपंच करते हैं, ताकि धर्म और जाति के आधार पर लोगों को एकजुट करते हुए चुनाव में जीत हासिल की जा सके।
-डॉ. अशोक, पटना, बिहार

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