scriptDoordarshan's colorful broadcast had filled colors in life | दूरदर्शन के रंगीन प्रसारण ने जीवन में भर दिए थे रंग | Patrika News

दूरदर्शन के रंगीन प्रसारण ने जीवन में भर दिए थे रंग

आज जब कई घरों में परिवार के हर सदस्य के पास अपना एक निजी रंगीन स्क्रीन है, कल्पना भी नहीं की जा सकती कि रंगीन टेलीविजन वाले घरों के दरवाजे खास कार्यक्रमों के समय मोहल्ले भर के लिए खुले रहते थे। जिसका चरम 1987 में 'रामायण' के दौर में फिर 1988 में 'महाभारत' के दौर में दिखा। उस समय वाकई सड़कें सूनी हो जाया करती थीं। लोग टेलीविजन के आगे अगरबत्ती जलाने लगे थे।

Published: May 01, 2022 05:41:03 pm

विनोद अनुपम
राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार प्राप्त कला समीक्षक

लगभग चालीस साल पहले यानी 1982 का 25 अप्रेल था, जब दूरदर्शन ने देश में प्रायोगिक रूप से कलर प्रसारण की शुरुआत की। और देखते-देखते लकड़ी के बक्से में शटर वाले दरवाजे के पीछे छिपे टेलीविजन ने देश में भी रंगों के साथ खुली हवा में सांस लेने की शुरुआत कर दी। वास्तव में यह आजादी सिर्फ बक्से से आजादी नहीं थी, तमाम पुरानी मान्यताओं से भी आजादी थी।
वास्तव में मानव के स्वभाव में ही शायद यह है कि किसी भी नई तकनीक, नए अविष्कार को वह सहजता से स्वीकार नहीं कर पाता। अरस्तू और गैलीलियो की बात तो बड़ी है, देश में 1938 में किसान कन्या के साथ जब सिनेमा को रंग मिले तो कई नामचीन फिल्मकारों को अपनी क्रिएटिविटी में यह हस्तक्षेप लगा। आश्चर्य नहीं कि रंग मिलने के बहुत बाद तक ब्लैक एंड वाइट फिल्में बनती रही थीं। 'तीसरी कसम' जैसी फिल्म तो 1966 में बनी, यानी बड़े परदे पर रंग आने के 30 साल बाद तक फिल्मकार रंग के उपयोग में सहज नहीं हो पा रहे थे। दूरदर्शन को भी जब रंग मिले, तो विरोध स्वाभाविक ही था। विरोध सिर्फ गरीब मुल्क की विलासिता पर ही नहीं था। अपनी उस उम्र में लौटते हैं तो यह भी याद कर पाते हैं कि कई महीनों तक, वर्ष भी कह सकते हैं, घर में कलर टेलीविजन इसलिए भी नहीं खरीदे जाते थे कि इससे आंखें खराब हो जाती हैं और इससे जो विकिरण फैलता है वह स्वास्थ्य के लिए बहुत हानिकारक है, वगैरह, वगैरह। आज जब बात कलर की नहीं, कलर के परफेक्शन की होती है, एचडी और मेगापिक्सल से उसकी नाप होती है, तो बरबस उन दिनों को याद कर मुस्कुराहट आ जाती है, जब साफ तस्वीर भर देखने के लिए घंटों छत पर लगे एल्यूमुनियम की डंडियों वाले एंटीना को इधर-उधर करना पड़ता था, रंगों का क्या वे तो आते जाते रहते थे। वर्तमान में सप्ताह में सातों दिन सैकड़ों चैनलों पर हजारों धारावाहिकों के बीच उबडुब होते दर्शकों को शायद ही विश्वास हो कि देश में सबसे पहले सोप ओपेरा के रूप में 'हम लोगÓ की शुरुआत की गई थी, जो सप्ताह में मात्र दो दिन आता था। बावजूद इसके 60 की उम्र में प्रवेश कर रहे लोगों के नास्टेलजिया में कहीं न कहीं आज भी 'हमलोगÓ के पात्र अपनी जगह बनाए हुए हैं। डेढ़ साल चलने वाले इस धारावाहिक ने टेलीविजन पर दर्शकों को कहानियां देखना ही नहीं, बैठना भी सिखाया।
आज जब कई घरों में परिवार के हर सदस्य के पास अपना एक निजी रंगीन स्क्रीन है, कल्पना भी नहीं की जा सकती कि रंगीन टेलीविजन वाले घरों के दरवाजे खास कार्यक्रमों के समय पडोसियों के लिए ही नहीं, मोहल्ले भर के लिए खुले रहते थे। जिसका चरम 1987 में 'रामायण' के दौर में फिर 1988 में 'महाभारत' के दौर में दिखा। उस समय वाकई सड़कें सूनी हो जाया करती थीं। लोग टेलीविजन के आगे अगरबत्ती जलाने लगे थे।
आज टेलीविजन भी है, रंग भी हैं, लेकिन दूरदर्शन अब सिर्फ नास्टेलजिया में है। बेहतर होता एक कदम तुम चलो, एक कदम हम चलें की तरह दूरदर्शन एक बार फिर अपने दर्शकों के करीब आने की कोशिश कर पाता। दूरदर्शन ने रंग सिर्फ दिखाए नहीं, उस समय हमारे जीवन में रंग भरे जब हमें जरूरत थी। आज भी ऐसे रंग की जरूरत है, जिसे हम अपने जीवन में महसूस कर सकें। कुछ 'हमलोग' की तरह, कुछ 'तमस' की तरह, कुछ 'चाणक्य' की तरह और कुछ 'मालगुडी डेज' की तरह।
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