scriptDr. Bhimrao Ambedkar Jayanti | सामाजिक चेतना के दायरे में कानून बनाने के थे पक्षधर | Patrika News

सामाजिक चेतना के दायरे में कानून बनाने के थे पक्षधर

एक बड़ी बात यह भी कि डॉ. आम्बेडकर ने संविधान निर्माण के दौरान मानव अधिकारों के प्राकृतिक सिद्धान्तों पर अधिक बल दिया। शायद वे यह जानते थे कि जबरन कोई अधिकार लेना लोकतंत्र के लिए ठीक नहीं है। इसलिए उन्होंने अधिकारों में नैतिक चेतना को प्रमुख रखा।

Published: April 14, 2022 02:15:51 pm

कलराज मिश्र
राज्यपाल, राजस्थान

भारतीय संविधान की यह बड़ी विशेषता है कि वह संघात्मक होने के साथ एकात्मक भी है। देखा जाए तो संविधान की प्रस्तावना में ही जब 'हम भारत के लोग...' का उल्लेख होता है, तो इसमें लोकतांत्रिक शासन प्रणाली की गरिमा दृष्टिगत होने के साथ इसकी घोषणा भी है कि संविधान अपनी शक्ति सीधे जनता से प्राप्त करता है। समानता, संप्रभुता और बंधुत्व के भावों से सजे भारतीय संविधान के प्रमुख शिल्पकार डॉ. भीमराव आम्बेडकर ने संविधान मसौदा समिति के सभापति के रूप में वे सभी प्रावधान सुनिश्चित किए, जिनसे देश का राजनीतिक ढांचा मजबूत होता है। डॉ. आम्बेडकर का कहना था कि लोकतंत्र को आर्थिक और सामाजिक स्वतंत्रता प्रदान करके ही सुरक्षित रखा जा सकता है। इसीलिए उन्होंने संविधान समिति के मसौदे में इस बात को खास तौर से रखा और कहा कि हमें ऐसी सरकार चाहिए, जिसमें सत्ता में बैठे व्यक्ति इस बात को समझते हों कि कब सरकार की आज्ञाकारिता समाप्त हो जाती है और प्रतिरोध प्रारम्भ हो जाता है। सरकार जनता की, जनता के लिए और जनता द्वारा ही चुनी हुई होनी चाहिए।
एक बड़ी बात यह भी कि डॉ. आम्बेडकर ने संविधान निर्माण के दौरान मानव अधिकारों के प्राकृतिक सिद्धान्तों पर अधिक बल दिया। शायद वे यह जानते थे कि जबरन कोई अधिकार लेना लोकतंत्र के लिए ठीक नहीं है। इसलिए उन्होंने अधिकारों में नैतिक चेतना को प्रमुख रखा। उनका मानना था कि यदि किसी कानून को सामाजिक चेतना के दायरे में लाकर लागू किया जाएगा, तो अधिकार दीर्घकाल तक सुरक्षित रहेंगे। आम्बेडकर ने महिलाओं को पुरुषों के बराबर अधिकार दिए जाने। देश के आजाद होने के बाद हमारे देश में संसदीय लोकतांत्रिक प्रणाली को अपनाना तय किया गया था। इसी के अनुरूप संविधान में नागरिकों को मौलिक अधिकार प्रदान करने के साथ उनके मूल कर्तव्य भी सुनिश्चित किए गए। डॉ. आम्बेडकर को मैं इस दृष्टि से विरल मानता हूं कि उन्होंने समय व संदर्भों को दृष्टिगत रखते हुए संविधान में सामाजिक और आर्थिक आचार संहिताओं को लागू करने की पैरवी की। डॉ. आम्बेडकर ने सदा ही इस बात पर जोर दिया कि संविधान में संघीय प्रणाली को मजबूत होना चाहिए। संसदीय लोकतंत्र की मजबूती के तहत उनकी मंशा यह थी कि साधारण परिस्थितियों में तो राज्य, केन्द्र सरकार के नियंत्रण से मुक्त होते ही हैं लेकिन संविधान के अन्तर्गत केन्द्र ही शक्तिशाली बने। तत्कालीन परिस्थितियों में यह जरूरी भी था, क्योंकि संविधान बनते समय देश की स्थिति डांवाडोल थी। इसलिए उन्होंंने इस तथ्य को भी समझा कि केन्द्र कमजोर हुआ, तो देश की आजादी फिर से खतरे में पड़ सकती है।
संविधान मसौदा समिति के मुखिया के रूप में आम्बेडकर का यह योगदान भी कम महत्त्वपूर्ण नहीं है कि उन्होंने संविधान से जुड़े महत्त्वपूर्ण प्रावधानों की न केवल भूमिका ही तय की, बल्कि गणतंत्र को भारतीय परिप्रेक्ष्य में सशक्त करने वाले विषयों को भी संविधान में शामिल कराया। लोकसभा सदस्य रहने के दौरान संविधान सभा की कार्यवाही का विस्तार से अध्ययन का अवसर मिला था। तभी दस खण्डों की 'भारतीय संविधान सभा के वाद-विवाद की सरकारी रिपोर्ट को पढ़ते हुए डॉ. आम्बेडकर के उस व्यक्तित्व से भी रू-ब-रू हुआ, जिसमें उन्होंने संविधान लिखने का महती कार्य करने के बावजूद इसका श्रेय अपने साथियों को दिया। संविधान सभा में बहस के दौरान उन्होंने कहा कि अपने राजनीतिक लोकतंत्र को हमें सामाजिक लोकतंत्र का रूप भी देना चाहिए। सामाजिक लोकतंत्र का अर्थ है, स्वतंत्रता, समता और बंधुत्व का सिद्धान्त। भारतीय संविधान में डॉ. आम्बेडकर का जो विशिष्ट योगदान रहा, उस पर अधिक चिंतन नहीं हुआ है।
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