वंशवादी राजनीति पर उठे सवाल

राजनीति में जनता का दुख-दर्द समझने की बजाय जातिवाद के नाम पर राजनीति चमकाने वाले नेता सफल नहीं हो सकते।

By: सुनील शर्मा

Published: 15 Jun 2021, 11:28 AM IST

राजनीति में जब महत्त्वाकांक्षाएं हद से अधिक बढ़ जाती हैं तो उनका हश्र वही होता है जो लोक जनशक्ति पार्टी के साथ हुआ। पार्टी के छह में से पांच सांसदों ने पशुपति नाथ पारस को संसदीय दल का नेता चुन लिया। पिछले साल बिहार विधानसभा चुनाव में मुंह की खाने के बावजूद पार्टी अध्यक्ष चिराग पासवान नहीं संभले। नतीजा सबके सामने है। लगभग दो दशक पुरानी लोक जनशक्ति पार्टी के भीतर टूट की पटकथा इसके संस्थापक रामविलास पासवान के निधन के बाद ही लिखी जा चुकी थी। पासवान के पुत्र चिराग पासवान ने पार्टी का नेतृत्व तो संभाल लिया लेकिन कार्यकर्ताओं का विश्वास कभी नहीं जीत पाए।

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एक दौर में बिहार विधानसभा में 29 सीटें जीतने वाली लोजपा पिछले चुनाव में सिर्फ एक सीट पर सिमट गई। बाद में एक विधायक भी जद(यू) में शामिल हो गया था। रामविलास पासवान के रहते चिराग पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष चुन लिए गए थे। लेकिन पार्टी संगठन की तरफ ध्यान देने की बजाए वह जोड़तोड़ की राजनीति में लगे रहे। राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन में रहने के बावजूद उन्होंने पिछले चुनाव में नीतीश की पार्टी को हराने में कोई कसर नहीं छोड़ी। बिहार के मतदाताओं ने नीतीश को तो फिर मुख्यमंत्री बनाया ही, चिराग को भी उनकी राजनीतिक हैसियत का अंदाजा दिला दिया। बिहार में लोकजनशक्ति पार्टी के भीतर जो हुआ, वह विरासत में राजनीतिक हैसियत पाने वाले नेताओं के लिए सबक है।

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राजनीति में जनता का दुख-दर्द समझने की बजाय जातिवाद के नाम पर राजनीति चमकाने वाले नेता सफल नहीं हो सकते। उत्तरप्रदेश में राष्ट्रीय लोकदल और हरियाणा में इंडियन नेशनल लोकदल इसके जीते-जागते उदाहरण हैं। देश के प्रधानमंत्री रहे चरण सिंह ने राष्ट्रीय लोकदल का गठन किया था। उपप्रधानमंत्री रहे चौधरी देवीलाल ने इंडियन नेशनल लोकदल की स्थापना की थी। दोनों दलों का एक जमाने में खासा राजनीतिक प्रभाव था। लेकिन दोनों दलों की हालत आज किसी से छिपी नहीं है। अपने-अपने राज्यों में इनका अस्तित्व कागजों में सिमटकर रह गया है।

इसके विपरीत बीजू जनता दल का उदाहरण भी है। नवीन पटनायक को विरासत में राजनीति मिली, लेकिन उन्होंने अपनी मेहनत के दम पर ओडिशा में पार्टी को अजेय बना दिया है। नवीन पटनायक जातिवाद की राजनीति से दूर रहकर विकास की राजनीति कर रहे हैं। देश में अधिकांश क्षेत्रीय दल ‘परिवार’ की राजनीतिक विरासत को आगे बढ़ा रहे हैं। फिर चाहे वह जम्मू-कश्मीर में नेशनल कांफ्रेंस या पीडीपी हो, बिहार में राष्ट्रीय जनता दल हो अथवा उत्तरप्रदेश में समाजवादी पार्टी और तमिलनाडु में द्रमुक हो।

सुनील शर्मा
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