सामयिक : ईरान में रईसी की जीत से और मजबूत हो सकती हैं दमनकारी ताकतें

बाइडन प्रशासन को स्पष्ट करना चाहिए कि रईसी के दमनचक्र वाले इतिहास की पुनरावृत्ति नहीं होने दी जाएगी, चाहे समझौता हो अथवा नहीं

By: विकास गुप्ता

Published: 21 Jun 2021, 03:31 PM IST

जेसन रिजेअन, स्तम्भकार

इस्लामिक गणराज्य ईरान के अगले राष्ट्रपति के तौर पर इब्राहिम रईसी को विजेता घोषित कर दिया गया है। एक ऐसा चुनाव, जिसकी निष्पक्षता पर मतदान के दौरान ही सवाल उठे और उसे अर्थहीन ठहराया गया। एक कट्टरपंथी, जिसके जीतने की भविष्यवाणी की गई थी, उसे शनिवार को गृह मंत्रालय ने विजेता घोषित कर दिया क्योंकि उसका पलड़ा इतना भारी था कि लाखों आम मतदाताओं ने मतदान न करने का फैसला किया। रईसी इस पद पर पहुंचने वाले सर्वाधिक कट्टरपंथी विचारधारा के व्यक्ति हो सकते हैं।

रुढि़वादी विचारों वाले रईसी के करियर का सबसे उल्लेखनीय कृत्य युवा ज्यूरिस्ट के रूप में उनकी उस आयोग के सदस्य के रूप में निभाई गई भूमिका थी, जिसने १९८८ में कानूनी प्रक्रिया पूरी किए बिना हजारों असंतुष्ट राजनीतिक कैदियों को मौत की सजा दी। एमनेस्टी इंटरनेशनल जैसे अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संगठन द्वारा उनके अत्याचारों का उल्लेख करने के बाद भी रईसी ने इस फैसले की प्रशंसा की थी। तब से वह ईरान के महाधिवक्ता, ईरान के सबसे दौलतमंद धार्मिक फाउंडेशन के कर्ता-धर्ता रहे, और अब न्यायपालिका प्रमुख। हालांकि ऐसी कल्पना करना मुश्किल है, लेकिन संभव है कि उनके राष्ट्रपति रहते राज्य की दमनकारी युक्तियों और सत्ता का दुरुपयोग करने वालों के लिए कम जवाबदेही के नए युग का सूत्रपात हो।

बीते २५ वर्षों के दौरान हर चार साल में ईरानी जनता के समक्ष एक ओर वे उम्मीदवार थे जिन्होंने दुनिया के साथ अधिक आर्थिक, सांस्कृतिक और सुरक्षा सम्पर्क का प्रस्ताव रखा, तो दूसरी तरफ वे जो भीतर से सख्त सामाजिक और सांस्कृतिक नियंत्रण का समर्थन करते थे और जिनकी आर्थिक उम्मीदें घरेलू उत्पादन पर टिकी थीं। भारी मतदान के वक्त जनता ने दोनों में से पहले वर्ग का समर्थन किया, लेकिन जब उन्होंने मतदान से किनारा किया तब संकुचित विचारों की ताकतों ने सत्ता को मजबूत करने के अवसर का उपयोग किया। चुनाव में अभिभावक परिषद से जिन सात उम्मीदवारों को अंतत: चुनाव लडऩे की अनुमति मिली, वे एक सिद्धांत के प्रति वफादार थे: शासन-व्यवस्था के अस्तित्व के लिए प्रतिबद्धता। मतभेद था तो शासन-व्यवस्था की लंबी उम्र सुनिश्चित करने के तरीके को लेकर उनके दृष्टिकोण में।

परिणाम दर्शाते हैं कि सुधार के लिए दबाव डालने वाले गुट अंतत: विफल रहे। चुनावी दौड़ में उदारवादी अब्दुलनासिर हेम्माती बहुत पीछे रह गए। रईसी ने परमाणु समझौते का समर्थन करने का वादा किया है। हालांकि, ईरानी वार्ताकारों और अमरीका के बाइडन प्रशासन पर अब अगस्त तक नया परमाणु समझौता करने का दबाव है। ईरान में सत्तावादी शासन का युग चलता रहेगा जो प्रतिबंधों, बर्बाद अर्थव्यवस्था और महामारी से त्रस्त समाज को दिलासा देने के लिए संघर्ष कर रहा है। असंतोष की लहरें चरम पर हैं और इसके सड़क पर आने की आशंका है। बाइडन प्रशासन को किसी भी अपरिहार्य प्रतिक्रिया का सामना करने के लिए तैयार रहना चाहिए, और स्पष्ट करना चाहिए कि रईसी के दमनचक्र वाले इतिहास की पुनरावृत्ति नहीं होने दी जाएगी, चाहे समझौता हो अथवा नहीं।

द वॉशिंगटन पोस्ट

विकास गुप्ता
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