शिक्षण संस्थाओं को राहत की दरकार

संक्रमण के दौर में अब तक तालाबंदी से गुजर रही निजी शिक्षण संस्थाओं को राहत पैकेज दिया जाना चाहिए। न केवल इन संस्थाओं बल्कि इनमें कार्यरत शिक्षाकर्मियों को भी तत्काल राहत दी जानी चाहिए।

By: shailendra tiwari

Updated: 29 Jul 2020, 04:52 PM IST

पद्मेश तेलंग, आर्थिक मामलों के जानकार

महामारी के दौर में मार्च 2020 के अंत से लगे लंबे लॉकडाऊन के बाद अनलॉक के दौर में अन्य अधिकांश गतिविधियां भले ही शुरू हो गईं पर शिक्षण संस्थाओं के सामने संकट आ गया है। खास तौर से निजी शिक्षण संस्थाओं के सामने। क्योंकि जब अचानक स्कूल बंद हुए, तब शैक्षणिक सत्र की समाप्ति करीब थी और मार्च क्वार्टर तक की लंबित; बल्कि कुछ और पुरानी किश्तों की फीस भी मय नवीन सत्र की प्रारंभिक फीस आनी थी जो अब तक भी नहीं आयी। इस बीच परीक्षाओं के परिणाम भी आ गये, बच्चे अगली कक्षा में भी हो गए।


संकट का सामना शिक्षण संस्था संचालक ही नहीं कर रहे बल्कि इनमें कार्यरत शिक्षक व कर्मचारी भी कर रहे हैं। शाला संचालकों के पास कार्यशील पूंजी व उसकी तरलता के अभाव में गत सत्र के ही करीबन 3-4 माहों का वेतन अपने शिक्षकों-कर्मचारियों को भुगतान होने से रह गया।


यह समस्या राजस्थान के संदर्भ में देखें तो राज्य के करीबन 35000 प्राइवेट स्कूल (35%), उनके 8 लाख शिक्षक-कर्मचारी (80%), 1 करोड़ विद्यार्थी (58%) और इतने ही अभिभावकों की है।और इसलिए ये लोग राज्य की सरकार से ‘आर्थिक राहत पैकेज’ के आकांक्षी हैं। ऐसा इसलिए भी एक वर्ग नए सत्र के लिए नो स्कूल नो फीस अभियान भी चला रहा है।


क्या करें सरकारें!
बंद हुई इन स्कूलों को आर्थिक पैकेज दिए जाने की दरकार है। एक रास्ता यह हो सकता है कि बकाया फीस में 50% राशि की ‘राहत’ यदि सरकार इस शर्त पर स्कूलों को पुनर्भरण कर दे कि अभिभावक अपने-अपने हिस्से की 50% बकाया अपने अपने प्राइवेट स्कूलों को ‘पहले’ जमा करायेंगे और इस प्राप्त राशि से ये स्कूल सर्वप्रथम अपने शिक्षकों का 3-4 माहों का लंबित वेतन चुकायेंगे।‌अर्थात् दो कदम अभिभावक चल दें, दो कदम सरकार और स्कूलों में नये सत्र की शुरुआत सुचारू हो जाए। इस प्रयोग को राजस्थान समेत दूसरे राज्यों में भी लागू किया जा सकता है।


पूर्व वर्षों में प्राइवेट स्कूलों को ‘एड’ देने और वर्तमान में ‘शिक्षा का अधिकार’ (RTE) में चयनित कुछ विद्यार्थियों की फीस का पुनर्भरण सरकार कर रही है. इन प्रावधानों को ही पुनर्जीवित अथवा संशोधित कर सरकार अब सभी 100% विद्यार्थियों को RTE का ‘डीम्ड’ विद्यार्थी मानकर अपनी ओर से ‘राहत पैकेज’ प्रदान कर सकती हैैै ।


व्यवसाइयों और उद्योगपतियों के लिए सरकार पिछले समस्त वर्षों में उनकी बकाया राशि को माफ़ करने के लिए एमनेस्टी’ और ‘वेवर’ योजनायें लाती रही है. इसमें उनकी लंबित बकाया को 100% से लेकर औसतन 50% तो अवश्य ही माफ़ करती रही है जो राज्य-कोष की आवक से ही कमी हुई होती है. यहाँ भी अभिभावकों/स्कूलों को अपेक्षित ‘राहत’ राशि भी शिक्षा विभाग को आवंटित ‘व्यय मद’ के माध्यम से दी जा सकती हैै।


सरकार व्यवसाइयों को उनके किये निवेश पर ‘अनुदान’ देती है. यह लाभ ‘सेवा प्रदाता’ प्राइवेट स्कूलों को अब तक नहीं मिला है जबकि GST आने के बाद ‘सेवा’ शब्द और जुड़ जाने से इन प्राइवेट स्कूलों की ‘सेवा’ का क्षेत्र भी इस ‘अनुदान’ पालिसी में पहले से अधिक स्पष्ट है. आवश्यक सिर्फ यह होगा कि सरकार व्यवसाइयों की ही तरह प्राइवेट स्कूलों को भी ‘अनुदान’ क्लेम का लाभ दे दे जो उनके द्वारा दी जा रही ‘शिक्षा-सेवा (Service)’ के सन्दर्भ में रोज़गार, भूमि, भवन, ब्याज, बिजली, स्टाम्प ड्यूटी, कम्प्यूटर आदि उपकरणों के ‘निवेश’ पर होगी. हाँ ! तदर्थ इन स्कूलों के लिए ‘अनुदान’ शब्द की जगह ‘नगद अनुदान’ (Cash Subsidy) शब्द जोड़ना होगा। अब सवाल यह उठ सकता है कि सरकार ऐसे राहत पैकेज के लिए राशि का बंदोबस्त कैसे करें! पेट्रोल-डीजल या मदिरा पर आ रहे राजस्व से एक छोटा अंशदान , मदिरा पर अतिरिक्त ‘एड-वेलोरम’ लगाकर और अन्य साधनों से यह रकम जुटाई जा सकती है।

shailendra tiwari
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