शांति स्थापना की कोशिशें

शांति स्थापना की कोशिशें

Sunil Sharma | Publish: Sep, 05 2018 10:11:36 AM (IST) विचार

वार्ताकारों को यह नहीं भूलना चाहिए कि भारत सरकार ने रक्षा घटक को वाणिज्य से सम्बद्ध करने का प्रयास किया है। यह नई कूटनीति भारत-अमरीका द्विपक्षीय संबंधों को नया आयाम प्रदान करती है।

- मनन द्विवेदी, विदेश मामलों के जानकार

अब तो यह सामान्य-सी बात हो चली है और भारत के द्विपक्षीय संबंधों के मामलों से जुड़े लोग इससे ठीक से वाकिफ हैं कि भारत और अमरीका जैसे देशों के बीच आपसी दौरे और बड़े-बड़े दस्तावेज पर हस्ताक्षर करना औपचारिकता भर है। पर अब वक्त आ गया है जब भारत-अमरीका संबंध मात्र औपचारिक द्विपक्षीय संबंध न रह कर हिंद-प्रशांत क्षेत्र और हिन्द महासागर परिक्षेत्र (आइओआर-एआरसी) में बड़ी भूमिका निभाने के लिए तैयार हैं। साथ ही दोनों देशों के बीच रक्षा सहयोग बढ़ाने के उद्देश्य से ‘मेक इन इंडिया’ के तहत भारत के लिए अमरीकी छत्रछाया में बड़ी आतंकवाद विरोधी भूमिका गढ़ी जा रही है।

भारत और अमरीका के बीच 6 सितंबर को होने वाली रक्षा सहयोग वार्ता अहम मानी जा रही है। यह अब तक की भारतीय सरकारों और अमरीका के बीच होती रही वार्ताओं से अलग होगी। दोनों देश आभासी साम्राज्यवाद से ऊपर उठ औपचारिकता से परे सभी गंभीर राजनयिक विषयों और तकनीकी बाधाओं पर बात करने को तैयार हैं। दोनों देश सम्प्रेषण, अनुकूलता और सुरक्षा समझौते (सीओएमसीएएसए) को मूर्त रूप देने के लिए भी तैयार हैं। साथ ही द्विपक्षीय संबंधों के तीन मूलभूत तत्व एलएसए (लोजीस्टिक सप्लाई एग्रीमेंट), सिस्मोआ (कम्युनिकेशन एंड इंफॉरमेशन सिक्योरिटी मेमोरंडम ऑफ एग्रीमेंट) एवं बीईसीए (बेसिक एक्सचेंज एंड कॉऑपरेशन एग्रीमेंट) को अपनाने के लिए भी।

इन समझौतों से भारत के समुद्री क्षेत्रों व अन्य द्विपक्षीय सैन्य अभ्यासों में सैन्य सहयोग बढ़ेगा। भारतीय रक्षा मंत्री निर्मला सीतारमन और विदेश सचिव माइक पोम्पेओ के बीच की मुलाकात दोनों देशों के बीच सामरिक संबंधों को नया जीवन देने के साथ रणनीतिक निरंतरता व स्थिरता भी देगी।

यह बैठक और महत्त्वपूर्ण होती अगर माइक पोम्पेओ सीधे भारत दौरे पर आते। अमरीकी प्रतिनिधिमंडल भारत से पहले पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान से मिलने पाकिस्तान जाएगा। पाकिस्तान को मिली इस तरजीह पर राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप को दखल देना चाहिए, क्योंकि भारत के लिए ये बातें हमेशा पीड़ादायक रही हैं — चाहे ये सुरक्षा से जुड़े मसले हों या राजनीतिक।

अमरीका स्थित संचार यंत्रों से लैस सी-170, सी-17, पी-81 और चिनुक और अपाचे हेलीकॉप्टर की स्थापना इस शिखर वार्ता का अन्य महत्त्वपूर्ण पहलू है। यह दो सबसे बड़े और पुराने लोकतांत्रिक देशों के बीच सम्बंधों का महत्त्वपूर्ण घटक है। ये ऐसे मसले हैं जो भारत-अमरीकी द्विपक्षीय संबंधों को भारत-पाक के निजी आपसी मामले से इतर पूर्ण द्विपक्षीय रणनीतिक आयाम देते हैं।

ये समझौते तब से लंबित हैं, जब अमरीकी रक्षा सचिव एश्टन कार्टर अप्रेल 2016 में भारत आए थे। विल्लिम वेरी किक के भारत दौरे ने अमरीका-भारत के बीच रक्षा सहयोग के एक नए युग का सूत्रपात किया था। भारत और अमरीका ने 1995 में पहला एमओयू साइन किया। इसके बाद दोनों देशों के बीच सैन्य संबंधों में प्रतीकात्मक प्रगति देखी गई। इसी क्रम में 2010 में अमरीका के संयुक्त सैन्य प्रमुख एडमिरल माइक मुलेन भारत दौरे पर आए थे।

जापान और दक्षिण कोरिया जैसे देश आज भी रक्षा मामलों में अमरीका की ओर देखते हैं, जबकि भारत अपनी ‘सामुद्रिक नीति’ पर चलते हुए रक्षा क्षेत्र में महत्त्वपूर्ण भूमिका के लिए तैयार है। हाल ही चीन द्वारा एक शक्तिशाली एयरक्राफ्ट के परीक्षण के मद्देनजर भारत की यह नीति अहम है। क्षेत्रीय समुद्री विन्यास में भारतीय उपस्थिति तभी दर्ज होगी जबकि वह इन ‘स्थानीय तालाबों’ जैसे — हिन्द महासागर, अरब सागर और प्रशांत महासागर में कार्यात्मक व प्रभावशाली अमरीकी साझेदारी के साथ उतरे।

क्षेत्रीय सुरक्षा के लिहाज से ‘मेक इन इंडिया’ के तहत भारत और अमरीका किस हद तक एक-दूसरे का सहयोग करते हैं, इसी पर निकट भविष्य में भारत की भूमिका तय होगी। यह भी संकेत हैं कि अमरीका संभवत: प्रशांत महासागर क्षेत्र में अपनी सक्रियता कम करना चाहता हो। यह वार्ता इन्हीं सब बिंदुओं पर केंद्रित होगी। ऐसा भी हो सकता है कि अन्य वार्ताओं की ही तरह यह सामान्य ही हो, पर हो सकता है कि इसका समापन भारत और अमरीका के बीच हुए रक्षा समझौते की निरंतरता बनाए रखने के वादे के साथ हो।

समूचा घटनाक्रम अमरीका की ओर से भारत के पक्ष में सकारात्मक पहल लगती है। इसके साथ ही भारत, एशिया प्रशांत महासागर में नीति निर्धारण का खास स्तम्भ बन सकता है। अगर ऐसा होता है तो भारत, क्लिंटन के कार्यकाल के दौरान नब्बे के दशक में उस पर परमाणु अप्रसार को लेकर लगे आरोप-प्रत्यारोप की छाया से बाहर निकल सकेगा। चूंकि यह वार्ता रक्षा व वाणिज्य दो विषयों पर होगी, इसीलिए इसे ‘2 प्लस 2 संवाद’ नाम दिया गया है।

वार्ताकारों को यह नहीं भूलना चाहिए कि भारत सरकार ने रक्षा घटक को वाणिज्य से सम्बद्ध करने का प्रयास किया है। यह कूटनीति भारत-अमरीका द्विपक्षीय संबंधों को नया आयाम देती है। यह शान्ति ऑपरेशन के लिए भी लघु स्तरीय प्रयास है। संयुक्त राष्ट्र शांति अभियानों के मद्देनजर भारत और अमरीका के लिए क्षेत्र में और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर आपसी सहयोग का संयुक्त उपक्रम बनाए रखना अमरीका और भारत दोनो के लिए चुनौती है।

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