सरोकार : महामारी और सोशल मीडिया

निश्चित रूप से कोरोना महामारी के इस आपदा काल में सोशल मीडिया लोगों का संबल, आस और मार्गदर्शक बना है। यह तब अभिशाप बन जाता है, जब इसके जरिए भ्रामक सूचनाएं और विचार फैलाए जाते हैं।

By: विकास गुप्ता

Published: 28 May 2021, 09:07 AM IST

डॉ. रश्मि बोहरा, शिक्षाविद

कोविड-19 की रोकथाम के मानक तत्व 'सामाजिक एकांत' और उससे पनपे दुष्प्रभावों को सोशल मीडिया ने काफी कम किया है। सोशल मीडिया में पूरी दुनिया समाहित है। यह लॉकडाउन और सोशल डिस्टेंसिंग की परेशानियों को कम कर सांत्वना और अपनत्व तो देता ही है, साथ ही सूचना, शिक्षा और मनोरंजन का काम भी करता है। यह तो सभी जानते हैं कि सामाजिक एकांत से अवसाद, उदासी और तनाव की समस्या पैदा होती है। निश्चित रूप से कोरोना महामारी के इस आपदा काल में सोशल मीडिया लोगों का संबल, आस और मार्गदर्शक बना है। जाहिर है कि इस नाजुक स्थिति में सोशल मीडिया का महत्त्व काफी बढ़ गया है। यह तब अभिशाप बन जाता है, जब इसके जरिए भ्रामक सूचनाएं और विचार फैलाए जाते हैं। ये सूचनाएं जंगल में लगी आग की तरह फैलती हैं। इनसे घबराहट पैदा होती है। चिंतित व्यक्ति सूचनाओं की भूख रखता है। इसका अर्थ यह नहीं है कि लोग बिना सत्यापन के 'फेक' सामग्री को ग्रहण करते जाएं।

मुश्किल यह है कि सोशल मीडिया के जरिए अप्रमाणित उपचार, गुमराह करने वाली और डर बढ़ाने वाली सनसनीखेज खबरें भी फैलाई जाती हैं, जो बड़ी समस्या का कारण बन गई हैं। इसीलिए संयुक्त राष्ट्र से जुड़े एक उच्चाधिकारी ने इस स्थिति को भ्रामक सूचनाओं की महामारी तक कहा है और इसे 'इन्फोडेमिक' नाम दिया है। उन्होंने इसका मुकाबला करने का आह्वान भी किया। असल में इन्फोडेमिक शब्द दो शब्दों से मिलकर बना है, इनफार्मेशन और पेंडेमिक। इसका मतलब है कई तरह की जानकारियों की बाढ़ आ जाना। इसलिए जरूरत सिर्फ कोविड-19 से लडऩे की ही नहीं, वरन भ्रामक और भयानक सूचना बमबारी से निपटने की भी है। इस बीच इंस्टाग्राम ने नई पहल करते हुए घोषणा की कि वह कोविड-19 से संबंधित वही पोस्ट देगा, जो स्वास्थ्य संगठनों द्वारा प्रकाशित है या जारी की गई है।

समाज मेें मास्क, दो गज दूर और सैनिटाइजेशन के प्रति जागरूकता इन्हीं सोशल मीडिया माध्यमों के अभियानों की वजह से आई है। सोशल मीडिया ने नकारात्मक भावुक प्रतिक्रियाओं को कम किया और कोविड प्रोटोकॉल के प्रति गंभीरता बढ़ाई। हर नागरिक का दायित्व है कि वह अपने सोशल मीडिया अकाउंट से अफवाहों या असत्यापित सूचनाओं को न फैलाएं। खबरनवीसों की भी यह जिम्मेदारी है कि वे भी प्रामाणिक खबरों को ही दें। निश्चित रूप से लोगों में जागरूकता पैदा करने, उन तक सही जानकारी, उपलब्ध करवाने, रोग के उपचार व रोकथाम के मानकों का तेजी से प्रचार-प्रसार सोशल मीडिया की वजह से ही संभव हो पाया है, लेकिन भ्रामक सूचनाओं से नुकसान भी हुआ है। इसलिए सोशल मीडिया पर जिम्मेदारी से सूचनाओं को डालें। इसे 'इन्फोडेमिक' का जरिया न बनाएं।

विकास गुप्ता
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