सुविधाओं को तरसते बिहार के लोगों से वोटों की उम्मीद

- मुस्लिमों और अति पिछड़ों में उलझी भागलपुर से किशनगंज तक की जंग

- हम भागलपुर के नूर मोहल्ले में हैं और यह दर्द भागलपुर के हर गली, हर चौराहे पर आज भी दिखता है।

आवेश तिवारी, भागलपुर से

मैं इब्राहिम हूं, मेरी मां, मेरे आठ साल के बच्चे, मेरी बहन और उसके पति को दंगाइयों ने मेरी आंखों के सामने मार डाला। मेरी मां और बच्चों को कुएं में फेंक कर मार दिया। लगभग 30 साल बीत चुके हैं, मेरी 15 बीघे जमीन, घर और सब कुछ चला गया। अब मैं मजदूरी करने को मजबूर हूं। इतना वक्त बीत गया, लेकिन कोई नेता कभी नहीं आया, हां चुनावों में जरूर आते-जाते रहते हैं। हम भागलपुर के नूर मोहल्ले में हैं और यह दर्द भागलपुर के हर गली, हर चौराहे पर आज भी दिखता है।

मगध की संस्कृति और सभ्यता का प्रतिनिधित्व करने वाला भागलपुर बिहार की उन 9 सीटों में से एक है, जहां 2014 की मोदी लहर में भी भाजपा चुनाव हार गई थी। इन सीटों में सीमांचल की चार सीटें कटिहार, अररिया, पूर्णिया एवं किशनगंज के अलावा बांका, भागलपुर, सुपौल और मधेपुरा की सीट भी थी। सीमांचल की 4 सीटें जहां अल्पसंख्यक बहुल हैं, वहीं इन सभी 8 सीटों पर अति पिछड़ों और दलितों का वोट बेहद निर्णायक रहता है।

2014 के दौरान बिहार की 40 में से 31 लोकसभा सीटों पर भाजपा का कब्जा था, उस चुनाव में भागलपुर संसदीय सीट से पूर्व रेल मंत्री और भाजपा प्रवक्ता मो. शाहनवाज हुसैन को भी पराजय का सामना करना पड़ा था। भागलपुर में विश्वविख्यात टसर सिल्क का कारोबार आखिरी सांसें गिन रहा है पिछले पांच वर्षों के दौरान लगभग दो दर्जन बुनकर भुखमरी का शिकार हुए हैं, वहीं लगभग 60 फीसदी बुनकरों ने दूसरे काम शुरू कर दिए हैं।

नीतीश जी ने भाजपा के साथ जाकर गलत किया अगर नहीं जाते तो उन्हें लालू से ज्यादा वोट मिलते

इस इलाके की आठ सीटों पर जनता दल यू और भाजपा का गठबंधन नए समीकरण पैदा कर रहा है। यह भी तय है कि लोकसभा चुनाव में जिन सीटों पर जनता दल यू और कांग्रेस की आमने-सामने की भिड़ंत होगी उन सीटों पर अगड़ों और दलितों का वोट कांग्रेस को जाएगा।

महगठबंधन भर रहा दम

भागलपुर संसदीय सीट बिहार की सर्वाधिक प्रतिष्ठापरक सीटों में से एक है। इस सीट पर फिलहाल राजद के बुलो मंडल उर्फ शैलेश कुमार का कब्जा है। 2004 के लोकसभा चुनाव में पहली बार उप मुख्यमंत्री सुशील कुमार मोदी भागलपुर से सांसद निर्वाचित हुए थे। भागलपुर के संतोष कुमार कहते हैं कि जनता बुलो मंडल से बेहद नाराज है। भागलपुर का चम्पानगर ऐतिहासिक महत्व वाला है, यह प्राचीन कंग की राजधानी था।

यहां की चम्पा नदी पूरी तरह से प्रदूषित हो चुकी है। एक चाय की दुकान पर कुछ लोग कह रहे हैं कि नीतीश जी ने भाजपा के साथ जाकर गलत किया अगर नहीं जाते तो उन्हें लालू से ज्यादा वोट मिलते। अनवर कहते हैं कि शाहनवाज से नहीं, मोदी से दिक्कत है। इस बात की चर्चा जोरों पर है कि इस बार यहां से एनडीए, जदयू के अबू केसर को उम्मीदवार बनाएगा।

अबू केसर ने दंगा पीड़ितों के बीच लगातार काम किया है। भागलपुर की पड़ोसी बांका सीट भी इस बार जदयू को जा सकती है, लेकिन पेंच यह है कि भागलपुर में भाजपा भले अश्विनी चौबे और मो शाहनवाज हुसैन को मना ले, लेकिन बांका में पुतुल कुमारी को मनाना मुश्किल होगा। अररिया लोकसभा सीट को आरजेडी के सांसद स्वर्गीय तस्लीमुद्दीन का गढ़ माना जाता था उनकी मृत्यु के बाद उनके पुत्र सरफराज आलम जेडीयू से इस्तीफा देकर आरजेडी में शामिल हुए और इसी पार्टी से अररिया से सांसद चुने गए।

यह तय है कि यहां के मैथिली ब्राह्मण परंपरागत ढंग से कांग्रेस को वोट देंगे, लेकिन यह देखने लायक होगा

अररिया के शोभा सिंह कहते हैं कि यह तय है कि राजद एक बार फिर सरफराज पर ही अपने दांव लगाएगा। दिलचस्प है कि इस लोकसभा सीट के अंतर्गत आने वाली चार विधानसभा सीटों पर एनडीए का कब्जा है, लेकिन यह देखने लायक बात होगी कि मुस्लिम और यादव का रुख क्या रहता है जिनकी आबादी 45 फीसदी से ज्यादा है।

सुपौल सीट से बाहुबली पप्पू यादव की पत्नी रंजीत रंजन कांग्रेस सांसद हैं। रंजीत के सामने भाजपा और जनता दल यू एक साथ खड़े हैं इसलिए इनकी ताकत भी दोगुनी हैं। यह तय है कि यहां के मैथिली ब्राह्मण परंपरागत ढंग से कांग्रेस को वोट देंगे, लेकिन यह देखने लायक होगा कि पचपनिया कहे जाने वाली अति पिछड़ी जातियों के मतों का क्या होता है? वो किस ओर वोटिंग करेंगे।

पूर्णिया में उदय की बगावत

शरद यादव खड़े होते हैं तो क्या पप्पू हथियार डालने को तैयार होंगे.....................................

तारिक अनवर कटिहार सीट से पांच बार चुनाव जीत चुके हैं। उम्मीद है वो फिर कांग्रेस के टिकट पर चुनाव मैदान में उतरेंगे। कटिहार से सटा पूर्णिया इस वक्त हॉट सीट बना हुआ है। पूर्णिया के पूर्व सांसद उदय सिंह के भाजपा छोडऩे पर लोग कहते हैं कि इससे सभी सीटों पर असर पड़ेगा। इस सीट पर जनता दल के संतोष कुशवाहा का कब्जा है। पूर्व मुख्यमंत्री जीतन राम मांझी भी यहीं से चुनाव लडऩा चाह रहे हैं।

दर्द बेशुमार मगर इलाज नहीं

बिहार की इन आठ लोकसभा सीटों पर बेरोजगारी बड़ी समस्या है। कृष्णा मिश्रा कहते हैं कि आप स्टेशनों पर और सहरसा से चलने वाली विभिन्न ट्रेनों की भीड़ को देख लें तो आपको बिहार में बेरोजगारी और पलायन के अंतरसंबंध का आसानी से पता चल जाएगा। भागलपुर की जेनी शबनम कहती हैं कि गंगा की कटान भागलपुर शहर को खाती जा रही है। बेहतरीन कोशी परियोजना संचालित होने के बावजूद आम किसान के खेत तक पानी नहीं पहुंचा पाता, क्योंकि लिंक नहर पूरी तरह से ध्वस्त है।

पप्पू-शरद की दावेदारी से मुश्किल में महागठबंधन

मधेपुरा सीट दिल्ली तक चर्चा में है। लालू यादव यहां से दो बार सांसद रहे। बाहुबली पप्पू यादव ने इसी सीट से चार बार चुनाव जीतने वाले शरद यादव को पराजित किया था। शरद यादव यहीं से दोबारा लडऩे के मूड में हैं। सवाल यह भी है कि अगर लोकतांत्रिक जनता दल से शरद यादव खड़े होते हैं तो क्या पप्पू हथियार डालने को तैयार होंगे? पप्पू के समर्थक अन्नु यादव कहते हैं कि वो चुनाव लड़ेंगे, टिकट मिले या न मिले। कयास हैं कि पप्पू खगडिय़ा से भी चुनाव लड़ सकते हैं।

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अमित कुमार बाजपेयी
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