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Patrika Opinion : उनके लिए सिर्फ बाजार, हमारे लिए तो सब कुछ

- वैश्विक बाजार के सिद्धांत दरअसल उन महत्त्वाकांक्षी बाजारों को फलने-फूलने का मौका देने वाली नीति हैं, जिनके रास्ते व्यक्ति के लालच से होकर गुजरते हैं।

नई दिल्ली

Updated: October 29, 2021 08:00:33 am

दुनिया के बाजार को हम दो हिस्सों में बांट सकते हैं। जरूरतों का बाजार और महत्त्वाकांक्षाओं का बाजार। अब इसे महात्मा गांधी की उस सीख से जोड़कर देखें कि धरती हर आदमी की जरूरतों को पूरा करने के लिए पर्याप्त है, पर हर आदमी के लालच के लिए नहीं। वैश्विक बाजार के सिद्धांत दरअसल उन महत्त्वाकांक्षी बाजारों को फलने-फूलने का मौका देने वाली नीति हैं, जिनके रास्ते व्यक्ति के लालच से होकर गुजरते हैं। ऐसे महत्त्वाकांक्षी बाजार का स्पष्ट सिद्धांत है कि यदि आप बड़े नहीं हो रहे हैं तो समाप्त हो जाएंगे क्योंकि बाजार की बड़ी मछली आपको हजम कर जाएंगी। इसीलिए कारोबार निरंतर बढ़ाते रहना किसी कारोबारी के लिए अपना अस्तित्व बचाए रखने की जरूरी शर्त है। भले ही यह अवधारणा पश्चिमी देशों से आई हो, पर अब दुनिया के सिर चढ़कर बोल रही है। जरूरतों का बाजार तो न जाने कब का गुम हो चुका है।

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हमारा, यानी पूरब में, बाजार का सिद्धांत जरूरतों पर आधारित था। किसी आत्मनिर्भर समाज के लिए एक जरूरी शर्त की तरह। इसीलिए महात्मा गांधी ने ग्राम स्वराज की कल्पना की थी। अब वैश्विक बाजार की जरूरतें इस कल्पना पर भी हावी हो रही हैं। इसीलिए हम आत्मनिर्भर नहीं हो पा रहे हैं।

बहरहाल, उक्त संदर्भ फेसबुक के संस्थापक मार्क जकरबर्ग के उस लालच को समझने के लिए जरूरी है जिसकी वजह से उनकी कंपनी को भारत और इसके जैसे अन्य विकासशील देशों में अपने सोशल मीडिया मंच की लोकप्रियता को बढ़ाने के लिए हानि पहुंचाने वाली सामग्री फैलाने से भी गुरेज नहीं है। उन्होंने अपने इस 'बड़े बाजार' में किशोरों और युवाओं (नए खाताधारकों) को अपने मंच से जोड़े रखने के लिए झूठे, भ्रामक व नफरत फैलाने वाले पोस्ट और प्रोत्साहित करने के लिए तकनीक (एल्गोरिदम) का इस्तेमाल किया, ताकि 'फेसबुक की सेहत' बनी रहे। वह इससे बेअसर रहे कि ऐसी हानिकारक सामग्री से भारत या अन्य विकासशील देशों की सेहत पर क्या असर पड़ेगा।

व्हिसलब्लोअर बनी फेसबुक की पूर्व डेटा वैज्ञानिक यदि राजफाश न करतीं तो दुनिया को शायद पता ही नहीं चल पाता कि फेसबुक इस कदर समाज के लिए हानिकारक होता जा रहा है। सूचना तकनीक निश्चित रूप से मानवता के लिए किसी वरदान से कम नहीं है, पर महत्त्वाकांक्षी बाजार ने इसे कैसे मानवता के लिए अभिशाप बना दिया है, फेसबुक फाइल्स (लीक दस्तावेज) के खुलासों से समझा जा सकता है। उनके लिए भारत सिर्फ एक 'बड़ा बाजार' हो सकता है पर हमारे लिए यही सब कुछ है। इसे बचाने के लिए हमें उस 'महत्त्वाकांक्षी बाजार' के मुकाबले 'जरूरतों के बाजार' को फिर से खड़ा करना होगा।

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