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बेहतर रिश्ते बनाने जैसी मीठी बातों में न आए भारत

पाकिस्तान की इस वक्त सबसे बड़ी चिंता यह है कि आगामी विधानसभा चुनाव में जम्मू-कश्मीर के मतदाताओं को मतदान करने से कैसे रोका जाए। भारत सरकार ने जम्मू-कश्मीर में बहु-प्रतीक्षित चुनाव जल्द कराए जाने का वादा किया है। राज्य में भारी मतदान पाकिस्तान और उसकी कश्मीर नीति के लिए बड़ा संकट है। वह दोहरी नीति अपनाए है। एक ओर भारत के साथ अच्छे रिश्ते रखने की तो दूसरी ओर कश्मीर का राग अलापते रहने की।

जयपुरJul 03, 2024 / 08:31 pm

Gyan Chand Patni

अरुण जोशी
दक्षिण एशियाई कूटनीतिक मामलों के जानकार
अब यह स्पष्ट है कि पाकिस्तान जब भारत के साथ रिश्तों की बात करता है तो उसमें कई पहलू शामिल होते हैं। वह भारत का अच्छे पड़ोसी होने का वादा तो करता है और इन रिश्तों को दक्षिण एशियाई क्षेत्र में अर्थव्यवस्था और शांति के लिए बहुत महत्त्वपूर्ण भी बताता है लेकिन जब बुनियादी मुद्दों पर बात आती है तो वह अपना कथन पूरा करने में विफल रहता है। अच्छे पड़ोसी होने का आह्वान अब उसकी राजनीतिक मजबूरी बन गया है।
असल में दुनिया में छवि ठीक करने के लिए इस्लामाबाद के लिए यह महत्त्वपूर्ण है कि वह अपने पड़ोसी यानी भारत के साथ अच्छे संबंधों के लिए बहुत उत्सुक है। उसे अब यह पता चल गया है कि भू-राजनीति की वैश्विक धारणाएं अब बदल गई हैं। वह हतप्रभ है कि दुनिया में जहां भारत की लगातार तरक्की और उसकी प्रोफाइल की सराहना की जाती है, वैश्विक निगाहें सलाह और विवादों की मध्यस्थता के लिए दिल्ली की ओर टिकी रहती हैं, वहीं पाकिस्तान को शांति की दिशा में एक बड़ी समस्या के रूप में देखा जाता है। इसका मतलब समझना बहुत ही सामान्य है। भारत में लोकसभा चुनाव शांतिपूर्ण संपन्न हो गए। चुनाव परिणाम के बाद एनडीए को सत्ता मिली और नरेंद्र मोदी लगातार तीसरी बार प्रधानमंत्री बन गए। यह दुनिया की सबसे बड़ी चुनावी कवायद थी। भारत दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र सिर्फ इसलिए नहीं है कि देश की आबादी 140 करोड़ है बल्कि इसलिए है कि देश सभी लोकतांत्रिक नियमों का पालन करता है, अपनाता है। इसीलिए प्रधानमंत्री मोदी को बधाई देने के लिए वैश्विक नेताओं की होड़ लग गई। एक बार फिर भारत की लोकतांत्रिक व्यवस्था की पूरे देश में धाक जम गई। इसके विपरीत पाकिस्तान में इसी वर्ष की शुरुआत में क्या हुआ, किसी से छिपा नहीं है। नेशनल असेंबली के लिए हुए चुनावों को देश के भीतर और विदेशों में हास्यास्पद बताया गया क्योंकि चुनाव में इमरान खान की पार्टी-पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ को चुनाव लडऩे की अनुमति ही नहीं दी गई थी। पार्टी पर आरोप था कि उसके कार्यकर्ताओं ने देश में दंगे भड़काए और दंगों के दौरान सैन्य शिविरों और छावनियों को भी निशाना बनाया।
अमरीका की हाउस ऑफ रिप्रेजेन्टेटिव ने पाकिस्तानी चुनावों में अनियमितताओं पर संज्ञान लेते हुए एक प्रस्ताव पारित किया जिसमें मांग की गई थी कि यूएस के राष्ट्रपति जो बाइडन ‘लोकतंत्र, मानवाधिकार और कानून का शासन बनाए रखने में पाकिस्तान की सहायता करें।’ पाकिस्तान में लोकतंत्र को जीवन्त दिखाने की कोशिश में नेशनल असेम्बली में एक प्रस्ताव पारित किया गया जिसमें देश के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप करने के लिए अमरीका की निंदा की गई। इसमें जम्मू-कश्मीर का मुद्दा लाया गया। प्रस्ताव में कहा गया है कि ‘यह सदन अमरीका और विश्व समुदाय से गाजा और जम्मू-कश्मीर के निर्दोष लोगों की पीड़ा को कम करने के लिए तत्काल कदम उठाने का आह्वान करता है।’
वैसे तो यह मामला पाकिस्तान और अमरीका के बीच का था लेकिन जम्मू-कश्मीर को चित्रित करना जानबूझकर और शरारती कोशिश थी। शायद वह लोकसभा चुनावों में राज्य के उच्च मतदान से नाराज था। कश्मीरी मतदाताओं ने पिछले 40 साल के वोटिंग के सारे रेकॉर्ड तोड़ दिए थे। बुलेट पर बैलेट का वर्चस्व रहा। पाकिस्तान की इस वक्त सबसे बड़ी चिंता यह है कि आगामी विधानसभा चुनाव में जम्मू-कश्मीर के मतदाताओं को मतदान करने से कैसे रोका जाए। भारत सरकार ने जम्मू-कश्मीर में बहु-प्रतीक्षित चुनाव जल्द कराए जाने का वादा किया है। राज्य में भारी मतदान पाकिस्तान और उसकी कश्मीर नीति के लिए बड़ा संकट है। वह दोहरी नीति अपनाए है। एक ओर भारत के साथ अच्छे रिश्ते रखने की तो दूसरी ओर कश्मीर का राग अलापते रहने की।
हकीकत तो यह है कि जब तक वह आतंकवाद का पोषण बंद नहीं करता, भारत उसके साथ अच्छे सम्बंध नहीं रख सकता। दूसरी बात, पाकिस्तान को कोई भी छूट चीन को और अधिक आक्रामकता के लिए प्रोत्साहित करेगी क्योंकि चीनी सैनिक पिछले चार वर्षों से पूर्वी लद्दाख में लाइन ऑफ एक्चुअल कंट्रोल यानी एलएसी पर धमकी भरे तरीके से मौजूद हैं। भारत उसकी मीठी बातों में कभी नहीं आ सकता।

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