अर्थ पर तकरार

प्रधानमंत्री को स्वयं आगे आकर देश के अर्थशास्त्रियों के साथ-साथ विपक्षी दलों में मौजूद आर्थिक जानकारों के साथ विचार-विमर्श करना चाहिए।

By: सुनील शर्मा

Published: 12 Sep 2018, 01:57 PM IST

उम्मीद न थी कि हमारे राजनेता देश की अर्थव्यवस्था के साथ यों खिलवाड़ करेंगे। डॉलर के मुकाबले रुपया कमजोर हो तो राजनीति, तेल के दाम बढ़ें तो भी आरोप-प्रत्यारोप और बात बैंकों के बढ़ते एनपीए की हो तो भी एक-दूसरे को कठघरे में खड़ा करने की कोशिशें। रिजर्व बैंक के पूर्व गवर्नर रघुराम राजन ने संसदीय समिति से सर्वाधिक ‘बैड लोन’ २००६ से २००८ के बीच देने की बात कही। फिर क्या था, भाजपा को मौका मिल गया। केन्द्रीय मंत्री स्मृति ईरानी ने आनन-फानन में प्रेस कॉन्फ्रेंस कर कांग्रेस पर हमला बोल दिया। राजन के बयान का सहारा लेते हुए कांग्रेस पर बैंकों के सिस्टम को ध्वस्त करने का आरोप लगा डाला। मान भी लिया जाए कि, सर्वाधिक ‘बैड लोन’ कांग्रेस के राज में दिए गए तो केन्द्र की सत्ता में बैठी भाजपा सवा चार साल से क्या कर रही है? बैंकों के कर्ज को वसूल करने के लिए उसने क्या कदम उठाए? क्या ये सही नहीं कि बैंकों का कर्ज नहीं चुकाने वाले उद्योगपति विजय माल्या और नीरव मोदी भाजपा के राज में देश छोडक़र भागे? इनके देश छोडक़र भागने की अटकलों के बावजूद सरकार ने ऐहतियातन कदम नहीं उठाए।

इसे क्या माना जाए? क्या भाजपा सरकार ने इन्हें भागने में अप्रत्यक्ष मदद नहीं की? सरकारों का काम एक्शन लेना होता है न कि आरोप लगाकर अपना बचाव करना। समझने की बात ये है कि, अर्थव्यवस्था कमजोर होने से देश कमजोर होता है। ये भाजपा-कांग्रेस का सवाल नहीं है। उसके लिए मुद्दों की कमी नहीं है। पिछली सरकारों पर आरोप लगाने से सरकारों के अपने दाग धुलने वाले नहीं है। डॉलर के मुकाबले रुपया कमजोर हो रहा है लेकिन भाजपा नेता रुपए को कमजोर मानने की बजाए डॉलर को मजबूत मानकर अपना बचाव करने में जुटे हैं। आम जनता को डॉलर-रुपए से मतलब नहीं लेकिन पेट्रोल-डीजल के दामों में लगी आग से मतलब जरूर है। आज जरूरत इस संकट से निजात पाने की है। मिल-बैठकर कोई रास्ता निकालने की है। आरोप-प्रत्यारोप लगाने से अर्थव्यवस्था पर आए संकट का समाधान नहीं होने वाला।

नोटबंदी का उदाहरण देश के सामने है। सरकार ने क्या सोचकर नोटबंदी की थी और उसके नतीजे क्या निकले? लोकतंत्र में गलती को स्वीकार करना भी आना चाहिए, जो आज के राजनेता भूलते जा रहे हैं। इससे किसी का फायदा तो हो सकता है लेकिन नुकसान सिर्फ देश का होता है। हर सरकार के कार्यकाल में बैंकों का कर्ज डूबा है। उसको वसूलने की जगह एक-दूसरे को नीचा दिखाने के खेल से किसी को कुछ हासिल होने वाला नहीं। अर्थव्यवस्था की मजबूती के लिए प्रधानमंत्री को स्वयं आगे आना चाहिए। देश के अर्थशास्त्रियों के साथ-साथ विपक्षी दलों में मौजूद आर्थिक जानकारों के साथ विचार-विमर्श करना चाहिए। पक्ष-विपक्ष के बीच बढ़ रही दूरियां शुभ संकेत नहीं है। अगर हम अपने आपको सबसे बड़ा लोकतांत्रिक देश कहलाते हैं तो आचरण भी उस तरह का होना चाहिए। कोशिश दूसरे की लकीर छोटी करने की बजाय अपनी लकीर बड़ी करने की होनी चाहिए।

सुनील शर्मा Desk
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